उत्तर प्रदेश में हाल में हुए उप चुनावों के नतीजों ने जहां मोदी लहर को पछाड़ कर रसातल में पहुंचा दिया है वहीं कांग्रेस की सेहत के लिए भी यह नतीजे कम बुरे नहीं हैं। हालांकि जिन तेरह सीटों पर उप चुनाव हुए उनमें से एक पर भी कांग्रेस काबिज नहीं थी लेकिन फिर भी कई ऐसे कारक थे जिनके मद्देनजर कांग्रेस को इन उप चुनावों में बेहतरी की आशा हो रही थी लेकिन नतीजों ने उस पर पानी फेर दिया। उप चुनावों में कांग्रेस की दुर्दशा ने देश की सबसे पुरानी और ऐतिहासिक पार्टी में ऐसे क्षय रोग के पनपने का संकेत दिया है जिसका कोई इलाज फिलहाल ढूंढे नहीं मिल रहा।
कांग्रेस आजादी के बाद कई दशकों तक ब्राह्म्ïाण, दलित व मुस्लिम की त्रयी के समर्थन की बदौलत सत्ता में अपना अक्षुण्य कब्जा बनाए रही। बसपा के उभार के बाद कांग्रेस को देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में जोरदार झटका लगा। बसपा की वजह से दलित वोटर कांग्रेस के हाथों से खिसक गए और राज्य में पार्टी मुख्य मुकाबले तक से बाहर हो गई। मुसलमान भी राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले में पार्टी के ढुलमुल रवैए से नाराज होकर उससे दूर चले गए थे लेकिन 1999 में जब सलमान खुर्शीद उत्तर प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष थे उस समय मुसलमान फिर कांग्रेस पर भरोसा जताने लगे। 2009 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों की बदौलत कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जितनी सीटें मिलीं उसकी उम्मीद पार्टी के बड़े नेताओं को भी कभी नहीं थी लेकिन मुख्य मुकाबले में आने के लिए पार्टी को अभी काफी दूरी तय करनी थी। इस दूरी को पाटने के लिए कांग्रेस दलितों पर मजबूत कमंद फेेंकने की मशक्कत में जुटी थी। इस संदर्भ में 1993 के विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा के बीच हुए ऐतिहासिक गठबंधन के बाद के परिदृश्य पर निगाह डालना भी जरूरी है। इस गठबंधन के माध्यम से वह बहुजन एक मंच पर आ गया वर्ण व्यवस्था जिसकी समवेत दुश्मन थी।
परंपरागत सत्ता वर्ग के खिलाफ एक अकाट्य मोर्चा तैयार हो गया था जिससे सदियों तक समाज पर राज करने वाले सत्ता वर्ग में अपार बेचैनी छा गई थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद भी ऐसा ही हुआ था लेकिन भारत में जातिगत अड्डेबाजी का पर्याय बनी मीडिया ने कुलद्रोही विश्वनाथ प्रताप सिंह का इतने मारक तरीके से राजनीतिक वध किया कि परंपरागत सामाजिक वर्ग सत्ता निश्चिंत होकर खर्राटे भरने लगी थी लेकिन सपा बसपा गठबंधन मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के समय से भी बड़ी विपत्ति बनकर सामने आया। यह गठबंधन छिन्नभिन्न कैसे हो इसके लिए साजिशें रची जाने लगीं। भाजपा नेता स्व. ब्रह्म्ïादत्त द्विवेदी और वर्ण व्यवस्था वादी मीडिया ने मिलकर सपा बसपा गठबंधन को तुड़वाने का आपरेशन संभाला। सपा बसपा में तकरार शुरू हो ही चुकी थी। नेता जी यानी मुलायम सिंह ने आपात स्थिति को देखते हुए संकट प्रबंधन के तहत बसपा के कई विधायकों को मुंहमांगी कीमत देकर अपने विश्वास में ले लिया था। उन्होंने वायदा किया था कि निर्णायक मौके पर वे अपने नेतृत्व को छोड़कर नेता जी का साथ देंगे।
2 जून 1995 को मुलायम सिंह को खबर मिली कि मायावती मीरा बाई गेस्ट हाउस में उनकी सत्ता उखाड़ फेेंकने के लिए बसपा विधायक दल की बैठक कर रही हैं। इसमें वे विधायक भी शामिल हैं जो उनसे उपकृत हो चुके हैं तो मुलायम सिंह के सब्र का बांध टूट गया। उन्हें लगा कि उनकी रकम हड़प कर उनके साथ दगाबाजी की हिम्मत किसी को कैसे हो सकती है। उन्होंने अपने सिपहसलारों को आदेश दिया कि वे इन विधायकों को मायावती की बैठक से खींचकर उनके पास लाएं। मुलायम सिंह के सिपहसलारों ने कुछ ज्यादा ही उत्साह दिखा दिया। गद्दार विधायकों की तलाश में उन्होंने मीरा बाई गेस्ट हाउस के उस सूट के दरवाजों पर भी लातें फटकार दीं जिसमें मायावती रुकी थीं। इसी बीच ब्रह्म्ïादत्त द्विवेदी पत्रकारों की फौज के साथ प्रगट हो गए। उनकी प्रेरणा से अगले दिन मीडिया में पूरे वाकये को जो रंग दिया गया उसका अर्थ यह निकलता था कि सपा के नेता मायावती की इज्जत तक पर हमलावर होने का दुस्साहस कर बैठे थे। इस सफेद झूठ का असर यह हुआ कि दलित और पिछड़े लंबे समय तक के लिए एक-दूसरे के खिलाफ हो गए और वर्ण व्यवस्था विरोधी मोर्चा तितर-बितर हो गया। मुलायम सिंह ने इसके बाद जब सत्ता में आने का मौका मिला तो दलितों से प्रतिशोध लेने की भावना से काम करके दलित और पिछड़ों की खाई को पाटने की बजाय और ज्यादा बढ़ाने की भूमिका अदा की।
बहरहाल दलितों को रिझाकर फिर से उनकी घर वापसी कराने के लिए कांग्रेस की सकारात्मक कोशिशें तो जारी थी हीं साथ ही उक्त कारक भी अपना काम कर रहे थे। इन हालातों में वर्तमान उप चुनावों की ही बात करें तो बसपा ने चुनाव मैदान छोडऩे की घोषणा कर दी थी जिसके बाद जाहिर था कि दलितों के पास किसको मतदान करें इसके विकल्प सीमित हो चुके थे। वे सपा को किसी कीमत पर वोट नहीं दे सकते थे। उधर नरेंद्र मोदी ने सत्ता का मद सवार हो जाने की वजह से प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात के एक कार्यक्रम में दलितों के पूज्य बाबा साहब अंबेडकर के बारे में अपने सुर बदलकर हल्की टिप्पणियां कर डालीं। उनके द्वारा बनाए गए राज्यपालों में एक भी दलित का न होना और किसी भी कद्दावर दलित नेता को केेंद्रीय मंत्रिमंडल व पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में अहम जिम्मेदारी न मिलना ऐसे नकारात्मक बिंदु थे जिससे दलित उनसे भी बिदक उठे हैं। नरेंद्र मोदी स्वाभाविक रूप से उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित कर रहे हैं जिनकी बुनियाद दलितों को अपमानित करने की अवधारणा पर टिकी है। इसे देखते हुए उप चुनावों में कांग्रेस के लिए दलितों का समर्थन हासिल कर अपनी गोटी लाल करने का सबसे सुनहरा मौका था। कांग्रेस इस मौके को कैश क्यों नहीं करा पाई राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए यह एक पहेली है।
दरअसल कांग्रेस ने युवराज राहुल गांधी को अपना कर्णधार बनाया है जिनमें नेतृत्व की कोई क्षमता नहीं है। उन्होंने लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले नई दिल्ली के विज्ञान भवन में दलित नेतृत्व पर कार्यशाला आयोजित की थी जिसमें कहा था कि मायावती ने निचले स्तर तक कोई दलित नेता इस कौम पर एक छत्र हुकूमत बनाए रखने के लिए पैदा नहीं होने दिया पर कांग्रेस पार्टी अब हर स्तर पर दलित नेतृत्व की कतारें खड़ी कर देगी। जैसा कि राहुल गांधी का मिजाज है किसी सभा में अचानक रेडिकल तेवरों के साथ बक-बक कर देना और इसके बाद फालोअप के नाम पर दुम दबाकर भाग जाना। राहुल गांधी ने इस मामले में भी यही किया। एक भी तेजतर्रार दलित नेता को उन्होंने आगे नहीं बढ़ाया। कांग्रेस में दलित नेतृत्व के नाम पर दास प्रवृत्ति के लोगों को समायोजित करने की प्रक्रिया चलती रही जिससे बसपा के मिशनरी दौर में कैडर क्लासों के माध्यम से सावधान किए जा चुके दलितों ने कांग्रेस की तरफ विकल्पहीनता की स्थिति में भी मुखातिब होना गंवारा नहीं किया।
अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश के उप चुनावों में दलितों ने किसको वोट दिया। गोपनीय खबरें जो मिल रही हैं उनके मुताबिक दलितों ने मुंहमांगी कीमत लेकर इन उपचुनावों में अपना वोट सपा को बेचा है जो मायावती और कांग्रेस दोनों के लिए खतरे की घंटी है। कांशीराम ने बहुत मेहनत और संघर्ष करके दलितों को वोट बेचने की कमजोरी से मुक्त कराया था लेकिन मायावती ने टिकटों की नीलामी की परंपरा बनाकर घोर दलित विरोधी व्यक्तियों को दलितों के समर्थन से ही लोकसभा और विधान सभाओं में पहुंचाने का काम किया जिसे लेकर दलितों के अवचेतन में कहीं न कहीं मायावती के प्रति असंतोष और अविश्वास पनपता रहा। अब इसके सतह पर फूटने की बारी आ गई है। अपना वोट बेचने का चस्का फिर उनकी जुबान पर चढऩे लगा है जिसकी परिणति यह हो सकती है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस के पुर्नत्थान की संभावना तो छूछी निकल ही जाए कहीं बसपा का भी बंटाधार न हो जाए।
के पी सिंह
ओरई

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