विशेष आलेख : स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसते लोग - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 23 मई 2014

विशेष आलेख : स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसते लोग

लोकसभा चुनाव की गहमा गहमी खत्म होते ही जम्मू एवं कष्मीर में विधान सभा चुनाव का प्रचार और प्रसार अभी से ही षुरू हो गया है। बड़े ज़ोरो-षोर के साथ राजनेता हर षहर, मोहल्ले, गांव और गली में विधानसभा चुनाव के लिए जलसे और सभाएं कर रहे हैं। तमाम राजनेता जनता को खुष करने के लिए अपने अपने क्षेत्र में किए गए विकास के कामों को जनता के सामने ला रहे है और जनता से वोटों की मांग कर चुनावी तैयारियों में व्यस्त हैं। वहीं दूसरी ओर जनता के लिए वक्त आ चुका है कि वह अपने नेता से विकास के कामों का हिसाब मांग सके। चुनावी मौसम में यह सब कुछ देखने को मिल रहा है। 

लेकिन सच्चाई यह है कि देष के दूरदराज़़ इलाके आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। यह इलाके देष के ऐसे इलाके हैं जहां राजनेता का दौरा सिर्फ चुनाव का वक्त नज़दीक आने पर ही होता है। लोकसभा चुनावों की गहमा-गहमी के बीच देष के जाने माने गैर सरकारी संगठन चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेषन नेटवर्क के जम्मू के ग्रामीण लेखकों ने पुंछ जि़ले की तहसील मेंढ़र में विकास कामों का जायज़ा लेने के लिए सरहदी गांव गोेलदनावनी का दौरा किया। इस गांव में वैसे तो बहुत सारी समस्याएं है लेकिन सबसे बड़ी समस्या यहां चिकित्सा सुविधाओं का न होना है। आठ वार्डों में बंटा यह गांव मेंढ़र से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गांव की कुल आबादी तकरीबन 8 हज़ार है। 

पकिस्तान की सरहद पर होने की वजह से इस गांव के लोगों को सरहद पार से होने वाली गोलाबारी का सामना भी करना पड़ता है। साल 2013 में खादिम हुसैन के मकान पर गोले आकर  गिरे थे जिससे उनका मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इस तरह के हादसों और सरहद पर बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं की कमी के चलते इस क्षेत्र में मरीज़ों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस गांव तक पहुुंचने के दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता,  मेंढ़र से पैदल चलकर यहां तक पहुंचा जा सकता है और दूसरा रास्ता वह रास्ता जिसका निर्माण आर्मी के ज़रिए किया गया है। इस रास्ते पर आर्मी की मजऱ्ी के बगैर गाड़ी नहीं चलती है। आर्मी के ज़रिए निर्माण किए गए इस रास्ते का गेट सुबह 8 बजे खुलता है और षाम को 6 बजे बंद हो जाता है। ऐसे में इस गांव में चिकित्सा सुविधाओं का न होना सबसे बड़ी समस्या है। इस गांव के लोगों को छोटी सी बीमारी हो जाने पर मेंढ़र अस्पताल का रूख करना पड़ता है। 
            
गांव में चिकित्सा सुविधाओं की खस्ताहाली का जिक्र करते हुए बाग हुसैन (80) कहते हैं कि मैं अभी आर्मी अस्पताल से चैकअप कराकर आ रहा हंू और मुझे अस्पताल से दवाईयां भी मिली हैं। मैं पिछले छह दिन से बीमार हंू, मगर क्या करूं, इलाके में कोई अस्पताल ही नहीं है। इसलिए मुझे मजबूरन छह दिन बाद आर्मी अस्पताल दिखाने के लिए जाना पड़ा। अस्पताल मेरे घर से एक किलोमीटर की दूरी पर है। एक किलोमीटर का रास्ता तय करने में मुझे आराम करने के लिए तकरीबन दस जगह रूकना पड़ा। बुढ़ापे में षरीर ने भी साथ देना छोड़ दिया है। मैं अस्पताल इलाज के लिए गया था, मगर चलने की वजह से मैं थकान की वजह से और ज़्यादा बीमार हो गया। इसके अलावा इलाके में चिकित्सा सुविधाओं की उचित व्यवस्था न होने की वजह से गर्भवती महिलाओं को बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। 

तकरीबन पौने दो साल पहले इस इलाके की तस्लीम अख्तर ज़ोजा मोहम्मद अहमद को वक्त पर इलाज न मिलने की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, वह गर्भ से थीं। आज अगर तसलीम अख्तर जिंदा होती तो अपने दो बच्चों की बेहतर परवरिष कर सकती थीं। आज तक तसलीम अख्तर के घर वालों को सरकार की ओर से किसी तरह की कोई मदद नहीं दी गई है। इस गांव के स्थानीय निवासी आलम दीन कहते हैं कि अगर हमारे इलाके में कोई रात को बीमार हो जाता है तो मरीज़ को चारपाई पर उठाकर चार आदमी अस्पताल पहुंचाते हैं क्योंकि आर्मी वाले रात को गेट बंद कर देते हैं। 

उनकी मर्जी होती है तो गेट खोल देते हैं नही ंतो पैदल ही मरीज़ को चारपाई पर उठाकर मेंढ़र अस्पताल पहुंचाया जाता है। लिहाज़ा सरकार को हमारे गांव में अस्पताल खोलने की ओर जल्द से जल्द ध्यान देना चाहिए ताकि हमारी परेषानियों में कुछ कमी हो। इस गांव के लोग राजनेताओं से भी खासे नाराज़ हैं। यहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि राजनेता सिर्फ चुनाव का वक्त नज़दीक आने पर ही दिखाई देते हैं। चुनाव के बाद कोई भी नेता जनता की खैर-खबर लेने नहीं आता। यहां की जनता में सरकार के प्रति रोश साफ नज़र आता है। यहां की जनता सरकार से अपील करते हुए कहती है कि क्या हमारी जान की कीमत नहीं, अगर है तो जल्द से जल्द हमें एक अस्पताल दिया जाए? 




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हामिद शाह हाशमी
(चरखा फीचर्स)

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