पूर्ण सफलता पाने तक बचें, उपलब्धियों के जिक्र से - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 23 मई 2014

पूर्ण सफलता पाने तक बचें, उपलब्धियों के जिक्र से

हर इंसान अपने जीवन में तरक्की करते हुए उस मुकाम तक पहुंचना चाहता है जिसे वह अपना लक्ष्य बना लेता है। आवारा, नालायक, वर्णसंकर और मुफतखोर प्रजाति के इंसानों को छोड़ दिया जाए तो प्रत्येक मनुष्य अपने लिए कोई न कोई लक्ष्य तय करता है। यह लक्ष्य उसके जीवन निर्माण की बुनियाद होता है। कई बार व्यक्ति में कुछ जन्मजात प्रतिभाएं होती हैं और उन्हीं को सामने रखकर वह उसी दिशा में डग बढ़ाता है जबकि कई लोग मांग और आपूर्ति के सिद्धान्त, जमाने की हलचलों और संगति को देखकर अपने जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं।

लक्ष्य निर्माण से लेकर संधान तक की हर प्रक्रिया में व्यक्ति के पूर्वजन्म की प्रतिभाएं बहुत बड़ा असर डालती हैं। आम तौर तो व्यक्ति उन्हीं कामों को अपने जीवन के लिए चुनता है जिसमें उसकी रुचि हुआ करती है। यह रुचि उसके पूर्वजन्म की प्रतिभा का ही परिणाम होती है जिसमें उसमें सुकून मिलता है। जो व्यक्ति अपनी मौलिक और जन्मजात प्रतिभा को अंगीकार कर उस दिशा में कदम बढ़ाता है उसे सफलता जल्दी और भरपूर मिलती है तथा इसके लिए उसे कोई ज्यादा माथापच्ची या परिश्रम नहीं करना पड़ता है।  इसका कारण यह है कि वह इन कामों को पूर्वजन्म में कर चुका होता है। 

दूसरी ओर जो लोग बाहरी उद्दीपनों, संगति, आकर्षण और किसी न किसी मोहपाश या स्वार्थ में अपनी परंपरागत मौलिक अभिरुचि को त्याग कर कोई नवीन क्षेत्र अंगीकार कर लिया करते हैं तब इनके लिए लक्ष्य प्राप्ति अपेक्षाकृत कठिन होती है और परिश्रम ज्यादा करना पड़ता है। दोनाें ही प्रकार के लोगों को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं, उच्चाकांक्षाओं और जीवन निर्माण की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए मेहनत तो करनी ही पड़ती है लेकिन कई बार कुछ कारक ऎसे होते हैं जिनकी वजह से भरपूर मेहनत के बावजूद पास आयी सफलता अपनी मुट्ठी से फिसल जाया करती है जिसका पछतावा जिंदगी भर रहता है।

इस स्थिति के लिए बहुधा हम ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम सफलता के आरंभिक द्वार में प्रवेश करने के बाद इतने बौरा जाते हैं कि इस आरंभिक सफलता का जिक्र हम सार्वजनिक तौर पर करना आरंभ कर दिया करते हैं। इससे होता यह है कि सफलता पाने के लिए किए जा रहे हमारे प्रयासों में दो तरह अड़चनें आनी शुरू हो जाती हैं। एक तो हमारी सफलता के लिए बधाई और शुभकामनाएं देने वालों से अपार खुशी पाने के लिए हमारा ध्यान भंग हो जाता है, लक्ष्य संधान के लिए बनी रहने वाली रफ्तार टूट जाती है और गति धीमी हो जाती है।

दूसरी सबसे बड़ी और मुद्दे की बात यह है कि आजकल अपने आस-पास से लेकर समाज, परिवेश  और क्षेत्र भर में नकारात्मक प्रवृत्तियाँ कुछ ज्यादा ही हावी हो चली हैं। इस कारण हमारी सफलता की खबर पाकर कोई हमें बधाई दे या शुभकामनाएं दे, लेकिन हकीकत यह है कि अस्सी फीसदी लोग दोहरे चरित्र वाले होते हैं। ये भले ही ऊपर से कितनी ही खुशी की बरसात क्या न कर दें, कितना ही स्नेह, प्यार और दुलार क्यों न उण्डेल दें, इनके मन में उन सभी के प्रति नकारात्मक भाव गहरे तक भरे होते हैं जो सफलता पाने की डगर पर होते हैं।

कुछ लोग तो नकारात्मक मानसिकता की बीमारी से इतने भरे हुए होते हैं कि अपने घर-परिवार के किसी सदस्य तक की अपेक्षा से अधिक सफलता की बात सामने आने पर मन ही मन बुरा सोचते हैं। इस स्थिति में यह तय मानकर चलना चाहिए कि हमारी किसी भी प्रकार की सफलता का जिक्र करने से हमारे प्रति नकारात्मक माहौल भीतर ही भीतर बन जाता है और यह हमारे संकल्प को आघात पहुंचाता है और सकारात्मक प्रवृत्तियों पर हावी होने की कोशिश करता है।

सफलता का कोई सा सोपान हम प्राप्त कर लें, इसका जिक्र तब तक किसी के सामने नहीं करें जब तक की लक्ष्य की पूर्ण प्राप्ति न हो जाए, वरना सफलता और लक्ष्य से हमारी  दूरी बढ़ती चली जाएगी। यह तय मानकर चलें कि प्रोत्साहन की जरूरत उन लोगों को है जो कोई सा सफर शुरू करना चाहते हैं, उन लोगों के लिए नहीं है जो एकाग्रता के साथ लक्ष्यानुसंधान में रमे रहते हैं।

इसलिए जीवन में लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर एकांतिक साधना और परिश्रम करते चले जाएं, लक्ष्य अपने आप प्राप्त हो जाएगा। फिर लक्ष्य पा लिए जाने के बाद इसकी सुगंध फैलाने के लिए हमें कुछ नहीं करना पड़ता, वे लोग ही हमारे प्रशंसक और प्रचारक हो जाते हैं जिनसे सकारात्मकता की कोई उम्मीद नहीं होती।  ये नकारात्मक लोग तभी तक विरोध या नकारात्मक भाव रख पाते हैं जब कि हमें मंजिल प्राप्त नहीं हो जाती। मंजिल पा लिए जाने के बाद इनका बस नहीं चलता, इसे ये लोग अच्छी तरह समझते हैं।

इसलिए जो कुछ लक्ष्य रखें, सफलता की पूर्णता पा लिए जाने के बाद ही इसकी चर्चा होनी चाहिए अन्यथा सफलता की प्राप्ति संदिग्ध ही हो जाती है और फिर इसकी टीस जिंदगी भर बनी रहती है।





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---डॉ. दीपक आचार्य---
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