विशेष : सब्जियों की भी हो सरकारी खरीद - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 27 जुलाई 2014

विशेष : सब्जियों की भी हो सरकारी खरीद

  • कानून का लाभ उठाकर बड़ें कारोबारी करते है कोल्ड स्टोरेज व गोदामों में प्याज व आलू आदि का भंडारण 
  • महंगाई रोकने के लिए सरकार सब्जियां खरीदकर सहकारी बाजार में बेचना शुरु करें तो आमदनी भी होगी और उपभोक्ताओं को फायदा भी 
  • सभी चीजों में टमाटर, आलू व प्याज का इस्तेमाल होने से लोगबाग ज्यादा परेशान 
  • जब भारत में टमाटर व आलू के दाम अधिक हो गए हैं, तो पड़ोसी देश को इक्सपोर्ट पर अुंकुश लगना चाहिए 

गत वर्ष भी प्याज एक बार 50-60 रुपये, टमाटर 80 रुपये, आलू 35 रुपये किलों के आंकड़ों छू गया था। इसलिए इसबार भी कुछ बड़े किसानों व व्यापारियों ने भावों के लालच में इनका स्टाॅक बचा रखा है। इसके चलते ही बाजार में आज बाजार में टमाटर 30 से 120, आलू 20 से 30, प्याज 20 से 35 रुपये किलो तक पहुंच गया है। मतलब साफ है, सब्जियों के दाम में लगातार महंगाई तभी काबू में होगी, जब सरकारें इसकी भी खरीद करें। अगर सरकार सीधे तौर पर सब्जी की खरीद करके बेंचे तो उपभोक्ताओं को काफी हद तक महंगे भावों से निजात मिल सकती है। हर साल प्याज के भाव बढ़ने पर सरकार सहकारी दुकानों पर वाजिब दामों पर प्याज बेचने की व्यवस्था करती है। यही फार्मूला यदि सब्जी मंडी स्तर पर लागू कर दिया जाएं तो जनता को भारी राहत मिल सकती है। 

बता दें, आलू, प्याज, टमाटर आवश्यक वस्तु अधिनियम में नहीं आते इसलिए रसद विभाग चाहकर भी कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। इसी का लाभ उठाकर बड़ें कारोबारी कोल्ड स्टोरेज व गोदामों में प्याज व आलू आदि का भंडारण कर रखे है। त्योहारी सीजन में मानसून की देरी के चलते व कम बारिश होने से बाजार में आलू-प्याज-टमाटर की आवक कम होने से इनके दाम बढ़ हर रोज बढ़ रहे है। बड़े स्टाॅकिस्ट कारोबारी इसी मौके का लाभ उठाकर अब भंडारण से निकालकर मार्केट में महंगे दामों में बेच रहे है। ऐसे में इस पर काबू पाने के लिए कारगर कदम उठाए जाने की जरुरत है। मेरा मानना है कि देश के सभी राज्यों की हर जिले में अपनी मंडी है। अन्य सामाग्रियों की तरह सरकार सब्जियों की भी खरीदारी करें तो कुछ हद तक कालाबाजारी पर अंकुश लग सकता है। वर्तमान में सब्जी मंडियों में लाखों कुंतल सब्जियों की आवक हो रही है। हालांकि यह आवक निजी होती है, लेकिन जमीन मंडी की होने से आवक की मात्रा व भावों से संधारण मंडी प्रबंधन के स्तर पर किया जा रहा है। ऐसे में निजी स्तर पर होने वाली इस आवक की तरह ही सरकार अपने स्तर पर ही कुछ मात्रा में सब्जियां खरीदकर सहकारी बाजार में बेचना शुरु करें तो सरकार को आमदनी भी होगी और उपभोक्ताओं को भी फायदा होगा। सरकारी स्तर पर सब्जियों की खरीद नहीं होने से छोटे व्यापारी जो 4-6 का समूह बनाकर एक टक प्याज-टमाटर या आलू खरीदते है और फिर से उसे आपस में बांट लेते है। यहीं सब्जियों छोटे खुदरा व्यापारियों को बेची जाती है। खुदरा विक्रेता शहर से लेकर देहात तक के अधिकतम लोगों तक पहुंचाते है। भले ही बिचैलियों खूब मुनाफा कमा रहे हो लेकिन काश्तकार बमुश्किल तीस से चार रुपये किलों तक टमाटर बेचने को मजबूर है। बारिश से फसल नष्ट होने से विचैलियों ने स्टाॅक कर रखा है। यूपी में देर से बारिश होने के नाते सप्ताहभर में सब्जियों के दाम चार गुना बढ़ गए है। इसमें सबसे ज्यादा मार टमाटर, आलू व प्याज पर पड़ रही है। इससे टमाटर 30 रुपये से सीधे 120 रुपयेे, आलू 20 से 30, प्याज 20 से 30, पत्ता गोभी 15 से 50, गाजर 20 से 50, शिमला मिर्च 60 से 100, बैगन 20 से 30, कटहल 20 से 30, करेला 20 से 30, खीरा 5 से 10, लौकी 20 से 30, फूल गोभी 20 से 50, अदरक हरी मिर्च 40 से 60 हो गया है। लगभग सभी चीजों में टमाटर, आलू व प्याज  का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए दाम बढ़ने से ग्राहक सबसे ज्यादा परेशान है। कारोबारियों के मुताबिक सूबे में बारिश देर से होने से यहां टमाटर की पैदावार की कम हुई है। इसके चलते दिल्ली व शिमला से टमाटर मंगाया जा रहा, जो 45 रुपये किलों के हिसाब से पड़ रहा है। साथ हो जो टमाटर के क्रेट बाहर से आ रहे है, उनमें काफी मात्रा में खराब भी निकल रहे है, जिसकी वजह से टमाटर के दाम बढ़ रहे है। इनके मुताबिक टमाटर यहां तभी सस्ता हो सकता है, जब दुसरे राज्यों में हो रही बारिश रुकेगी। 

केन्द्र सरकार ने लोकसभा में कहा, देश में करीब 18 फीसदी फल और 12 फीसदी सब्जियां प्रर्याप्त भंडारण न होने और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं के अभाव में बर्बाद हो जाती है। जिससे इनके दाम में इजाफा हो रहा है। मई 2014 में फलों का खुदरा मूल्य 23 फीसदी, सब्जियों का मूल्य 15 फीसदी, दूध उत्पाद 11 फीसदी और अंडा, मांस मछली के मूल्यों में 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई। मतलब खाद्य मुद्रास्फीति जून महीने में 10 फीसदी तक गिर गई लेेकिन कम मानसून के कारण खाद्य पदार्थो की कमी का खतरा बना है। भारत, दूध, दाल, मछली, मुर्गीपालन में शीर्ष उत्पादक है जबकि फलों, सब्जियों, चावल, गेहूं और गन्ना का दुसरा सबसे ज्यादा उत्पाद करने वाला देश है। फिर भी खाद्य पदार्थो की बढ़ती कीमतें भारत के लिए सबसे मुश्किल आर्थिक चुनौती पैदा कर रहे है। क्या यह महज मौसमी मांग और बेमेल आपूर्ति की वजह से है या सरकारों के कुप्रबंधन का नतीजा है। क्या जमाखोरों पर प्रतिबंध लगाने या वायदा कारोबार पर से रोक लगा देनेे से खाद्य महंगाई पर अंकुश लग जायेगा। जबकि कारोबारियों का कहना है कि मानसूनी बारिश की स्थिति अब तक उत्साहजनक नहीं रही है। हालांकि हाल की वर्षा से कुछ उम्मीदें जगी हैं, फिर भी आगामी महीनों में महंगाई बढ़ने के पूरे आसार हैं। जुलाई इस सीजन का सबसे अहम महीना है और अगस्त के पहले हफ्ते तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। तब तक पता चल जाएगा कि इस साल कृषि क्षेत्र की स्थिति कैसी रहेगी। उत्पादन कम रहने पर दाम बढ़ना स्वाभाविक है। फसलों की बुवाई के लिए जुलाई की काफी अहमियत होती है। जाहिर है, खरीफ उत्पादन के लिहाज से भी यह महीना बहुत अहम है। असल में ५० प्रतिशत खरीफ उत्पादन जुलाई में होने वाली बारिश पर निर्भर करता है। इसलिए इस माह होने वाली बारिश पर एक हद तक कृषि क्षेत्र की सेहत निर्भर करेगी। महंगाई में हालिया बढ़ोतरी एक हद तक सब्जियों के दाम बढ़ने की वजह से हुई है। हालांकि कुछ सब्जियां बारहों महीने उपलब्ध होती हैं। बावजूद इसके सामान्य से कम मानसूनी बारिश की स्थिति में प्याज, आलू और टमाटर के दाम हमेशा बढ़ते हैं। वैसे भी 

आलू और प्याज की ऊंची कीमतों के बाद अब महंगाई में टमाटर जहां और लाल हो रहे हैं, वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान में टमाटर की सप्लाई करने के लिए नासिक के टमाटर खेत बिक चुके हैं। पाकिस्तान ने भारत से 10 हजार टन टमाटर मांगा है, जिसे ईद के बाद भारतीय मंडी से अटारी बॉर्डर इंटीग्रेटिड चेक पोस्ट (आइसीपी) से भेजा जाना है। भारतीय मंडी में दिल्ली, मुंबई व चेन्नई में टमाटर का भाव प्रति किलो 50 से 60 रुपये किलो पहुंच गया, जबकि खुदरा भाव 70 से 80 रुपये पहुंच गया। पाकिस्तान पंजाब के खेतों के टमाटर की बजाय नासिक के खेतों के टमाटर को तरजीह देता है। इसी कारण पाकिस्तान में टमाटर भेजने के लिए नासिक के किसानों की एडवांस बुकिंग दो महीने पहले हो चुकी है। पंजाब की मंडी में टमाटर के थोक भाव 40 से 50 रुपये किलो है, जबकि नासिक का टमाटर मंडियों में कम दिख रहा है। पिछले सप्ताह दो ट्रक टमाटर पाकिस्तान गए थे, जो नासिक से आए थे। ईद के बाद टमाटर पाकिस्तान जाने से भारत की मंडियों में टमाटर के दाम और बढ़ेंगे। महंगाई के लिए पाक भी जिम्मेदार है। जब भारत में टमाटर व आलू के दाम अधिक हो गए हैं, तो हमें क्या जरूरत है पड़ोसी देश को भेजने की। अच्छे दिन आने वाले हैं, सरकार अच्छे दिन लाने का प्रयास करे। त्यौहारों का सीजन आ रहा है और महंगाई आसमां छू रही है। टमाटर और आलू दोनों को पाकिस्तान भेजने पर पाबंदी लगा देनी चाहिए, जब पाकिस्तान हमें प्याज नहीं देता तो हम उसे क्यों जरूरत पड़ने पर आलू-टमाटर समेत सब्जियां देते हैं। 





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---सुरेश गांधी---

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