लोहिया विशेष : बुराईयों से लड़ने का औजार है राजनीति: डॉ.लोहिया - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 12 अक्टूबर 2014

लोहिया विशेष : बुराईयों से लड़ने का औजार है राजनीति: डॉ.लोहिया

डॉ.लोहिया विलक्षण प्रतिभा के थे। वे न केवल 22 वर्ष की अवस्था में जर्मन भाषा में जर्मनी जाकर पी. एच. डी. की बड़ी उपाधि  ली बल्कि उनके पास ज्ञान का अगाघ भंडार था। उन्होंने महात्मा गांधी  के सिद्धांतों  का अमल किया, आगे बढ़ाया और समाज को नये विचारों से लैस करके नये समाजवाद की रचना की।उन्होंने अपनी प्रसि( पुस्तक ‘‘गांधी , मार्क्स  एवं समाजवाद’’ में अपने विचारों का तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक व्याख्या की है। ये गांधी  और मार्क्स को मानते हुए समाजवाद को लोकतांत्रिक गरिमा प्रदान की है। 

जापान के समाजवादी नेता याशीकी होशनो ने 1957 में ठीक ही कहा था कि लोहिया गांधीवाद के विकसित उत्तराध्किारी है। महात्मा गांधी ने देश की आजादी के दिनों में जब कि डॉ.लोहिया जेल में बन्द थे तो एक पत्रा लोहिया जी के नाम लिखा था - ‘‘तुम बहादुर हो लेकिन बहादुर तो शेर भी होता है, तुम विद्वान हो लेकिन विद्वान तो वकील भी होता है। इस से परे तुम्हारा विशिष्ट गुण है, शील यानी चरित्रा में धरावाहिकता।’’ गांधी ने यह लिखा कि लोहिया के जेल में रहने से आज भारत की आत्मा कैद मै है। इस पत्रा से पता चलता है कि महात्मा गांधी को लोहिया जी के प्रति कितना प्रेम और विश्वास था।

डॉ.राममनोहर लोहिया 20वी शताब्दी के महान विचारक, चिन्तक एवं राजनीतिक के रूप जाने जाते हैं। इनकी तुलना अरस्तू, प्लेटो और सुकरात से की जाती है। उन्होने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण विश्व से गैरबरावरी और जुल्म के विरू( संघर्ष करने में अर्पित कर दिया। उनके पास अपना कहने के लिये केवल अपना देश था वे कहते थे कि - ‘‘आज मेरे पास कुछ नहीं है सिवाय इसके कि हिन्दुस्तान के साधरण और गरीब लोग सोचते है कि मै उनका आदमी हूँ।’’ 

डॉ. लोहिला अविवाहित थे। उन्हें रहने के लिये घर तक नही था। सम्पत्ति के नाम पर कहीं कुछ भी नहीं था। वे सदा सत्ताभागियो, सत्ता लोलुपों और वंशवाद और परिवार वाद के खिलापफ बोलते रहे। प्रधनमंत्राी जवाहर लाल के वंशवाद की भविष्यवाणी वे पहले ही कर चुके थे। वे जिस वंशवाद और परिवार वाद के खिलापफ थे वे आज की राजनीति में प्रायः आम बात हो गई है। डॉ.लोहिया ने भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ बनाने के लिये किसानियां माल और करखानियों मालों में सांमजस्य बैठाने के लिये कहा था। 

आज किसानों द्वारा उत्पादित अनाजों की कीमत कम कर के किसानों के साथ अन्याय हो रहा है तो दूसरा और करखनियों माल का दाम पूंजीपतियों और कार खाने के मालिक द्वारा मनमाना वसूला जाता है। उन्होंने कुछ करखनियां माल का दाम लागत और अन्य खर्चों के अलावा डेढ़ गुना से ज्यादा नहीं हो। दामों की इस असमानता से आज किसान लूटे जा रहे हैं और पूंजीपति मालोमाल हो रहे हैं। लोहिया इस वात को समझते थे कि देश की तरक्की और विकास के लिये किसान और मजदूर ही इस देश की रीढ़ है।

डॉ.लोहिया देश में एक रास्ट्रभाषा हिन्दी चले इसके प्रवल समर्पक थे। हिन्दी को देश को जोड़ने की एक करी मानते थे जो देश के वहु संख्यक लोग बोलते और जानते हैं। वे बंगला, मराठी, तेलगू, तमिल, कन्नड़ आदि भाषाओं के भी समर्थक थे, वे इन सभी भाषाओं के भी विकास और समृधि  पर जोर देते थे मगर देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी को अंग्रेजी के मुकावले कभी पीछे नही देखना चाहते थे उनका कहना था जब चीन में चाइनीज, जर्मनी में जर्मन, रूस में रूसी एवं प्रफांस में प्रफैंच भाषाएं चलती है। और दो देश अपनी भाषाओं के द्वारा तरक्की की है तो हिन्दुस्तान अपनी राष्ट्रभाषा में देश को आगे क्यों नहीं बढ़ा सकता है। इन्होंने देश में समाजवादियों द्वारा नारा दिया था - ‘‘अंग्रेजी में काम न होगा फिर  से देश गुलाम नही होगा’’। ‘‘अंग्रेज यहाँ से चले गये, अंग्रेजी को भी जाना है।’’ 

डॉ. लोहिया खुद अंग्रेजी, प्रफैच, जर्मन आदि भाषा के बड़े विद्वान थे। पिफर भी देश के अन्दर वे हिन्दी में ही अपना भाषण करते थे। दक्षिण भारत के कुछ जगहों में इन्हें हिन्दी में भाषण करने के कारण इन पर पत्थर फेंके  गये और अंग्रेजी बोलने को कहा गया इन्होंने कहा तुमलोग जान से मार डालोगे पिफर भी वे अंग्रेजी में नहीं बोलगें, तो इतने बड़े कटट्र थे। 

हिन्दी के समर्थक थे डॉ. लोहिया। डॉ. लोहिया अंग्रेजी के तो इतने बड़े विद्वान थे कि एक बार वे अमेरिका में अंग्रेजी में भाषण कर रहे थे तो इनकी अंग्रेजी ज्ञान और उच्चारण को सुनकर एक अमरीकी विद्वान ने लिखा है कि जब मैं लोहिया का भाषण सुनरहा था तो आँख बन्द करलेने पर मुझे लगता था कि कोई अंग्रेज विद्वान बोल रहा है और आँख खोलने पर देखता था एक काला इंडियन बोल रहा है। तो ऐसे थे डॉ.  राममनोहर लोहिया अपनी राष्ट्रभाषा के पक्षधर ।

डॉ. लोहिया देश में सत्ता के विकेद्रीकरण के द्वारा ही लोकतंत्रा को मजबूत करना चाहते थे गरीब जनता तक लोकतंत्रा का लाभ पहुँचाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने देश में चैखम्भा राज्य का सिद्धांत  दिया। ये चाहते थे केन्द्र केवल सत्ता पर एकाध्किार न रखकर सत्ता का विकेद्रीकरण करे जिसमें प्रान्त ;राज्यद्ध जिला और पंचायत को सत्ता का अध्किार मिले ये पंचायतों को अत्यध्कि मजबूत करना चाहते थे। वे  चाहते थे पंचायतों को अपनी योजना बनाने और ध्नप्राप्त करने का अध्किार हो। साथ ही पंचायतों को अपना पुलिस प्रशासन भी हो जो ग्राम साभादल के रूप में काम करेगा। इस विकेद्रीकरण को इन्होंने ‘‘चैखम्भा’’ राज्य कहा।

 चैखम्भा राज सही रूप में चलेगा तभी देश आत्मनिर्भर और विकसित होगा और गाँवों के गरीब मजदूर तक देश के पैसा का सदुपयोग हो सकेगा। डाॅú राममनोहर लोहिया ने 1950 में ही ‘‘हिमालय बचाओ’’ समेलन कर हिमालय के आस पास के इलाको को बाहरी आक्रमण से बचाने का विचार दिया था। ये भारत और चीन को विभाजित करने वाली मैक मोहन रेखा को नकली रेखा मानते थे।  वे  कहते थे ये अंग्रेज द्वारा बनाई गई रेखा है। ये हिमालय कैलाश को अपने देश का शंकर मानते थे। इनका कहना था हमारे देश का शंकर भगवान दूसरे देश में कैसे बसते। शंकर भगवान का कैलाश पर्वत पर वास होना हमारे ध्र्मग्रन्थों एवं पुरानों में भी है।

 ‘‘कुमार सम्भव’’ महाकाव्य में महान कवि कालिदास ने भी भगवान शंकर की स्तुति कैलाश पर्वत के साथ की है। देश में तत्कालिन प्रधन मंत्राी जवाहर लाल नेहरू जब चीनी प्रधन मंत्राी से मिल कर हिन्दी चीनी भाई-भाई की नारा दे रहे थे तो चीनी प्रधन मंत्राी धेखा देकर 1962 में भारत पर हमला बोल कर 40 हजार एकड़ जमीन कब्जा कर लिया जो आज भी चीन के कब्जा में है। चीनी का धेखा और भारतीय जमीन को कब्जा को लेकर इस समय डॉ.लोहिया ने भारत के संसद में सरकार पर अविश्वास का प्रस्ताव लाकर सारे देश को झकझोर दिया था। 

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चीन द्वारा तिब्वत पर कब्जा जमाने का भी डॉ.लोहिया ने जमकर विरोध् किया था। इन्होंने कहा था तिब्वत पर चीन का कब्जा शिशु हत्या के समान है। डॉ. लोहिया देश में गरीबी एवं पतन का कारण दो हजार वर्षों तक विदेशियों द्वारा देश को गुलाम बनाये रखना ही कारण मानते है। और भारत को इतने दिनों गुलाम रहने का कारण वे यहाँ की जातिप्रथा को मानते हैं। 

वेद के अवसर प्रमुख चार जातियाँ - ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शुद्र थे। बाहरी विदेशी हमलापर बरावर यहाँ आते रहे और देश को लूटकर कब्जा करते रहे। हमलाबरों से जाति के आधर क्षत्रिय ही केवल यू( में लड़ते थे और अन्य जातियाँ तमाशा देखती रहती । अन्य तीनों की ताकत था इस्तमाल देश के लिये नहीं होता था और अकेला क्षत्रिय जाति बरावर बाहरी दुश्मनों से हारती रहती थी जिसके कारण देश वर्षों तक गुलाम बना रहा।

डॉ.लोहिया मानते थे कि देश के बहुत दिनों तक गुलाम रहने के कारण यहाँ लोग अध्किांश लोग झूठा वेइमान, चालाक दोहरी जवान और बुजदिल हो गये है जिसके कारण देश में भयंकर भ्रस्टाचार और गरीबी है। चालाक और वेइमान आज भी समाज में जाति का धर तेज  करके लोगों में उन्माद फैलाकर वोट  बटोरते हैं और देश एवं गरीबों को लूटते हैं।

 इसलिये डॉ.लोहिया ‘‘विशेष अवसर’’ का सिद्धांत  प्रतिपादित किया कि विशेष अवसर से जातियों टूटेगी और देश मजबूत होगा। डॉ.लोहिया  समाजवादियों द्वारा देश में बराबर जाति तोड़ो सम्मेलन कराते रहते थे। आज डॉ.लोहिया हमलोगों के बीच नहीं हैं नही तो आज के नेताओं  द्वारा वोट के लिये जातियों के लड़ा-लड़ा कर वोट बटोरते देखते।

डॉ. लोहिया राजनीति को दीर्घकालीन  धर्म  और धर्म को अल्पकालिन राजनीति मानते थे। इनका चिन्तन था विना राजनीतिक शुचिता  नैतिकता और सिद्धांत  के विना राजनीति देश और समाज कोचला ही नहीं सकती।
 सिद्धांत हीन राजनीति को वे कुलटा कहते थे। महात्मा गांधी  के विचारों के अनुसार लोहिया भी अच्छाई के लिये राजनीति में या नी लक्ष्य पर पहुँचने के लिये माध्यम को शुचिता और सच्चा होना जरूरी समझते थे।

डॉ.लोहिया लोकनायक जयप्रकाश नारायण को अपना बड़ा भाई समझते थे देश की आजादी की लड़ाई में जे.पी. और लोहिया साथ-साथ मुल्क को आजाद कराने के लिये लड़े और यातनाएं झेली। लोहौर और नेपाल के जेल में तो दोनो नेता एक साथ जल में यातना भुगत चुके हैं। मरने के कुछ दिनपूर्व डॉ. लोहिया जयप्रकाश जी से कापफी दिनों के विछुड़न के बाद पिले थे।

 और दोनों की लम्बी बात चीत देश और देश की दुर्दशा पर हुई थी। डॉ. लोहिया ने जी.पी से मार्मिक शब्दों में कहा था अब मेरा कोई ठिकाना नहीं है कबतक जीउ। इसलिये आप सन्यास छोड़ कर राजनीति में सक्रिय होइये जिससे देश बच सके। डॉ.लोहिया उसके बाद ही दुनिया से चले गये और लोहिया के आग्रह के अनुसार जे.पी. को छात्रा आन्दोलन में कूदना पड़ा था। एक वार 57 में डॉ.लोहिया पटना यूनिर्भसिटी आये थे और विद्यार्थियों को सम्बोध्न किये थे। एक विद्यार्थी ने डॉ. लोहिया से प्रश्न कर दिया कि राजनीति तो झूठों और लकंगो का कार्य है तो डॉ.लोहिया ने प्रश्नकर्ता  विद्यार्थी को सहजभाव से समझाते हुए कहा था। 

वात ऐसी नहीं है राजनीति तो सच्चाई को साधने , बुराई से लड़ने का औजार और जनता की सेवा है। डॉ. लोहिया मरने के समय वेलिंगटन अस्पताल में जब अचेता अवस्था में थे तो अनायास बोलते थे। एक आदमी के लिये इतना अध्कि डाक्टर क्यों है ए डाक्टर। ऐसे आदमी को लाखों जो करोड़ों को देखे। मेरे वाद करोड़ों  को कौन देखेगा। वे बोलते थे जमीन के मालगुजारी का क्या होगा? हिन्दु-मुस्लिम का क्या होगा? तो मरने के समय भी लोहिया के सामने समस्या और देश ही था।

डॉ.लोहिया सड़क से संसद तक संघर्ष  का रास्ता वोट, पफावड़ा और जेल का वसूल दे गये है। उन्होंने गांधी  का सत्याग्रह और सिविलनाकर मानी का दो औजार अहिंसा के रास्ते से चलकर देश के नौजवानों को आगे का रास्ता दे गये है। वे नौजवानों को देश का भविष्य और उर्जा का स्त्रोत मानते थे। उनका कहना था नौजवानों की चेतना और जागृति पर ही देश का भविष्य निर्भर करता है। 12 अक्टूबर 1967 की डॉ. राममनोहर लोहिया का निधन  दिल्ली के बेचिंगरन अस्पताल में 57 वर्ष की अवस्था में हो गया। आज डॉ.लोहिया हमलोगों बीच नहीं है मगर उन्होंने अपने सिध्ध्हंतों  और विचारों का जो दूरवीन दे गये है उससे देश वासियों और खासकर नौजवानों को बहुत दुर तक दिखाई पड़ता है।




गजेन्द्र प्रसाद हिमांशु
पूर्व उपाध्यक्ष बिहार विधान  सभा,
एवं पूर्व मंत्राी, बिहार
संपर्क - 8084994235/9470020238

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