2013 के सांप्रदायिक दंग¨ं के बाद किश्तवाड़ के च©गान (मैदान) की एक शाम कुछ इस तरह गुलजार ह¨ती है। च©गान के एक क¨ने में ड्यूटी पर लगे पुलिसवाले क्रिकेट खेलते हैं त¨ वहीं पांच-सात छात्र¨ं का एक समूह क्रिकेट खेलते हुए अपने क¨ने पर कब्जा जमाए ह¨ता है। कुछ युगल अ©र वृद्ध¨ं का एक समूह अ©र कुछ महिलाअ¨ं का झुण्ड भी किश्तवाड़ के इस च©गान के जादूई माह©ल का फायदा उठा रहे होते हैं। च©गान के क्रमशः उŸारी अ©र दक्षिणी क¨ने पर स्थित शाह-फरीदु-दिन-बगदादी की मजार अ©र ग©री कुण्ड का मंदिर द¨न¨ं ही इस सम्म¨हित करने वाले परिदृश्य के आकर्षण क¨ अ©र बढ़ा देते हैं। कुछ ल¨ग घूमने के लिए बजार जाने के बजाए च©गान जाना ज्यादा पसंद करते हैं।
सुनने में मिथक सा प्रतीत ह¨ता है किंतु वास्तविकता यही है कि किश्तवाड़ शहर के च©गान अ©र बाजार, ज¨ 2013 के दंग¨ं के केंद्र में थे, ही वे जगहें जहां पर सांप्रदायिक सद्भावना पनप सकती है। यह सर्वविदित है कि 2013 में अगस्त के महीने में ईद के दिन च©गान से सांप्रदायिक दंगे शुरु हुए थे अ©र अपनी विनाशलीला में इसने किश्तवाड़ बजार की करीब 100 दुकानें फूंक दीं। दिलचस्प बात यह है कि यह च©गान अ©र बाजार केवल हिंसा क¨ ही चित्रित नहीं करते हैं बल्कि यह किश्तवाड़ शहर के लिए अमन अ©र चैन का चित्रण भी करते हंै। इसे समझना अ©र प¨षित करना किश्तवाड़ के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है।
किश्तवाड़ का बजार हमेशा की तरह आज भी हर तरह के ध्रुवीकरण के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ा है अ©र अभी भी अपनी ऊर्जा क¨ द¨न¨ं समुदाय¨ं के बीच अंतर-निर्भरता अ©र अंतर-संबंध का स्र¨त बनने में इस्तेमाल कर रहा है। किश्तवाड़ बजार में एक बहुत ही उल्लेखनीय व्यवस्था चलती है। यहां पर ज्यादातर दुकानें मुसलमान¨ं की हैं अ©र उसमें किराएदार हिंदु व्यापारी हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह व्यवस्था एक लंबे अर्से से चली आ रही है। लेकिन दंग¨ं के समय यही दुकानें दंगाईय¨ं का निशाना बनीं। नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक व्यापारी ने बताया,‘‘मैं मुख्य बजार से अपना धंधा हटाने के बारे में स¨च रहा हूं क्य¨ंकि ऐसी किसी भी तरह की घटना में यह बार-बार दंगाईय¨ं का निशाना बनता है। आप क¨ क्या लगता है किसी के लिए हर पांच साल में तबाह ह¨कर फिर आबाद ह¨ना आसान ह¨ता है।’’
छिनने का दुख अ©र फिर से बनाने का ब¨झ द¨न¨ं ही बहुत ज्यादा ह¨ता है। शहर से ताल्लुक रखने वाल¨ं अ©र यहां के मूल निवासिय¨ं क¨ द¨न¨ं क¨ मिलकर इस नाजुक व्यवस्था के बारे में कुछ स¨चना ह¨गा, नहीं त¨ यह हमेशा ही इसी तरह दंगाईय¨ं का निशाना बनता रहेगा। सामाजिक विज्ञान के प्र¨फेसर गुलाम च©धरी ने कहा,‘‘यह एक प्रशंसनीय व्यवस्था है ज¨ आपसी लाभ अ©र पारस्परिक रिश्त¨ं के जरिए सभी क¨ फलने-फूलने का अवसर देती है। यह सभी के लिए उŸाम व्यवस्था अ©र इसका संरक्षण किया जाना आवश्यक है।’’ उन्ह¨ंने कहा कि पारस्परिक संबंध¨ं क¨ कमज¨र करने वाली किसी भी क¨शिश क¨ ध्रुवीकरण राजनीति से बल मिलेगा अ©र यह भविष्य में शांति के स्थायित्व अ©र जीवन के लिए बहुत ही नुकसानदायक ह¨गा।
बार-बार ह¨ने वाले सांप्रदायकि दंग¨ं की वजह से च©गान अ©र बजार द¨न¨ं ही आशा अ©र निराशा के बीच में झूल रहे हैं। कभी-कभी ये एक दूसरे के पूरक भी बनते हैं। बारहवीं के एक छात्र राहील ने बताया,‘‘मैं बजार जाया करता था लेकिन दंग¨ं के बाद मेरी मां ने बजार जाने के लिए मना कर दिया त¨ हम बजार के बजाए च©गान जाने लगे।’’ उसके द¨स्त ने बताया,‘‘मैं बाजार जाना पसंद नहीं करता, मेरी मां अब मुझे थ¨ड़ी-थ¨ड़ी देर पर फ¨न करती रहती हैं अ©र वह चाहती हैं कि मैं जल्दी-जल्दी से घर पहुंच जाया करुं।
सभी समस्याअ¨ं के बावजूद च©गान ने धार्मिक समार¨ह¨ं क¨ जगह देकर अ©र बहुत से किश्तवाडि़य¨ं क¨ सहय¨ग प्रदान कर अपनी जीवटता क¨ बनाए रखा है। त©सीर (परिवर्तित नाम) जी का कहना है,‘‘च©गान सभी का है फिर चाहे वह शहर का ह¨ या शहर से बाहर का। यह शहर के बाहर से जिले के प्रशासनिक दफ्तर¨ं अ©र संस्थाअ¨ं में काम के लिए आए ल¨ग¨ं क¨ द¨ पल सूकून के अ©र जगह देता है।’’ इस हिंसा का एक अन्य दुष्परिणाम ज¨ युवाअ¨ं क¨ निराश करता है वह है खेल¨ं में बाधा। बी.एस.सी प्रथम वर्ष के छात्र श्रीकान्त (परिवर्तित नाम) ने कहा,‘‘हर साल इन दिन¨ं में हमारे वरिष्ठ साथी च©गान में क्रिकेट टूरनामेंट आय¨जित करवाते थे, लेकिन इस साल तनावग्रस्त माह©ल की वजह से यह निरस्त ह¨ गया।’’ किश्तवाड़ के बजार की सिकुड़ती जिंदगी पर टिप्पणी करते हुए एक ढाबे के मालिक ने बताया कि पहले यह बजार जम्मू के किसी भी अन्य बजार की तरह रात क¨ देर तक चलता था लेकिन इन दंग¨ं के बाद से अब हमें शाम 7ः00-7ः30 तक दुकान बंद कर देनी ह¨ती है। हालांकि राहील, त©सीर अ©र श्रीकांत जैसे युवाअ¨ं की बात¨ं में एक बहुत ही कमज¨र लेकिन आवश्यक बात झलकती है जब वह यह कहते हुए हिंसा के आर¨प क¨ दूसरी जगह आर¨पित करते हैं,‘‘यह सब नेता करवाते हैं। उन्हें (पुलिस अ©र नगर प्रशासन) क¨ सख्त ह¨ना चाहिए जिससे कि भविष्य में यह सब दुबारा न ह¨ सके।’’ उम्मीद करते हैं कि उनका यह आकलन सही साबित ह¨। साथ ही बिना कुछ कहे वह यह भी कह जाते हैं कि किश्तवाड़ की जनता हिंसा में यकीन नहीं रखती है। यदि च©गान अ©र बाजार क¨ एक बार भी ब¨लने का म©का मिले त¨ शायद वह यहीं ब¨लेंगे कि अपने उदार अ©र विनीत स्वभाव के बावजूद क्या हम इसी लायक हैं कि हमें रक्तरंजित, बदशक्ल अ©र घायल किया जाए। अ©र उससे भी ज्यादा अगर हम आप सभी क¨ सुख अ©र दुख सभी घडि़य¨ं में खुद में समाहित कर सकते हैं त¨ क्या आप एक दूसरे क¨ समाहित नहीं कर सकते?
डाॅ. संदीप सिंह
(चरखा फीचर्स)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें