एक तरफ तो भारत पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, दूसरी ओर पाक उच्चायुक्त देश को बांटने का प्रयास कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि सरकार की विदेश नीति स्पष्ट नहीं है। समय रहते सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए
दो दुश्मनों के बीच गोलियों की तड़तड़ाहट को बातचीत से से बदला जा सकता है, का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का फार्मूले को तगड़ा झटका लगा है। झटका लगना लाजिमी भी है। क्योंकि जो काम प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी बाजपेयी, राजीव गांधी आदि तमाम प्रयास व समझौते के बावजूद नहीं कर पाएं वह काम मोदी कैसे कर पाते, इस बात पर वार्ता की तिथि निर्धारित करने से पहले गहन मंत्रणा करनी चाहिए थी। खासकर ऐसे हालात जब एक तरफ पाकिस्तान लगातार चाहे वह कारगिल रहा हो या स्वीसफायर उल्लंघन हो फिर आएं दिन की बमबारी व आतंकवाद में पाकिस्तान की संलिप्तता चरम पर हो। बीते 12 हफ्तों में सीमा और उसके दोनों ओर हुई घटनाओं ने शरीफ के इरादों की ताकत और नीयत दोनों पर कई सवाल उठाए हैं। युद्धविराम का उल्लंघन भी होता रहा और दूसरे मुद्दों पर पाकिस्तान ने कोई सहयोग नहीं किया। ऐसे में मोदी सरकार ने वार्ता शुरू करने की कोशिश ही क्यों की? सच्चाई यह है कि सरकार की विदेश नीति स्पष्ट नहीं है। एक तरफ तो भारत पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, दूसरी ओर पाक उच्चायुक्त देश को बांटने का प्रयास कर रहे हैं।
इस तरह के हालात के बीच मोदी द्वारा दोस्ती का हाथ बढ़ाना बिल्कुल बचकाना साबित हो गया है। हालांकि बातचीत रद्द करने का निर्णय का स्वागत योग्य है। सरकार की बोल्डता का दाग देनी चाहिए कि बिना लाग-लपेट के पाकिस्तान को चेताया है कि वह पड़ोसियों से अच्छे संबंध चाहता है लेकिन किसी के भी द्वारा अपने आंतरिक मामलों में दखल कत्तई बर्दाश्त नहीं करेगा। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने का इस वक्त बिल्कुल सही कदम है। पाकिस्तान में सत्ता का ताकतवर केंद्र कहलाने वाली फौज शरीफ सरकार की भारत और खासकर कश्मीर संबंधी नीति पर अपना दबदबा चाहती है। शरीफ की ओर से कश्मीर मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करने के बावजूद सीमा पर पाक सेना युद्ध विराम समझौते को गाहे-बगाहे तार-तार कर गोलियां दागती है। रक्षा मंत्रलय के आंकड़े बताते हैं कि बीते सात महीनों में अब तक 60 बार पाक सेना 2003 से लागू शांति समझौते को तोड़कर गोलीबारी कर चुकी है। मामले को लेकर 23 जुलाई को दोनों मुल्कों के विदेश सचिवों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत में भी भारत ने सख्ती से मामला उठाते हुए पाक से बारूद का शोर रोकने को कहा था। फिर भी कुछ नहीं हुआ। यह बात और है कि जमीन पर इसका असर नहीं नजर आया। अमन की पैरवी में शरीफ की ओर से किए वादों के बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पाक सेना बदस्तूर गोला-बारूद दाग रही है। वहीं मुंबई आतंकी हमले के गुनहगारों को सजा से लेकर कश्मीर में नापाक हरकतों से परहेज तक के मुद्दे पर पाक ने भारतीय अपेक्षाओं को भी ठेंगा ही दिखाया है।
जहां तक बात समझौतों की है तो कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की पाकिस्तान के प्रति अस्पष्ट और असंगत विदेश नीति है। इससे देशवासियों में भ्रम पैदा करने वाले संकेत जा रहे हैं। दोस्ती का हाथ बढ़ाना सिर्फ अपनी छबि बनाने का मोदी द्वारा नाटक किया गया। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि जब पाकिस्तान की ओर से कोई प्रगति नहीं हुई तो बातचीत शुरू क्यों की जा रही थी? बातचीत की ही क्यों जा रही थी। पाक के दोगले कदम को भारत ने अपने आंतरिक मामलों में दखल कत्तई बर्दास्त नहीं करनी चाहिए। महज ढाई महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्योते पर आए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने दिल्ली आकर संबंध सुधार को लेकर कई वादे और इरादे जताए। सरहद पर जारी गोलीबारी के बीच पाकिस्तानी उच्चायोग ने जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को बातचीत के लिए बुलाकर कोई घिनौनी साजिस की कहीं योजना तो नहीं बनाई थी। वैसे भी हमें नहीं भूलना चाहिए कि मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ बाद ही पाक फौजियों ने आतंकवादियों की संरक्षण में 5 भारतीय फौजियों की नृशंस हत्या कर सिर काट दी। सरबजीत की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। मुंबई बम धमाका का मास्टरमाइंड दाउद इब्राहिम व 26 नवम्बर के आतंकी हमले के मास्टरमाइंड जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद को वह भारत को क्यों नहीं सौंप देता। अटल बिहार वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा की भी हश्र किसी से छिपा पहीं है। इंद्र कुमार गुजराल की भी कोशिश धरी रह गयी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में कश्मीर मसले को जोर-शोर से उठाया गया, पर हुआ कुछ नहीं।
पाकिस्तान की सेना ने संघर्ष विराम का वर्ष का सबसे बड़ा उल्लंघन करते हुए जम्मू सेक्टर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित 20 भारतीय चैकियों पर रातभर गोलाबारी की। पाकिस्तानी रेंजरों ने अरनिया और आरएसपुरा में भारतीय चैकियों पर 82 मिमी के गोले दागे। पिछले दस दिनों में पाकिस्तानी सेना द्वारा संघर्ष विराम का यह 11वां उल्लंघन है। अकेले अगस्त में पाकिस्तान ने 12 बार संघर्ष विराम तोड़ा है। जनवरी 2013 में भी समझौते की बात उठी थी। तब सीमा पर भारतीय जवान का सिर काटे जाने की खौफनाक घटना के बाद भारत-पाक के बीच वार्ता का सिलसिला थम गया था। ये हो सकता है कि पाक में बैठी कुछ शक्तियां भारत के साथ दोस्ती का रिश्ता नहीं चाहती। जिसके चलते पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान द्वारा सीजफायर का उल्लंघन किया जा रहा है। यह उल्लंघन पहले एलओसी पर होता था। अब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी सीजफायर के उल्लंघन से बाज नहीं आ रहा है। हालांकि भारतीय जवानों ने भी इसका जमकर जवाब दिया। सेना सीजफायर वायलेशन का उत्तर देने में सक्षम है।
उम्मीद की जा रही थी कि भारत से दोस्ती की बातें करने वाले नवाज शरीफ के फिर से सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंध सुधरेंगे। इन उम्मीदों को तब और बल मिला जब नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने नवाज शरीफ भी आए। उनके नई दिल्ली आगमन के कुछ ही दिनों बाद विदेश सचिव स्तर की वार्ता की तिथि तय हो गई, लेकिन ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने इस बातचीत के पहले माहौल को खराब करने की ठान ली थी। उसकी ओर से नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं यकायक बढ़ गई थीं। पिछले कुछ दिनों से तो सीमा पार से कुछ ज्यादा ही गोलीबारी हो रही थी। शायद पाकिस्तान को इतने भर से चैन नहीं था। नई दिल्ली स्थित उसके उच्चायुक्त ने जिस तरह यकायक कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बातचीत करने का फैसला किया उसे उकसावे वाली हरकत के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। हालांकि भारत ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त को इसके लिए चेताया भी कि हुर्रियत नेताओं से उनकी बातचीत उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है, लेकिन वह बाज नहीं आए। इन स्थितियों में भारत के पास विदेश सचिव स्तर की वार्ता को रद किया जाना सराहनीय कदम है।
थोड़ी दे के लिए मान भी लिया जाएं कि सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं को पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ की शह पर अंजाम दिया जा रहा होगा, लेकिन क्या यह भी मान लिया जाए कि नई दिल्ली में बैठे पाकिस्तानी उच्चायुक्त भी अपने प्रधानमंत्री के बजाय अपनी सेना के इशारे पर काम कर रहे हैं? अगर नवाज शरीफ का अपने उच्चायुक्त पर भी नियंत्रण नहीं रह गया है तो फिर उनके विदेश सचिव से बातचीत करने का मतलब ही क्या रह जाता है? हो सकता है पाकिस्तान आतंकवाद से ग्रसित हो, लेकिन अगर यह सच है तो आईएसआई भारत के खिलाफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी शिविरों को खाद-पानी मुहैया क्यों करा रही है? हर कोई जानता है कि जम्मू-कश्मीर में डेरा जमाएं आतंकी समूहों को आईएसआई ही मदद करती आ रही है। निःसंदेह अब इस पर यकीन करना और कठिन है कि नवाज शरीफ वास्तव में भारत से संबंध सुधार के इच्छुक हैं। वह या तो भारत से संबंध सुधारने का दिखावा कर रहे हैं या फिर उनकी विदेश नीति पर भी सेना और खुफिया एजेंसी हावी हो गई है। पिछले कुछ समय में पाकिस्तान की ओर से भारत के संदर्भ में जैसी परिस्थितियां निर्मित की गईं और खुद इस्लामाबाद में जैसे हालात पैदा हो गए हैं उससे तो यही लगता है कि नवाज शरीफ घरेलू-बाहरी, दोनों मोर्चो पर दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे हैं। यह एक तथ्य है कि पाकिस्तान में एक तबका ऐसा है जो भारत से वैर-भाव बनाए रखना चाहता है। इसमें सेना खास तौर पर शामिल है, लेकिन यह समझना कठिन है कि नवाज शरीफ अपनी सेना के इतने अधिक दबाव में क्यों हैं? यदि पाकिस्तान यह समझने के लिए तैयार नहीं कि भारत से संबंधों में सुधार उसके अपने हित में ही है तो फिर भारत चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता।
(सुरेश गांधी)


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