विश्व प्रेस दिवस पर कुछ लिखने का मन हुआ तो अपने अनुभव एवं आप वीती के लेकर कुछ लिखने का साहस कर रहा हॅू । प्रेस दिवस छापा खाना(प्रिंटिंग प्रेस ) से लेकर प्रिंट मीडिया, इलैक्ट्रानिकल मीडिया, सोषल मीडिया कम्प्यूटर, इंटरनेट, मोबाईल, फेषबुक, टियुटर, व्हाटसअप, आदि को भी विकाषगति में जुड़ जाने के कारण प्रेस की आजादी को खतरा हो रहा है । प्रेस की आजादी, स्वतंत्रता पर परतंत्र की छाया नजर आने लगी है । आजादी के पूर्व की पत्रकारिता एवं बर्तमान पत्रकारिता में जमीन आसमान का अंतर है । आजाद के पूर्व पत्रकार, प्रेस एक मिषन व देष व समाज के लिए पत्रकारिता हुआ करती थी, बर्तमान में प्रजातंत्र के रक्षक जब भक्षक बनने लगे तो विकाष के मुद्दे को पीछे छोड़ते हुये अधिकारिया, राजनेताओं, उद्योगपति, ठेकेदारों, भू-माफियों, षिक्षा संस्कृति के ठेकेदारों के लिए पत्रकारिता हो रही है । प्रेस मीडिया को अपने दायित्व का निर्वाहन करने में स्वंय की ताकत व आत्मवल के बाद काम करना पड़ रहा है । इस स्वतंत्र भारत में प्रेस की भूमिका पर ही पग-पग पर अग्नि परीक्षा होती है । लिखने बाले लिख तो बहुत कुछ लिख जाते है लेकिन उसे स्वयं तो अमल कर नही पाते, सामने बाले को लिए छोड़ देते है । हम आप प्रेस दिवस हर बर्ष, साल मनाते आ रहे है, किसी न किसी रूप में पत्रकारिता के बारे में पत्रकार ही अपनी अच्छी बुरी खबरों के साथ हम जैसे तुच्छ बुध्दि, विवेकहीन लेखक को कहीं न कहीं किसी समाचार पत्र, बेब पोर्टल में स्थान मिल जाता है ,अन्यथा लेख प्रकाषित करने एवं कराने के लिए भी राजलक्ष्मी या धन लक्ष्मी की मदद की आवष्यकता होने लगी है । लेकिन मानवता के पुजारी पत्रकार अपना दायित्व निभाते चले आ रहे है ।
भारतीय संस्कृति एंव संस्कारों में समाचारों का आदान प्रदान करने की प्राणाली हजारों बर्षो से चली आ रही है लेकिन भारत में समाचारों का महत्व अंग्रेजों के षासन काल में अधिक महत्व बढ़ गया था, अंगे्रजों ने भारत पर अपना राज्य कायम कर रखा था तथा वह अपने बनाये कानून व नियमों को ही जनता तक भेजने के संदेष ग्रामों एवं चैपालों चैराहो पर डुन्डी पिटवा कर दिया करते थें । विज्ञान की खोज व भोतिकवादी युग की स्थापना के साथ प्रेस छापा खाने की खोज होने के वाद से भारतीय इतिहास में टंकण की व्यवस्था होने के कारण छपाई का कार्य ष्षुरू हुआ जिसमें भारत में भी सन् 1875 से समाचारों का प्रकाषन षुरू हुआ । धीरे धीरे समाचार पत्रों का प्रकाषन ष्षुरू हुआ जो सन् 1921 में समाचार पत्रो का रूप धारण कर चुके थें । देष को आजाद कराने में जो भूमिका समाचार पत्रो की रही वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानीओं की तरह थी देष के लोगों को जाग्रत करने केलिए समाचारों का प्रकाषन हेाता था तथा समाचार छापने के बाद अंगे्र्रजी हुकुमत के बिरूध्द समाचार वितरण करना भी बहुत कठिन था लेकिन देष के लोगांे आजादी केलिए समाचार पत्रों प्रेस में कार्य किया तथा लोगों को जाग्रत कर देष से अंग्रेजी हुकुम को उखाड़ फेकने मे पत्रकारों की अहम भूमिका रही है । देष की आजादी में देष के बीर ष्षहीदों के समान पत्रकारों ने अपनी भूमिका अदा की तथा देष आजाद होने के बाद हमारे महापुरूषों ने प्रेस की आजाद को बरकरार रखा । प्रजातंत्र का बनाये रखने केलिए चार स्तम्भ स्थापित किये जिसमें ं विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं प्रेस को रखा । प्रेस की आजादी का कुछ समय से दुरूपयोग हुआ और भारत देष को आजाद कराने बाले पत्रकार जो एक मिषन के रूप में देष सेवा देष प्रेम का कार्य करते थें आज वह पत्रकारिता को अपना व्यवसाय बनाकर कार्य कर रहे है ।
मेरी नजर में देष को आजाद कराने बाले पत्रकारों के पास आर्थिक धन का आभाव हआ करता था तथा साधनहीन हुआ करते थें तथा पत्रकार की पहचान पूर्ण रूप से देष एवं समाजसेवा होती थी, । देष आजाद होने के बाद सन् 1975 तक के पत्रकारो को मैने देखा कि वह स्वदेषी कपड़ांे के साथ सूती बस्त्र धारण करते थें एक जाकिट हुआ करती थी तथा गाॅधी छाप छोला एक काॅपी या डायरी एक पेन होता था पैदल चलते थें तथा यदि कोई पत्रकार सामर्थ है तो उसके पास साईकिल हुआ करती थी समाचार भेजने केलिए डाक तार विभाग का ही सहारा हुआ करता था । समाचार भेजने का एक मात्र साधन डाक विभाग हुआ करता था, इसलिए क्षेत्रीय खबरे सप्ताह या हर महीने पढ़ने का मिला करती थी । लेकिन सही सत्य व विष्वास पात्र समाचार हुआ करते थे । भारतीय राजनीति में उथल पुथल होने के बाद सन् 1980 से पत्रकारिता में उफान आना ष्षुरू हुआ तथा समाचार पत्रों के प्रकाषन की संख्या में तूफान की तरह विकाष हुआ कि देष में सैकड़ों नही हजारो ं समाचार पत्रों का पंजीयन हुआ , प्रत्येक राज्य में सैकड़ों पत्र पत्रिकायें पुस्तके समाचार पत्रों की संख्या में बृध्दि हुई । प्रत्येक समाचार पत्र के संपादक एवं पत्रकार ने देष प्रेम एवं देष सेवा का त्याग कर किसी न किसी रूप में धन संग्रह कर अपना वैभव, सम्मान, प्रतिष्ठा पाने केलिए राजनेताओं अधिकारियों कर्मचारियो के सामने कलम को गहने रखने का प्रयास किया जिससे देष में अन्याय अत्याचार, भृष्टाचार बढ़ता गया , सरकारों ने अपनी बात रखने केलिए सूचना तंत्र के नियम व कानून बनाये साथ ही पत्रकारों को अपने पक्ष मंे रखने केलिए विज्ञापन नीतिओं का निर्धारण किया । जिस कारण समाचार आम जनता के सामने निष्पक्ष व सुलझे नही पहुॅच सके । जो पुॅजीपति व राजनीति में दखल रखते थेां उन्होने अपने किसी न किसी रूप में समाचार पत्रों पर अधिकार प्राप्त कर लिये तथा अपनी बाप कहने केलिए अपने ही समाचार पत्रों का प्रकाषन कराया । आज देष की पत्रकारिता पूरी तरह पुॅजीपतिओं , राजनेताओं के इषारे पर नच रही है ।
प्रजातंत्र का चैथा स्तंम्भ कहा जाने बाली पत्रकारिता पूरी तरह से कैद हो चुकी है , विज्ञानिक खोज, भौतिक साधनो के बाद जो स्वस्थ्य एवं निष्पक्ष पत्रकारिता देष के आजाद होने तक होती तो आज देष में इतने बड़े घोटाले न होते , अन्याय व अत्याार आंतक न होता, भृष्टाचार की जड़े इतनी मजबूत न होती लेकिन समाचार पत्र का चलाना भी कठिन हो गया है किसी भी लघू समाचार पत्र देनिक हो या साप्ताहिक , पाक्षिक या त्रैमासिक पत्रिका हो सभी को आर्थिक सहयोग की आवष्यकता होती है यदि वह नेताओ सरकार पुॅजी पतिओं की चाटूकारिता नही करेगा तो उसका प्रकाषन संभव नही है जो समाचार पत्र दैनिक है और उनके पास करोड़ों रू0 की आय आज विज्ञापन पन से ही हो रही है वह किसी भी मुख्यमंत्री या कैवनिट मंत्री की तरह ही अपना जीवन व्यतीत कर रहे है ।
बर्तमान समय जो भी समाचार पत्रों के संपादक है उन्हे समाचार पत्र चलाने केलिए ऐजेन्षी देते है ऐजेषी का कार्ड दिया जावें न की उन्हे पत्रकारिता का कार्ड दिया जावे । समाचार पत्रों एवं चैनल के समाचार संवाद ऐजेन्षीओं को चाहिये कि वह किसी भी व्यक्ति को संवाददाता या व्यूरो चीफ नियुक्ति करते समय उसकी भौतिक सत्यापन करना चाहिये तथा नियुक्त के पूर्व सार्वजनिक सूचना प्रसारित की जावें जिससे उसकी चरित्रावली की जानकारी संपादक तक पहुॅच सकती है । यदि पत्रकारिता एक मिषन है तो संपादक एवं पत्रकारों को भी पत्रकारिता को व्यवसाय न बनाकर उसे समाजसेवा कर्तव्य निष्ठा एवं देष प्रेम की भावना से कार्य करना चािहये अन्यथा पत्रकारिता को कंलकित करने केलिए पत्रकारिता के क्षेत्र में नही आना चािहये । भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों के इतिहास का ज्ञान रखने बाले ही पत्रकारिता को अपना धर्म एवं कर्म समझ कर कार्य करें तो इस भारत देष में राम राज्य की कल्पना की जा सकती है अन्यथा कागज का घोड़ा कागजो तक ही सीमित बना रहेगा । भारत सरकार एवं राज्य सरकारों व्दारा मिलने बाली सुविधाये कुछ ही पत्रकारों को प्राप्त हो जाती है ग्रामीण एवं कस्बाई पत्रकारों की लगातार उपेक्षा होती आ रही है और आज भी हो रही है । जबकि समाचार की नींच कस्बाई पत्रकार ही होते है उनही उपेक्षा नही होनाी चाहिये । सरकारों को अपनी नीतिओं में परितर्वन करना चाहिये । साथ ही पत्रकारो को कानून का ज्ञान एवं अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति भी सचेत होना होगा । आज आजाद भारत के इस गण्तंत्र दिवस पर हम ष्षपथ लेकर संकल्प ले की हम यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करेगें तो देष प्रेम देष भक्ति केलिए करेगें, सत्य को उजाकर करेगें ।
पत्रकार कौन है ?
आम जनता की आवाज है पत्रकार, ।
मानव समाज की ष्षान है पत्रकार ।
अंधेरे को जो प्रकाष में बदल दे उसे कहते है पत्रकार ।
जनता की खबर सरकार को दे उसे कहते है पत्रकार ।
अपराधों, भृष्टाचार, अन्याय अत्याचार ष्षोषण की आवाज उठाता उसे कहते है पत्रकार ।
अपनी समस्याओं का त्याग कर, सुख चैन त्याग करदे, लिखने बाले को कहते है पत्रकार ।
जान हथेली पर रखके, अपनी मौत की खबर लिख देता है पत्रकार ।।
पत्रकारिता पर कविता
धरा बैच देते, गगन बेच देते,
चमन के पुजारी , चमन बैच देते
यदि होते न कलम के पुजारी ,
देष के कुछ भृष्ट राजनेता, अपना बतन ही बैच देते ।
पत्रकार को मौत से मत डर जाता है
पत्रकारिता एक मिषन है यह नौकरी व व्यवसाय नही है ।
देष प्रेम, बलिदान की कहानी हमारी इस कलम ने लिखी है
आज की पत्रकारिता देख मेरा दिल दहल जाता है ।
राजनेता, अधिकारी गुण्डा हर कोई पत्रकार को धमकाता है
यदि पत्रकार टिका रहे ईमान पर तो हर कोई हमारी कलम से घबराता है
देष के बीर सपूतों ने हमें आजादी किस तरह दिलाई, यह तू भूल जाता है
मोत तो आना ही है एक दिन, तू क्यो इन देष द्रोहीओं से डर जाता है ।
-सन् 1981 से लगाकार प्रिंट मीडिया के पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं.
अध्यक्ष
गणेश शंकर विद्यार्थी प्रेस क्लब
मध्य प्रदेश
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