कहते हैं कि समय के साथ सारे ज़ख्म भर जाते हैं लेकिन जम्मू एवं कष्मीर में आई आपदा के ज़ख्म षायद ही कभी भर पाएंगे। तबाही का यह मंज़र जिसने भी देखा वह षायद ही कभी इसे भुला पाएगा। इस बाढ़ में लोगों के जान-माल के नुकसान के साथ उनका सब कुछ बर्बाद हो गया है। 1 सितंबर से राज्य में बारिष का जो सिलसिला षुरू हुआ था गुज़रते वक्त के साथ उसने धरती के स्वर्ग में तबाही मचानी षुरू कर दी। बाढ़ के कारण अब तक तकरीबन 3 सौ लोगों की मृत्यु हो चुकी है जबकि हज़ारों लोग अब भी घर से बेघर हैं और राहत कैंपों में रह रहे हैं। बाढ़ में जो लोग अपनी जान बचाने में कामयाब हुए वह ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे भगवान ने उन्हें नई जिंदगी दी है। इस बारे में श्रीनगर में बाढ़ के दौरान फंसे एक स्थानीय अखबार के पत्रकार सुल्तान कहते हैं कि जब बारिष षुरू हुई तो हमने नहीं सोचा था कि बारिष इतना विकराल रूप ले लेगी। लेकिन गुज़रते वक्त के साथ बारिष ने इतना विकराल रूप ले लिया कि जिधर देखो तबाही और बर्बादी का मंज़र था।
बिज़नैस स्टैंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अचानक आई बाढ़ से जम्मू में 365 करोड़ रूपये की फसल को नुकसान हुआ है और 13 हज़ार हेक्टेयर की उपजाऊ ज़मीन तबाह हो गई। 248 करोड़ रूपये लागत वाली मक्का की फसल नश्ट हुई। इसी तरह 48 करोड़ रूपये के धान और करीब 40 करोड़ की सब्ज़ी, दलहन एवं केसर बर्बाद हो गयीं। राज्य में लोगों की आजीविका का मुख्य साधन खेती-बाड़ी है। बाढ़ की वजह से किसानों की खेती बर्बाद होने की वजह से उनके पास रोज़गार का कोई साधन नहीं बचा है। इसकी वजह से पहले से ही बेर¨जगारी की घनी समस्या से ग्रस्त इस राज्य में बेर¨जगारी की दर में गुणात्मक वृद्धि ह¨ सकती है सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।
सुलतान अपनी बेबसी का इजहार करते हुए आगे कहते हैं कि मैं जिस इमारत मैं था उसकी पहली मंजि़ल पूरी तरह डूब चुकी थी और मुझे बचने की उम्मीद नहीं थी। छह दिन तक मैं भूखा प्यासा बस भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि कोई मेरी मदद के लिए जल्द आ जाए। भगवान ने मेरी सुन ली और आर्मी वालों ने मुझे हेलीकाप्टर के ज़रिए बचाया। वह आगे कहते हैं कि उस दर्दनाक हादसे को मैं दोबारा याद नहीं करना चाहता। बाढ़ की वजह से संचार सेवाएं बुरी तरह से प्रभावित हुई जिसकी वजह से राज्य में या राज्य के बाहर बसे लोग अपनों की खैर-खबर नहीं ले पा रहे थे। तकरीबन 10 दिनों तक ऐसी ही स्थिति बनी रही। बाढ़ के दौरान लोगों को बड़ी परेषानी का सामना करना पड़ा खासकर उन लोगों को जो नदी या नाले के किनारे बैठकर अपनों के खोने पर उनकी जान की दुआ मांग रहे थे। नन्हीं जानें अपने मां-बाप का इंतज़ार कर रहीं थीं और न जाने ऐसे कितने लोग थे जो इस बात कर इंतज़ार कर रहे थे कि उनका परिवार फिर से एक जगह इकठ्ा होगा।
राहत और बचाव कार्य में आर्मी ने जिस तरह अपने काम को अंजाम दिया उसकी सराहना पूरे देष में हुई। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो अब है। क्योंकि बाढ़ के बाद संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा है। कुछ इलाकों में गंदगी और जानवरों के षव सड़ने की वजह से बीमारियां फैलनी भी षुरू हो गयी है। यही वजह है कि सरकार की ओर लोगों के इलाज के लिए जगह जगह मेडिकल कैंप लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा राज्य में पीने के पानी की समस्या ने भी एक विकराल रूप ले लिया है। एक ओर तो बाढ़ के पानी ने राज्य में तबाही और बर्बादी का एक खौफनाक इतिहास लिखा वहीं अब पीने के पानी की कमी लोगों का जीना मुहाल कर रही है।
कष्मीर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिल पा रही है। इस बारे में एक स्थानीय निवासी षौकत अहमद का कहना है कि श्रीनगर का पंथा चैेक पूरी तरह पानी में डूबा हुआ था मैं किसी तरह वहां से निकलकर अपने परिवार के साथ दस किलोमीटर दूर पैदल चल कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा लेकिन मुझे इस स्थिति में भी सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिल पाई। वह आगे कहते हैं कि बाढ़ के बाद कष्मीर में अब ऐसे लोगों की एक बड़ी तादाद है जिन्हें दो वक्त की रोटी भी बड़ी मुष्किल से नसीब हो रही है। इस आपदा से न जाने कितने लोग परेषान हैं जिनका घर, खाने पीने का राषन और हर चीज़ बाढ़ में बह गया। अगर इन लोगों के पास कुछ बचा है तो वह है इनका हौसला जो इन्हें दोबारा से जिंदगी को नये सिरे से षुरू करने की प्रेरणा दे रहा है।
रिज़वाना मारूफ खान
(चरखा फीचर्स)

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