पारिस्थितिकी तंत्र में हर पशु पक्षी का अपना स्थान अ©र अपना महत्व है। किसी भी प्रजाति की बहुलता या किसी की विलुप्तता द¨न¨ं ही दीर्घकालिक तौर पर इस तंत्र क¨ नुकसान पहुंचाती है। ऐसा ही एक पक्षी है गिद्ध ज¨ आज विलुप्तता की कगार पर खड़ा है। खुले आसमान में बड़े-बड़े डैने फैलाकर उड़ान भरने वाला गिद्ध कभी गांव या शहरों के सड़क किनारे सड़े हुए पशुओं का मांस खाने को आतुर गिद्ध का झुंड बच्चों को हवाई जहाज से कम नहीं दिखता था। उनकी वजह से आसपास का वातावरण दुर्गंध मुक्त था। चंद घंटों में सड़ी-गली लाशों को चट करने की अद्भुत शक्ति थी। गिद्धराज पर्यावरण के सफाईकर्मी के रूप में वातावरण की शुद्धता व संतुलन को बनाये रखता था। ’रामायण’ में जटायु व गिद्ध के नाम साहस एवं बलिदानी से जुड़ा हुआ है। एकबार जटायु अंतरिक्ष की इतनी उंचाई तक पहुंच गया कि वे सूर्य की प्रचंड लपटों में झुलसने लगा। गिद्धों ने डैने फैलाकर जटायु की जान बचायी। प्राचीन कथाओं में गिद्धों को प्रेमी युगल के रूप में जाना जाता है। वे आकाश में प्रेमी जोड़े बनाकर उड़ते हैं। इन पक्षियों में प्रेम का अटूट बंधन होता है। ’इंडियन बर्ड्स’ के लेखक डाॅ सालिम अली ने लिखा है कि गिद्ध भगवन का भस्मक मशीन के रूप में है। गिद्ध गर्मी व विशाल पेड़ वाले क्षेत्रों में अधिक रहना पसंद करते हैं। गिद्धों का एक झुंड बैल या सांड को 30-60 मिनट में चट कर सकता है। कई ऐसी किवदंतियां है जिसमें गिद्धों को आध्यात्मिक व पर्यावरण का हितैषी बताया गया है। पर्यावरण का यह हितैषी एवं सफाईकर्मी अलग-अलग देशों में कई रूप-रंगों में पाया जाता है।
इन सभी तथ्य¨ं के बावजूद आज ज¨ बात जमीनी स्तर पर खड़ी है वह यह कि यह प्राकृतिक रूप से लाभकारी पक्षी अपनी विलुप्तता के कगार पर खड़ा है। दक्षिणी एशिया में गिद्ध की तीन प्रजातियां 97 प्रतिशत तक विलुप्त ह¨ चुकी हैं वहीं एक प्रजाति त¨ 99.9 प्रतिशत तक विलुप्त ह¨ चुकी है। गिद्ध¨ं की विलुप्तता की प्रक्रिया ड¨ड¨ समेत बहुत सी जंगली पक्षिय¨ं से ज्यादा तेजी से हुई है। भारत में इनकी 9 प्रकार की प्रजातियां हैं। डेढ़ से दो दशक में गिद्धों की संख्या 97 प्रतिशत नष्ट हो गयी है। 20 वर्ष पहले तक भारत में गिद्धों की संख्या लगभग 9 .5 लाख थी। अब उनकी संख्या मात्र 3-4 हजार ही शेष रह गयी है। गिद्धों की तीन प्रजातियां (व्हाइट बैक्ड, स्लेंडर बिल्ड, लाॅग बिल्ड) तेजी से विलुप्त होती जा रही है। यह पर्यावरण के परिस्थितिकीय चक्र के लिए अशुभ संकेत है। साउथ एशिया क्लामेट चेंज फेलोशीप कर रहें, संतोष सारंग कहते हैं कि तेजी से बढ़ रहा शहरीकरण, खेतों में अंधाधुंध कीटनाशक के इस्तेमाल, वायु प्रदूषण, विशाल पेड़ों की कटाई व पशुओं में दी जाने वाली दवा डायक्लोफेन्स सोडियम की वजह से गिद्धों की मौत हो रही है। भारत सरकार ने इस दवा पर रोक लगा दी है। इसकी जगह पर दूसरी दवा दी जा रही है। दुधारू पशुओं में दी जाने वाली हार्मोन आॅक्सिटाॅक्सीन भी गिद्धों की मौत की वजह है। गाय या भैंस पालने वाले लोग दूध निकालने के चक्कर में इस इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि दवा पर रोक है, इसके बावजूद दवा दुकानों में दो-चार डब्बे मिल जायेंगे। सामाजिक कार्यकर्ता नीरज कुमार कहते हैं कि मानव निर्मित पर्यावरण की वजह से परिस्थितिकीय चक्र प्रभावित हुआ है। लोग अधिक फायदे के चक्कर में गाय व भैंस को इंजेक्शन देकर दूध निकालने लगे हैं। खासकर किसानों व पशुपालकों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है। जब इन्हें मालूम हो जायेगा, तो स्वाभाविक रूप से इजेक्शन देने के पहले सौ बार सोचेंगे और नतीजा भी अच्छा निकलेगा।
बहुत कम लोग जानते हैं कि पर्यावरण संतुलन में गिद्धों की भूमिका कितनी व्यापक है। गिद्धों के गंजा (ंउघड़ी चमड़ी) सिर ताप को नियंत्रित करती है। मृत जीव गिद्धों का खुराक है। सड़े-गले मांस से गिद्धों की भूख मिटती है। गिद्ध हमारे स्वास्थ्य व पर्यावरण की सफाई करने वाला अद्भुत प्राणी है। मनुष्य में संक्रामंक रोग रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बाढ़ व प्रकृति त्रासदी के बाद मर पशु-पक्षियों, सड़े-गले शवों से फैलने वाली घातक कीटाणुओं को फैलने से रोकता है। लेकिन समय के साथ-साथ मानव निर्मित पर्यावरण की वजह से खाद्य श्रृंखला पर गहरा प्रभाव पड़ा है। खेतीबारी में डीडीटी, एल्ड्रींग आदि के प्रयोग से गिद्धों की मौत हो रही है। जिस कारण गिद्धों की प्रजनन क्रिया भी प्रभावित हुई है।
सबसे बड़ी बात है कि गिद्ध झुंड में रहते हैं और मौत भी झुंड में होती है। 2010 में नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में करीब 30 गिद्धों की सामूहिक हादसे में मौत हो गयी थी। ट्रेन की पटरी भी गिद्धों की मौत के लिए जिम्मेवार है। इससे पहले भी एक्सप्रेस ट्रेन के चपेट में आने से हाथी, गेंडा आदि जानवरों की मौते हुई हंै। गिद्धों की मौतों को देखते हुए अप्रैल 2006 में केंद्र सरकार ने गिद्ध संरक्षण के लिए कार्य योजना बनायी थी। पशुओं पर नुकसानदायक दवाओं पर रोक लगाने की कवायद व प्रजनन केंद्र खोलने की घोषणा की गयी थी। पर, गिद्ध संरक्षण जमीन पर कम कागज पर ज्यादा हुआ। प्रथम गिद्ध संरक्षण केंद्र हरियाण में स्थापित हुआ। पश्चिम बंगाल व असम में भी केंद्र खोलने की अनुमति मिली थी। लेकिन यह सारा प्रयास ढाक के तीन पात साबित हुए। भारत, पाकिस्तान, नेपाल में सर्वेक्षण से खुलासा हुआ है कि गिद्धों के शरीर में दर्दनाशक दवा डायक्लोफेनिक के अवशेष मिले हैं। यह रसायन मरे हुए पशुओं के मांस खाने से गिद्ध में जहर बना है। गिद्धों की मौते किडनी, लीवर आदि की खराबी के कारण हुई है। हालांकि गिद्ध¨ं की प्रजाति क¨ विलुप्ति से बचाने के लिए सेव-वल्चर अ©र वल्चर रेस्क्यू जैसे बहुत से छ¨टे-बड़े संगठन प्रयासरत है किंतु यह साफ है कि इन संगठन¨ं क¨ जब तक प्रशासन अ©र आम जनता का सहय¨ग नहीं मिलेगा तब तक इन सभी संगठन¨ं की क¨शिशें ज़ाया ह¨ती रहेंगी।े
बुद्धिजीवियों का मानना है कि गिद्ध मुर्दाखोर है। विकृत शरीर को देखकर लोग डर जाते हैं। पर, यह प्राणी धरती पर पसरे सड़े-गले मांस को पचाने की विचित्र क्षमता रखता है। आज तो किसी जानवर की मौत हो जाये तो सड़क किनारे लोग लाश को फेक देते हैं। पहले गांव में पशुओं की लाश ले जाने के लिए चर्मकार समुदाय आगे आता था, क्योंकि इनके आजीविका का आधार चमड़ा था। अब तो किसान/पशुपालक स्वयं लाशों को सड़क किनारे फेकने लगे हैं। लाश को मिट्टी में दफनाने वालों की संख्या ना के बराबर है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से लाश सड़ेगी तो संक्रामण फैलेगा व हैजा, फेंफड़े आदि के रोग होंगे। ब्रिटेन के राॅयल सोसायटी के शोध में कहा गया है कि भारत में सरकार जरूर प्रतिबंध लगाया है, पर डायक्लोफेनिक की मार्केटिंग गांव-शहरों में खूब हो रही है। निरक्षरता व जागरूकता की कमी की वजह से गिद्धों का समुचित संरक्षण नहीं हो रहा है।
साइंस जानकार सह अध्यापक किसलय कु. सिंह मानते हैं कि पशु-पक्षी अभयारण्य संस्था को दुर्लभ पक्षियों की प्रजातियों को बचाने के लिए अभियान चलाना चाहिए। बच्चों के पाठ्यक्रम में पशु-पक्षियों को बचाने के लिए प्रेरणात्मक कहानी को शामिल करना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी कहानियों के जरिये दुर्लभ पक्षियों की ओर आकृष्ट होंगे और पर्यावरण को बचाने में अहम् भूमिका अदा करेंगे। जिस रफ्तार से परिस्थितिकीय चक्र बिगड़ रहा है, किसान खेतों में कीटनाशक प्रयोग कर रहे हैं व पशु चिकित्सक मवेशियों को दर्द दूर करने के बजाय प्रतिबंधित दवा चला रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब धरती संकटकाल से गुजरेगी। प्राणियों की सांसे थमने लगेगी। समय रहते दुर्लभ प़िक्षयों के संरक्षण और उत्थान की जोड़दार वकालत नहीं हुई तो गिद्धों को बचाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी होगा।
अमृतांज इंदीवर
(चरखा फीचर्स)

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