नंद के उत्सव में झूम रहा कोना-कोना, धर्म रक्षार्थ के लिए कई बार जन्में है श्रीकृष्ण - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 18 अगस्त 2014

नंद के उत्सव में झूम रहा कोना-कोना, धर्म रक्षार्थ के लिए कई बार जन्में है श्रीकृष्ण

  • कार्पेट कंपनी में सजी आकर्षक झांकी दर्शन के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ 

janmashtami
शहर हो या देहात हर तरफ नंद के बधाईयों का सिलसिल बड़े ही हर्षोल्लास के साथ चल रहा है। आधी रात के बाद घर-घर, मंदिर-मंदिर में कान्हा का जन्म मनाया गया। लोगों ने जमकर आतिशबाजी की, और मिठाइयां बांटी। महिलाओं व युवतियों ने मंगल गीत गाए। श्रद्धालुओं ने कान्हा के दर्शन किए। मंदिर हो या घर या फिर प्रतिष्ठान सभी जगहों पर कान्हा की की मनोरम झांकियां लोगों केे आकर्षकण का केन्द्र बने हुए है। झांकियों को माला, फूल-पत्तियों व झालरों से सजाया गया है। लेकिन रोशनी तभी हुई जब आधी रात के बाद सांवरा सलोना आया। श्रीकृष्ण जन्म की खुमारी भक्तों पर ऐसी छाई कि कोना-कोना खुशियों से रोशन हो गया। नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की..बोलते श्रद्धालु माखनचोर के रंग में रंगे रहे। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में मंदिरों में कहीं महाभिषेक कर प्रभु का स्वागत किया गया तो कहीं रासलीला में कन्हैया के साथ श्रद्धालु खूब झूमे। नटखट कान्हा को झूला झुलाकर भक्तों ने मंगलकामनाएं की। जबकि भदोही शहर के कार्पेट कंपनी में हर साल की भांति इस साल भी सजी आकर्षक झांकी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। यहां बड़ी संख्या में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। रमेश कार्पेट कंपनी के संचालक विमल बरनवाल व उनके भाई निशांत बरनवाल ने बताया कि इस बार भगवान श्रीकृष्ण की झांकी में ब्रज को ही उकेरा गया है।  

भगवान श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा के लिए पृथ्वी पर अवतार लिए थे। महाभारत इसका जीता-जागता उदाहरण है। युद्ध के दौरान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अनेक रूपों में अपने ईश्वरीय गुण से अर्जुन को यहकर प्रेरित किया कि जब-जब इस भूतल पर धर्म की हानि होने लगती है, तब-तब मैं हर युग में सज्जनों की रक्षा के लिए (पारित्राणाय साधुनाम) और दुष्टों के विनाश के लिए (विनाशाय च दुष्कृताम) अवतार रूप में प्रकट होता हूं। इसी के साथ कृष्ण ने दीन दुःखी की हमेशा सहायता की। बचपन के परम मित्र दीन हीन सुदामा को देख वे द्रवित हो गए और सुदामा के पैरों को अपने आंसुओ से ही धोए। उन्होंने अपने ऐश्वर्य से न केवल सुदामा को बल्कि पूरे गांव को धन-धान्य से पुष्ट कर दिया। चीर हरण के समय द्रौपदी के आर्तनाद पर तुरंत उसकी लाज रखी। नानी बाई के मायरे के समय भक्त नरसी मेहता की हुंडी सिकार दी। दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर दासी पुत्र विदुर की कुटिया में साग रोटी खाकर उन्हें कृत्य कर दिया। यह श्रीकृष्ण का ईश्वर भाव है। जब दुर्योधन ने पांडवों को धन, राज्य और सत्ता से बेदखल कर दिया तब श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास यह प्रस्ताव लेकर गए कि पांडवों को पांच गांव ही दे दो। तब अभिमानी दुर्योधन ने कहा कि पांच गांव तो क्या, मैं बिना युद्ध के सूई की नोक बराबर भी जमीन नहीं दूंगा (सूच्याग्रं न दास्यामि विना युद्धेन केशव)। कृष्ण के साम, दान, भेद विफल हो गए। महाभारत युद्ध हुआ। कृष्ण की युद्ध नीति से दुष्ट कौरवों का संपूर्ण नाश हुआ और पांडवों की विजय। यह जीत धर्म की अधर्म पर ती सत्य की असत्य पर। 




(सुरेश गांधी)

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