महिलाओं के साथ उत्पीड़न और अत्याचार एक विष्वव्यापी समस्या बन गयी है। विभिन्न देषों की परंपराएं एवं रीति रिवाज यह तय करते हैं कि महिलाओं के साथ उनके परिवार, कार्यस्थल और समुदाय में कैसा व्यवहार हो। क्रांति के इस दौर में सब कुछ बदल रहा है। मगर एक चीज़ जो हमारे देष में अब तक नहीं बदली वह है महिलाओं की स्थिति। भारत जैसे लोकतांत्रिक देष में भी महिलाएं आज भी खुली हवा में सांस नहीं ले सकती। घर से लेेकर कार्यस्थल तक महिलाओें को यातनाओं का सामना करना पड़ता है। सुषासन के तमाम दावों के बावजूद बिहार राज्य में भी महिला अपराध के मामलों में काफी इज़ाफा हुआ है। पिछले वर्श नवंबर तक प्रदेष में महिलाओं से जुड़े 10898 मामले दर्ज किए गए जिनमें बलात्कार, अपहरण, छेड़खानी, दहेज और दहेज प्रताड़ना के मामले षामिल हैं। वहीं 2012 में यह संख्या 9795 थी। बिहार सरकार भले ही राज्य में महिलाओं की स्थिति सुधरने के लाख दावे कर ले लेकिन आंकड़े चीख चीख कर बिहार में महिला उत्पीड़न और अत्याचार की कहानी की इबारत खुद ब खुद लिख रहे हैं। बिहार के सभी जि़लों में महिला थाना खोले जाने तथा पुलिस के विभिन्न पदों पर बहाली में 35 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था करने के बावजूद यहां महिला अपराध के मामले बढ़े हैं। राज्य सरकार के द्वारा महिलाओं को पंचायती राज संस्थानों और स्थानीय निकायों तथा षिक्षकों की नियुक्ति में 50 प्रतिषत आरक्षण दिए जाने के बावजूद राज्य में उनके खिलाफ अत्याचार और उत्पीड़न की घटनाएं रूकने का नाम ही नहीं ले रही हैं।
कहीं महिलाओं को सरस्वती तो कहीं पार्वती के रूप में पूजा जाता है। लेकिन मौजूदा दौर में महिलाओं के प्रति पुरूश जाति की सोच को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि मानो यह बातें सिर्फ किताबों का किस्सा बनकर रह गयी हांे। आज के दौर में सरेआम देवी समान मां, बहनों का अपमान किया जा रहा है। रास्ते से जा रही लड़कियों को छेड़ना और उन पर गंदे और भद्दे कमेंट पास करना, दुपट्टा खींच देना, आज के दौर में लड़कों के लिए फैषन बन चुका है। ऐसी ही एक घटना पटना स्थित मौलाना मज़हरूल हक़ अरबी फारसी यूनिवर्सिटी में एक प्रोग्राम के दौरान घटित हुई । प्रोग्राम खत्म होते ही मैंने गेट पर कुछ आवारा लड़कों का जमावड़ा देखा। यह सभी इसी महाविद्यालय के एमबीए, बीबीए और बीसीए के छात्र थे। सभी ने मिलकर गेट से गुज़रने वाली लड़कियों को बहुत परेषान किया। हद तो उस वक्त हो गई जब इन लड़कों ने एक लड़की को निषाना बनाकर उसके साथ बत्तामीज़ी की और उस पर टीका-टिप्पणी करना षुरू कर दिया। लड़की के जबाब देने पर यह सभी लड़के आपस मंे उसकी बात को दोहराकर उस पर ठहाका लगाकर हंस रहे थे। मगर यहां अफसोस की बात तो यह रही कि किसी ने भी उन लड़कों से उलझना मुनासिब नहीं समझा। दूसरा किस्सा यह है कि एक दिन मैं गांधी मैदान से घर आ रही थी तो टैंपू में एक घटना घटित हुई। एक आदमी एक बड़े बैग के साथ टैंपू में सवार हुआ। उसने बैग को गोद में रख लिया। इतनी देर में पास बैठी लड़की ने उसको ज़ोर की लगाई और उससे पूछा कि घर में मां, बहन नहीं है क्या? उस आदमी ने जबाब दिया हां हैं ना। इतने में एक टैªफिक पुलिस वाला आॅटो में सवार हुआ, तब उस लड़की ने आदमी से कहा कि घर में अपनी मां बहन के साथ भी ऐसा ही करते हो क्या? लड़की के आदमी को फटकार लगाने पर पुलिस वाले ने उस आदमी की ओर मुड़कर देखा तो वह आदमी आॅटो रूकवाकर भागने के प्रयास में था कि लड़की ने उसे गुस्से में धक्का दे दिया। उस आदमी को एक तोे पुलिस और बात बिगड़ने का डर और दूसरा एक्सीडेंट होने का डर सता रहा था।
उस आदमी का चेहरा देखने लायक था, मुझे बहुत मज़ा आया। यहां एक बात मुझेे सीखने को मिली कि अगर खुद के साथ कुछ गलत हो रहा है तो हंगामा करने से पहले खुद निपटने की कोषिष करो। क्योंकि हंगामा करने से लोग लड़कियों को ही दोश देते हैं, जबकि ऐसे मामलों में उनका कोई दोश नहीं होता है। मुझे गर्व हुआ उस समय उस लड़की पर और खुद पर कि लड़कियां भी हिम्मत और साहस के मामले में लड़कों से कम नहीं हैं। यहां दो कहानियों में एक ही बात सामने आयी कि महिलाएं आज भी समाज में सुरक्षित नहीं हैं। एक कहानी में लड़की की बातों का मज़ाक उड़ाया गया और एक कहानी में लड़की को सराहना मिली। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्या नारी जाति के साथ इस तरह के हादसे होते रहेंगे? इन दोनों घटनाओं से स्पश्ट है कि पुरूश जाति महिलाओं को आज भी सम्मान की निगाह से देखने को तैयार नहीं है। नारी जाति के प्रति जब तक पुरूश जाति की सोच में बदलाव नहीं लाएगा तब तक महिलाओं के साथ ऐसे हादसे होते रहेंगे। महिलाओं के साथ उत्पीड़न और दुराचार रोकने के लिए कानून तो बहुत सारे हैं लेकिन बावजूद इसके महिला उत्पीड़न और अत्याचार पर लगाम नहीं लग पा रही है। आखिर कहीं तो कमी है कि नारी जाति के साथ दुव्र्यवहार करने वाले लोग आज भी बेखौफ होकर घूम रहे हैं। आखिर हमारा समाज इतना गंदा क्यों होता जा रहा है? क्यों समाज से यह कुरीतियां खत्म नहीं हो रही हैं? आखिर कब बदलेगा समाज?
कनीज़ फातिमा
(चरखा फीचर्स)

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