आलेख : हार का असली गुनहगार कौन? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 20 अगस्त 2014

आलेख : हार का असली गुनहगार कौन?

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भारत की इंग्लैंड के हाथों पांच टेस्टों की सीरीज में 1-3 की हार के बाद तमाम बडे दिग्गज और पूर्व क्रिकेटर हाथ धो कर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पीछे पड़ गए हैं कि उन्हें कप्तानी से ही हटा दिया जाए लेकिन सीरीज में भारतीय खिलाडियों के प्रदर्शन को देखा जाए तो साफ हो जाएगा कि धोनी अकेले कसूरवार नहीं है। अजीत वाडेकर, सुनील गावस्कर और दिलिप वेंगसरकर, गुंडप्पाविश्वनाथ और सौरभ गांगुली जैसे पूर्व क्रिकेटरों ने धोनी पर निशाना साधते हुए कहा है कि राष्ट्रीय चयनकर्ताओं को कड़े फैसले लेने की जरूरत है। इन सभी का मानना है कि धोनी को अब टेस्ट कप्तानी से हटा दिया जाना चाहिए। इन तमाम दिग्गजों ने धोनी पर तो सवाल उठाये हैं लेकिन पूरीसीरीज में बेहद खराब प्रदर्शन करने वाले अन्य भारतीय खिलाडियों को लेकर किसी ने भी किसी खिलाड़ी का नाम नहीं लिया है। 

पूरी सीरीज में लार्ड्स टेस्ट के बाद भारतीय खिलाड़ी एक के बाद एक मैदान पर जाकर भारतीय क्रिकेट का तमाशा बनाते रहे और अब इस तमाशे के लिए मांग की जा रही है कि धोनी को ही बलि का बकरा बनाया जाए। भारत ने जब लार्ड्स में ऎतिहासिक जीत हासिल की थी तब किसी पूर्व क्रिकेटर ने कहा कि धोनी की कप्तानी में दोष है लेकिन साउथम्पटन, मैनचेस्टर और ओवल में लगातार पराजयों के बाद इन तमाम दिग्गजों को धोनी की कप्तानी में खामियां ही खामियां नजर आने लगी हैं। लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी कि भारतीय खिलाडियों का सीरीज में एक के बाद एक खराब प्रदर्शन भी टीम इंडिया के लिये शर्मिदगी का कारण बना। यदि विराट कोहली जैसे स्टार बल्लेबाज पांच मैचों में 13.40 के घटिया औसत से 134 रन बनाते हैं तो क्या उसके लिए धोनी जिम्मेदार हैं। यदि टीम इंडिया के नए श्रीमान भरोसेमंद चेतेश्वर पुजारा पांच मैचों में 222 रन बनाते हैं तो क्या उसके लिए भी धोनी जिम्मेदार हैं। 

ओपनर शिखर धवन तीन टेस्ट खेलकर 122 रन बना पाते हैं और उनकी जगह शेष दो टेस्टों में उतरने वाले गौतम गंभीर चार पारियों में मात्र 25 रन बना पाते हैंैं। रोहित शर्मा को एक मौका मिलता है तो वह 34 रन बना पाते हैं। ये सभी बल्लेबाज ऎसे हैं जिन्हें क्रिकेट का अच्छा खासा अनुभव है। जब ये खिलाड़ी एक के बाद एक फ्लॉप हो रहे हों तो क्या उम्मीद की जाए कि धोनी इन्हें हाथ पकड़कर बताएं कि कैसे बल्लेबाजी की जाती है। व्यक्तिगत तौर पर धोनी के प्रदर्शन को देखा जाए तो उन्होंंने पांच मैचों में 34.90 के औसत से 349 रन बनाये और सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में वह चौथे स्थान पर रहे। धोनी ने इसके अलावा सीरीज में विकेट के पीछे 17 शिकार भी किये। यह प्रदर्शन कतई ऎसा नहीं है कि धोनी को एकदम उठाकर टेस्ट टीम से बाहर कर दिया जाए और उनकी टेस्ट कप्तानी छीन ली जाए। वेंगसरकर, विश्वनाथ और वाडेकर जैसे पूर्व खिलाडियों ने धोनी की रणनीति पर सवाल खडे किए हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि भारत का शीर्ष क्रम सीरीज के पांचों मैचों में लगातार फ्लॉप रहा है। 

जब आपके चोटी के चार पांच बल्लेबाज मात्र 40-50 रन पर पवेलियन लौट जाएं तो कप्तान क्या रणनीति बना सकता है। क्या हर बार उम्मीद की जाए कि टीम के गेंदबाज अर्द्धशतक बनाकर टीम को उबारें। यदि पूर्व क्रिकेटर धोनी पर सवाल उठाते हैं तो उन्हें शिखर, विराट, गंभीर और पुजारा पर भी सवाल उठाना होगा कि वे अपने इस प्रदर्शन से टीम में बने रहने लायक हैं या नहीं। पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली कहते हैं कि चयनकर्ताओं को अपना नजरिया बदलना होगा और कड़े निर्णय लेने होंगे। लेकिन वह कम से कम यह तो बताएं कि यह कड़े निर्णय क्या होने चाहिए। अभी तक एक भी पूर्व दिग्गज क्रिकेटर ने यह नहीं कहा कि वनडे में रिकॉर्डो के ढेर लगाने वाले विराट की टेस्ट टीम में कोई जगह नहीं बनती है। वर्ष 2011 में जब भारतीय टीम इंग्लैंड दौरे में 0-4 से हारी थी तब भी धोनी की ही कप्तानी पर सवाल उठे थे। टीम में मौजूद सचिन तेंदुलकर, गौतम गंभीर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे नामी क्रिकेटरों के निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर किसी ने भी नहीं कहा था कि उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया जाए। सिर्फ एक ही सवाल उठा था कि धोनी से कप्तानी छीन ली जाए।


अब भी धोनी से टेस्ट कप्तानी छीनने की बात हो रही है । एक खिलाड़ी को बलि का बकरा बनाने से भारतीय टेस्ट टीम का भला नहीं होने वाला है। यदि परिवर्तन करना है तो इस टीम के आधे खिलाडियों को अगली टेस्ट सीरीज के लिये टीम इंडिया से बाहर करना होगा तभी जाकर खिलाडियों में यह संदेश जाएगा कि वे अपनी जगह की गारंटी न समझे और मैदान में प्रदर्शन करने पर ध्यान दें। 




दीपक  कुमार 
संपर्क :09555403291
ईमेल : deepak841226@gmail.com
लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं।

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