विशेष आलेख : भीलों का उजड़ता जीवन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

विशेष आलेख : भीलों का उजड़ता जीवन

महाभारत के महाकाव्य में जब एक साधारण सा आदिवासी बालक एकलव्य धनुषविद्या में अर्जुन से आगे निकलता दिखा त¨ गुरु द्र¨णाचार्य ने उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया। वह बालक एक भील था। रामायण नामक महाकाव्य में जब रावण द्वारा अपहृत सीता जी क¨ श्रीराम वन में ढूंढ रहे थे तब शबरी नाम की वृद्धा ने श्रीराम क¨ अपने जूठे बेर खिलाए थे। शबरी एक भील थी। केवल यही नहीं भील नामक जनजाति का जिक्र इतिहास में अ©र भी कई जगह¨ं पर पाया जाता है। वह मेवाड़ में महाराणा प्रताप की सेना में थे। महाराष्ट्र में शिवाजी की सेना में थे। किंतु अपने इस लंबे-च©ड़े अ©र महत्वपूर्ण इतिहास ह¨ने का वर्तमान में इन भील आदिवासिय¨ं क¨ क¨ई फायदा नहीं है।
            
जब हम टीवी के रूपहले पर्दे पर भील आदिवासियों को रंग-बिरंगी पोषाकों में नाचते हुए देखते हैं तो मोहित हो जाते हैं पर जब हम उनसे सीधा साक्षात्कार करते हैं तो उनके कठिन जीवन की असलियत देख-सुनकर वह आकर्षण काफूर हो जाता है। ऐसा ही अहसास मुझे तब हुआ जब मैं उनसे मिला और उनके दुख-दर्द की कहानियां सुनीं।  हाल ही मुझे 31 अगस्त से 3 सितंबर तक पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल अलीराजपुर में रहने का मौका मिला। इस दौरान एक भिलाला युवक रेमू के साथ डेढ़ दर्जन गांवों में गया और ये सभी गांव अलीराजपुर जिले के थे। इनमें से कुछ हैं-खारकुआ, छोटा उण्डवा, तिति नानपुर, घोंगसा, उन्दरी, हिरापुर,फाटा इत्यादि। 
          
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यहां के गांवों में बसाहट घनी नहंी है, दूर-दूर घर बसे हुए हैं। पहाडियों की टेकरियों पर बने इनके घर  कच्चे हैं और खपरैल वाले हैं। इन घरों को मिलाकर एक मोहल्ला बनता है। घास-फूस व लकडि़यों के घर में दीवारें कच्ची, लकड़ी की और कुछ ईंटों की बनी हैं। मुर्गा- मुर्गी, बकरी और मवेशी भी साथ-साथ रहते हैं। जमीन ऊंची-नीची ढलान वाली व पहाड़ी है तो कहीं समतल मैदान वाली। पेड़ बहुत कम हैं। जब पेड़ नहंी हैं तो पक्षी भी नहीं। वे पेड़ों पर घोंसला बनाकर रहते हैं या बैठते है। छींद और ताड़ी के पेड़ दिखाई दिए, छातानुमा बहुत सुंदर। इन्हीं पेड़ों से ताड़ी निकाली जाती है। गर्मी में ठंडा के रूप में ताड़ी पी जाती है। खेतों में मूंग, उड़द, मूंगफली और बाजरा की फसल लहलहा रही थी तो कुछ खेतों में कपास भी था। पानी की कमी है, कुछ किसानों ने बताया कि मूंगफली में जब पानी की कमी होती है तो टेंकर से पानी मंगाते हैं। यह जानकारी नई थी।
           
जब हम गांवों में पहुंचते तो चरवाहे हमें देखकर दौड़ लगा देते या पेड़ों के पीछे छिप जाते।  जब हम उनसे किसी का पता-ठिकाना पूछते तो जवाब नहीं देते। फिर रेमू अपनी भीली में पूछता तो बता देते। गांवों में अधिकांश बुजुर्ग लंगोटी में मिले और कुछ जगह हुक्का वाले भी दिखाई दिए। यहां खेती -किसानी पर ही लोगों की आजीविका निर्भर है, लेकिन खेती में ज्यादा लागत और कम उपज होती है। कर्ज बढ़ता जाता है। उसी कर्ज के दुष्चक्र में हमेषा के लिए फंस जाते हैं। महिलाएं और पुरूष मिलकर खेती का काम करते हैं। वे खेतों में उड़द और मूंगफली की निंदाई करते हुए दिखे। इसके अलावा, महिलाओं पर घर के काम की पूरी जिम्मेदारी होती है। भोजन पकाना, पानी लाना, ईंधन लाना, साफ-सफाई करना, गाय-बैल, बकरी चराना इत्यादि। बच्चों संभालने का काम तो रहता ही है।
          
आदिवासियों की जिंदगी उधार के पैसे से चलती है, इसके लिए वे साहूकार व महाजनों से कर्ज लेते हैं। लेकिन अक्सर गरीबी और तंगी के कारण समय पर अदा नहीं कर पाते। इसलिए जो वस्तु गिरवी रखते हैं, उसे वापस नहीं ले पाते। बारिश नहीं हुई तो फसल भी नहीं। मजबूर होकर लोग काम की तलाश में गुजरात चले जाते हैं। भोपाल और दिल्ली भी जाते हैं जो खेती और निर्माण कार्य में मजदूरी करते हैं, उन्हें न उचित मजदूरी मिलती है, न वहां जीने के लिए बुनियादी सुविधाएं। पलायन करने वालों में युवा, स्त्री-पुरूष सभी हैं। ज्यादातर परिवारों में घर के छोटे खाने-कमाने जाते हैं और बड़े-बूढ़े घर की जिम्मेदारी संभालते हैं।
           
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पहले यहां बहुत अच्छा जंगल हुआ करता था, वह बड़ा सहारा थे। जंगल से उनका मां-बेटे जैसा संबंध था। वे उससे उतना ही लेते थे जितनी उनको जरूरत होती थी। लेकिन जंगल अब साफ हो चुका है। यहां के पहाड़ नंगे हो गए हैं, जैसे आदमी के सिर पर उस्तरा फेर दिया गया हो और वह गंजा हो गया हो। आदिवासियों की हालत के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता शंकर तलवडा बताते हैं कि हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न भिन्न कर दिया गया है।  बाजार ने हमारी सामूहिकता को तोड़ दिया है। लालच ने एक-दूसरे को सहयोग करने की भावना को खत्म कर दिया। वे बताते हैं कि फसल चक्र के बदलाव ने हमारे देसी अनाजों को खत्म कर दिया। अब आदिवासी पूरी तरह बाजार के हवाले हो गया, जहां उसे शोषण का शिकार होने पड़ रहा है। वहीं जीने के लिए उसे बुनियादी सुविधाएं और रोजगार भी नहीं मिल पा रहा है।
           
कहने क¨ त¨ आदिवासिय¨ं के हित¨ं की रक्षा के लिए आदिवासी मामल¨ं का मंत्रालय म©जूद है। उनके लिए कई योजनाएं और आयोग बने। रिपोर्टें भी आईं। कानून भी बने। लेकिन आदिवासियों के जीवन कठिन से कठिनतम होता जा रहा है। सवाल उनकी अस्मिता और संस्कृति का है। खेती-किसानी का है। शिेक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कैसे अच्छी होगी, यह सवाल है। बेहतर भविष्य का सवाल है। 






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बाबा मायाराम
संपर्क : 09424437330
(चरखा फीचर्स)

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