चत्तारिपरमंगाणिए दुल्लहाणीय जंतुणो
माणुसत्तं सुई सद्धारए संजमम्मि य वीरियं
आत्म प्रक्षालन में आत्मानुषीलनए आत्माभिव्यक्तिए आत्मचिंतन एवं आत्मा के विषुद्ध भावों की प्रमुखता होती है। मनुष्य जीवन में विषुद्धी आत्मा स्वरूप से पूर्व यह चिंतन किया जाता है कि मैं मनुष्य हूँए मेरा कर्म धर्मश्रवण हैए मेरी शक्ति आस्था के विविध आयामों पर केन्द्रित है और मैं विषुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित संयम पुरूषार्थ से ऊपर भी हूँ।
मैं हूँ मनुष्यरू मननषील व्यक्तिए चिंतनषील व्यक्ति एवं भेदविज्ञान करने वाला मानव भी हूँ। मानव में स्थित में शरीर इन्द्रियए स्थान और पदार्थ की सिद्धि का ध्यान रखता हूँ क्योंकि मनन की क्षमता इसके बिना नहीं हो सकती है।
आत्मानुषीलन का पर्व . पर्युषण।
हम सभी जानते हैं कि मैं मानव से मननषील बना हुआए आत्म साधना के लिएए संयम एवं तपराधना की ओर उन्मुख होता हूँए पर्यूषण की आराधना में यही तो है कि जो कुछ भी संसार में उपार्जित कार्य किए वे अज्ञान से परिपूर्ण हैए अज्ञान अवस्थित है। आध्यात्मिक चिंतन के पर्व में नई सोच एवं नई दिषा की प्राप्ति होती है इसलिए पर्युषण महापर्व पर जो चिंतन किया जाता है वह सांसारिक पदार्थों से विमुक्ति की ओर ले जाता है मानव भव दुर्लभता से प्राप्त होता है उसमें भी उत्तम धार्मिक कुल के साथ.साथ आत्म जागृति के मार्ग वाले महान् पर्व पर्युषण मनाने का सौभाग्य जिन्हें प्राप्त होता है वे अपने आपको क्षमाषील बनाने में समर्थ होते हैं। वे आध्यात्मिकता के रंग में रंगे हुए व्रत प्रत्याख्यान एवं तप करने वाले साधना वर्ग की साधना से अलंकृत होते हैं। पर्युषण में आध्यात्मिक धार्मिक एवं मन को प्रषांत रूप बनाने के साधन रहते हैं तभी तो इस पर्व की पवित्रता में आमोद.प्रमोद जैसे भाव खान.पानए हंसी.मजाक आदि कुछ भी नहीं रहते हैं अष्ठ दिवसीय इस महापर्व में सामान्य पहनावा होता है और इसके विश्राम में भूषयन अथवा चटाई का आसन ही होता है इससे जीवन में एक नये परिवर्तन के भाव जागृत होते हैं। मानवीय भावना उच्च षिखर तक पहुँचती है तब यह कहना पड़ता है कि उपषांति के इस पावन पर्व में वैराग्य की वृद्धिए स्वाध्याय की आत्मशुद्धि एवं क्षमा की असीम शक्ति के दर्शन होते हैं। इस अवस्था में स्थित साधक वर्गवरण एवं अन्य सभी विवादों को भूलाकर आत्म.षुद्धि शांति एवं समतामय जीवन के कारणों को प्राप्त करता है।
पर्युषणरू आत्मा के सन्निकट जाने का मार्गरू
पर्युषण में उपासना ही उपासना होती है आत्मदर्षन से परमात्म दर्षन के सिद्धए बुद्ध एवं मुक्त स्वरूप के विषिष्ट भाव होते हैं इसकी उपासना में वही व्यक्ति स्थित होते हैं जो क्षमा के महासमुद्र में गहराई को लेकर बैठते हैं उस गहराई में भी ज्ञानए दर्षनए चारित्र और सम्यक् तप की उपासना होती है। आत्मा की शुद्धि का यह महापर्व जब अष्ठ दिवस रूप में चलता है उस समय तपस्या ही तपस्या होती है प्रत्याख्यानए प्रतिक्रमण एवं आराधना के भाव भी होते हैं। इसमें वाद.विवादए मतभेदए मनभेदए ईष्र्याए कलह एवं अहंकार का किंचित् मात्र भी स्थान नहीं होता है। इसकी शुद्धि में उपषमन एवं त्याग तप की महानता भी है।
पर्युषण के इस क्षमापण में क्या होता है घ् यह प्रष्न मन में उठते हैंए जानते हुए भी यह कहना पड़ता है कि आत्म शुद्धि इसकी सबसे बड़ी विशेषता है इसमें साधु.साध्वीए श्रावक.श्राविका इत्यादि सभी बाल.वृद्धए नर.नारी प्रमादवष पारस्परिक कलह द्वेष को भूलकर निम्न क्रियाओं की ओर अग्रसर होते हैं .
सांवत्सरिक प्रतिक्रमण ;प्रत्येक साधक का लक्ष्यद्ध
केषुलंचन ;साधु.साध्वीद्ध 3 तपस्या
4 आलोचना 5 क्षमा
यह महापर्व धर्म जागरण का पर्व है। इसमें क्षमापनाए क्षमा करना और क्षमा मांगना भी निहित है पर्व के अन्तिम दिवस संवत्सरी महापर्व के धर्म जागृति के भाव से मुक्त साधक एक ही स्थान पर रहकर यही भाव भाता है कि मैं गृहस्थ धर्म में जो भी धर्म साधना कर पाया वही मेरी है परन्तु सांसारिक वृत्तियों के कारण जो समरंभ.समारंभ न आरम्भ जैसे कार्य मैंने किए हैं उनके कारण सहनशीलता में कमी आई है इसलिए मैं आठवें दिवस कषायों की शांति के लिए क्षमा को धारण करते हुए चिंतन कर रहा हूँ कि मैंने अष्ठ दिवस में ज्ञानए दर्षनए चारित्र एवं तप की साधना की है जो सदैव बनी रहेए आत्मषुद्धि की यही दिषा कर्मबंधन से छुटकारा प्राप्त कराने वाली है और यही कामना करता हूँ . मैत्री भाव जगत में मेराए सब जीवों से नित रहे। एवं चिन्तन करता हूँ .
खामेमि सव्वे जीवाए सव्वे जीवा खमन्तु में
मित्ती से सव्वभूएसोए वेर मंजम न केणई।
जगत् में अनन्त जीव है . छोटे हैं . बड़े हैंए ज्ञात.अज्ञात है वे सभी मेरे द्वारा किसी न किसी रूप में कष्ट को प्राप्त होते होंगे या उनको जाने . या अनजाने में आत्र्त या रूर्द्ध परिणामों के कारण सताया गया होए कष्ट दिया गया हो तो मैं उन सभी जीवों के प्रति क्षमा भावना रखता हूँ क्षमा करता हूँ और क्षमा मांगता हूँ। क्षमा को विकसित करने के लिए आत्मशोधन के इस मार्ग को अपने से दूर नहीं करना चाहता हूँ। मैंने क्रोध कियाए मान बढ़ायाए माया संचित की ओर लोभ में ज्वालाओं से संतृप्त हुआए मिथ्यात्व.पाप को बुलाता रहा इसलिए समताए शांतिए तप और संयम के इस क्षमापर्व पर पारस्परिक वैर.विरोध को शांत करना चाहता हूँ। क्षमा है . प्रेम। करूणा की निर्मल धारा जो आत्मा से परमात्मा को दिखलाती हैए ब्रह्म से परम ब्रह्म की ओर ले जाती हैए अनंतदर्षनए अनंत ज्ञानए अनंत सुख एवं अनंत शक्ति के निवास रूप यह क्षमा आत्म षुद्धि का प्रधान संबल है।
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