200 युवाओं ने एक दिवसीय धारण किया संयम जीवन, भिक्षु दयाव्रत का हुआ विषाल आयोजन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 25 अगस्त 2014

200 युवाओं ने एक दिवसीय धारण किया संयम जीवन, भिक्षु दयाव्रत का हुआ विषाल आयोजन

  • संस्कारवान जीवन जीने का दिया प्रतिबोध
jain sandesh
बैंगलोर । श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, सिटी शाखा द्वारा फीडम पार्क में पुर्यषण पर्व का द्वितीय दिवस दयाव्रत के रुप में मनाया गया। जिसमें 3 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक के 200 बच्चों, युवाओं ने भाग लिया। भिक्षु दयाव्रत करने वाले साधकों ने प्रातकाल सामायिक गणवेष धारण किया उसके पश्चात् सिटी जैन स्थानक से रैली के रुप में विहार कर सभा स्थल पर पहुंचें। प्रवचन श्रवण किया। उसके उपश्चात् जिस प्रकार मुनि घर - घर जाकर गोचरी लेकर आते है वैसे 6 - 6 भिक्षु दयाव्रत आराधकों के ग्रुपों ने अलग अलग मोहल्लों में जाकर गोचरी ली और स्थानक भवन में आकर गोचरी की। 

इससे पूर्व खचाखच भरे पांडाल के गुरु पुष्कर देवेन्द्र सभागार में उपस्थित श्रद्वालुजनों को संबोधित करते हुए उपप्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कहा कि जीवन के 50 वर्ष निकल जाएं तो समझो कि वृद्धावस्था की ओर चल पड़े हो। बचपन में ज्ञान का, जवानी में ध्यान का और बुढ़ापे में पुण्य का अर्जन करो। छोटे बच्चों के पैर और बुढ़ापे में व्यक्ति की जुबान अधिक चलती है। तुम्हारी जवानी कैसी बीती, इसका प्रमाण पत्र बुढ़ापा है। 

सलाहकार दिनेष मुनि ने प्रवचन में कहा कि जैन धर्म में सामायिक समता भाव को साथ किया जाने वाला आत्मा का धर्माचरण है। सामायिक का अर्थ है अच्छा सोचना, अच्छा करना और विवेकपूर्णक करना। यह धर्म साधना करने का, उपासना करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। सामायिक 48 मिनिट के काल में व्यक्ति पापकारी कार्यों से दूर रहता है एवं श्रद्धा भक्ति से जय व स्वाध्याय करता हुआ प्रेक्षाध्यान के द्वारा अपनी आत्मा को अनुभव करने का, देखने का प्रयास करता है। सामायिक धार्मिक संस्कारों को ग्रहण करने एवं विकसित करने का एक महत्वपूर्ण ही नहीं अति महत्वपूर्ण उपक्रम है। सामायिक करते समय यह ध्यान रहना चाहिए कि मैं यह साधना क्यों कर रहा हूं। मेरा आज का लक्ष्य क्या है। सामायिक क्रोध को शांत करने का तप है। इस तप से दर्शन, ज्ञान एवं चारित्र के रत्न निकलते हैं एवं घर-परिवार में धर्म के संस्कार आने है। साहित्यकार सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि यहसंसार का अटल नियम है कि जो जैसा करेगा, उसे वैसा ही फल भोगना होगा। हमारे इस जन्म के कर्म कैसे हैं इसी पर अगला जन्म तय होता है। हम सुबह से शाम तक कर्मों का ही तो संचय करते हैं, अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उन कर्मों से पुण्य मिलेगा या पाप की गठरी बंध रही है।

डॉ. पुष्पेन्द्र मुनि ने कहा कि जीवन में सफलता मिलना अलग बात है और उस सफलता की सार्थकता अलग बात है। व्यक्ति सफलता तो छल करके भी प्राप्त कर लेता है, लेकिन ऐसी सफलता का कोई महत्व नहीं होता। तुम आज यदि ऊंचाई पर पहुंच गए तो जरूरतमंदों की मदद करो। सद्कार्यों को अपने जीवन में शामिल करो, तभी तुम्हारी सफलता की सार्थकता होगी। माथे पर चंदन लगाने से व्यक्ति महान नहीं बनता। तुम किसी के जख्मों पर मरहम लगाओ तो चंदन की शीतलता से तुम्हारा जीवन महक उठेगा। दयाव्रत करने वाले श्रद्धालुओं को सम्मानित किया गया।

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