सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षण को लेकर कोई व्यक्ति ‘‘क्रीमी लेयर’’ के दायरे में आयेगा या नहीं, इस बात का निर्धारण करते समय सिर्फ उसकी माता पिता की आय पर ही गौर किया जाना चाहिए. इस मामले में संबद्ध उम्मीदवार की आय पर गौर नहीं होना चाहिए.
इस मुद्दे पर केंद्र के कार्यालय परिपत्र 1993 और शीर्ष अदालत के फैसलों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति जे एस खेहर और न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया. हाई कोर्ट ने परिवार को ‘‘क्रीमी लेयर’’ से जुड़ा हुआ घोषित करने के लिए उम्मीदवार की आय को भी विचार में लिया था.
पीठ ने कहा, ‘‘उक्त निर्धारण राज्य सरकार द्वारा जारी नीतिगत निर्देशों को पढ़ते हुए किया गया जिसके आधार पर किसी उम्मीदवार के पिछड़ेपन पर फैसला किया जाना था.’’ पीठ ने कहा, ‘‘इस बात को स्वीकार करना हमारे लिए संभव नहीं है कि किसी व्यक्ति की स्वयं की आय को विचार के दायरे में लिया जा सकता है.’’ पीठ ने यह बात कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) की ओर से 8 सितंबर 1993 को जारी केंद्र के कार्यालय परिपत्र का विश्लेषण करने के बाद कही.
शीर्ष अदालत ने गौर किया कि श्रेणी चार के संदर्भ में भी पेशेवर व्यक्ति की आय नहीं शामिल की गई है. श्रेणी चार में सीए जैसे पेशेवरों को शामिल किया गया है. अधिवक्ता आर के कपूर के माध्यम से दायर एक उम्मीदवार की अपील को मंजूर करते हुए पीठ ने कहा, ‘‘इस प्रकार देखा जाए तो हम संतुष्ट हैं कि 8 सितंबर 1993 के कार्यालय परिपत्र की श्रेणी छह को सीधे तौर पर पढ़ने पर यह साफ है कि संबद्ध व्यक्ति की आय नहीं बल्कि उसके माता-पिता की आय निर्धारित करेगी कि वह व्यक्ति क्रीमी लेयर के अंतर्गत आएगा या नहीं.’’
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