आदमियों की एक अजीब सी प्रजाति आजकल हमारे बीच पसरने लगी है जिसकी जिंदगी दिखावों और आडम्बरों से भर कर इतनी कृत्रिम हो चली है कि इस प्रजाति के लोगों का जीवन ही कतरनों के संसार से भर चुका है।
अपने जीवन के सुनहरे पक्षों से सीधे रूबरू करवा पाने में असमर्थ लोगों की ऎसी भीड़ आजकल हमारे आस-पास छाने लगी है जो कुछ करें या न करें मगर कतरनों के संग्रहण से लेकर इनकी सार-संभाल तक में ये इतने माहिर हैं कि इनकी जिंदगी में एकमात्र यही काम ऎसा है जिसे ये लोग ईमानदारी, समयबद्धता और कत्र्तव्यनिष्ठा से पूर्ण करते हैं, इसके सिवा कोई सा काम न इनसे बन पड़ता है, न करने की योग्यता ही रखते हैं, कई सारे लोग तो कतरनों पर ही जिंदा हैं।
इन लोगों के लिए कतरनें ही हैं जो जीवन की कई उपलब्धियों भरी वैतरणियों से पार लगाती हैं। समाज-जीवन और परिवेश के विभिन्न क्षेत्रों में किसी न किसी प्रकार से योगदान देने वालों में दो किस्में हैं। एक वे हैं जो ईमानदारी से अपने सारे काम चुपचाप करते रहते हैं और उन्हें इस बात की भी अपेक्षा नहीं होती कि कोई उन्हें देख भी रहा है या नहीं। न इन लोगों को किन्हीं दूसरे लोगों से किसी प्रकार के पुरस्कार, अभिनंदन और सम्मान की आशा होती है।
इसके विपरीत खूब सारे लोग ऎसे होते हैं जो राई जितना करते हैं, पहाड़ जैसा दर्शाते हैं और कतरनों का तिलस्म दिखाकर हिमालय जितना बड़ा पुरस्कार ले उड़ते हैं। आजकल पुरस्कार, सम्मान और अभिनंदन के लिए और कुछ नहीं चाहिए, सिवाय कतरनों के। जितनी अधिक कतरनें होंगी उतना बड़ा पुरस्कार हाथ में आ सकता है।
कई सारे लोगों की जमीनी हकीकत कुछ दूसरी होती है और पुरस्कार या सम्मान मिल जाने के बाद ही पता चलता है कि ये लोग कितने महान हैं। इनमें सर्वाधिक अखबारी कतरनबाज होते हैं जो अपने बारे में हर छोटी से छोटी खबर की भी कटिंग रखते हैं। अपने से संबंधित कतरनों को संग्रहित करने से लेकर सलीके से जमाने और समय-समय पर लोगों को दिखाने से लेकर फोटोस्टेट करवाने में ही इन लोगों की जिंदगी का आधे से ऊपर हिस्सा निकल जाता है।
कई सारे लोग ऎसे हैं जो किसी खबर में मुख्य भूमिका में न भी हों तब भी उनका नाम मात्र या मौजूदगी का जिक्र मात्र होने पर भी इनसे संबंधित कतरनों को जमा करने के इतने आदी होते हैं कि इनके मुकाबले किसी और को कर्मयोगी माना ही नहीं जा सकता।
कतरनों की तलाश और कतरनों की भूमिका तैयार करने में इन लोगों का कोई सानी नहीं। जात-जात के स्रोतों से कतरनें जुटाकर इनका संग्रहण करने की इनकी आदत भी श्रद्धा सहित नमन करने योग्य ही है। कुछ लोग कतरनों पर ही जिंदा हैं तो कई सारे लोग इन कतरनबाजों की भूख और प्यास को देखते हुए अपनी क्षुधा और तृषा मिटाने के जतन भी कर लिया करते हैं।
परस्परोपग्रहोपजीवानाम का संदेश देने वाला यह शाश्वत संबंध हर कहीं आसानी से देखा जा सकता है। हममें से काफी लोग हैं जो कतरनों को जमा करने और कतरन प्रदर्शन के गोरखधंधों में माहिर हैं। कतरनों का अपना अलग ही आकर्षण होता है।
अपनी निजी जिंदगी में हम औरों तथा समाज के लिए किसी काम के न हों, मगर कतरनों का मायाजाल ही ऎसा है जो हमें सर्वाधिक लोकप्रिय, अनुशासित, कर्मयोगी, सच्चा समाजसेवी और परोपकारी सिद्ध कर देने को काफी है। कहा भी गया है - कब्जा ही सच्चा। इसी प्रकार लिखा हुआ ही सच्चा होता है।
आजकल तो मूल्यांकन का आधार भी कतरनेंही हो गई हैं। हमारे आस-पास खूब महामानव हैं जिनका और कतरनों का चोली-दामन का रिश्ता है। आमतौर पर देखा जाता है कि जो लोग कतरनों पर भरोसा करते हैं वे सारे के सारे आडम्बरी जीवन जीते हैं और इनका वास्तविक जीवन से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इस किस्म के लोगों के सामाजिक सरोकार भी सीेमित तथा स्वार्थपूर्ण होते हैं क्योंकि ऎसे लोगों का पूरा जीवन ही रेगिस्तान में पानी बताने और हथेली में दिल्ली दिखाने में ही व्यतीत होता रहता है।
अपने आस-पास विद्यमान इस प्रजाति के लोगों को देखें तो साफ पता चलता है कि इनका लक्ष्य पुरस्कार, सम्मान, ऎषणा ओं की पूर्ति और अभिनंदन के लिए जमीन तैयार करना है, कतरनें इन लोगों के लिए सीढ़ियों का काम करती हैं। तभी तो समाज जीवन में व्यवहारिक गतिविधियों, परिश्रम और खर्चीले आयोजनों से दूर रहकर इस किस्म के लोग ऎसे आयोजनों में घुसपैठ कर लिया करते हैं जिनमें सब कुछ औरों का, सिर्फ नाम अपना, कतरनों में ज्यादा आकार भी अपना और फिर तस्वीरों का घालमेल तो होना ही है। कतरनों के सहारे वैतरणियां पार करने का यह शगल ज्यादा पुराना नहीं है, लेकिन है बड़ा कारगर।
---डॉ. दीपक आचार्य---
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

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