इस वर्ष दिसम्बर 2014 मे आयोजित होने वाली नेषनल लोक-अदालत मे अधिक से अधिक प्रकरणों के निपटारे की योजना प्रत्येक जिला स्तर पर बन रही हैं। गत वर्ष बिजली बिलों के बकायादार उपभोक्ताओं को 50 प्रतिषत तक की छूट मिलने के साथ लोक-अदालत मे विवाद को समाप्त किया जाता रहा है। परन्तु इस वर्ष की लोक-अदालत के लिये मध्य प्रदेष की विद्युत वितरण कम्पनियों ने यह नियम निर्धारित किये हैं कि विद्युत अधिनियम की धारा 126 व 135 के तहत सिर्फ बिजली चोरी के प्रकरणों मे घरेलू और कृषि कनेक्षन एवं गैर-घरेलू के 5 किलोवाॅट तक तथा औद्यौगिक कनेक्षन के 10 एच.पी. तक के उपभोक्ताओं को कुछ शर्तों के साथ 40 प्रतिषत तक की छूट बिलों के भुगतान मे प्रदान की जायेगी। परन्तु इसके विपरीत, ऐसे अन्य उपभोक्ता जिनका बिलों की राषि पर किसी भी प्रकार का विवाद है, उन्हे किसी भी प्रकार की छूट लोक-अदालत मे नहीं दी जायेगी। ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव एवं विद्युत वितरण कम्पनियों के मध्य विभागीय रिव्यू बैठक मे लिये गये निर्णय से यह प्रकट होता है कि बिजली चोरी करने पर सुविधा मिलेगी और बिल राषि से पीडि़त अन्य किसी उपभोक्ता की कोई सुनवाई नही होगी। चर्चा की विषय वस्तु भी यही है।
विद्युत वितरण कम्पनियों द्वारा बनाई गई इस नीति से दो प्रकार के संदेष मिलते हैं - एक तो यह कि बिजली चोरी के कारण प्रदाय किये गये बिलों की राषि मे छूट की सुविधायें परोसी जा रहीं हैं। परन्तु इस नियम से न्याय मिलने मे समानता की कसौटी का संतुलन नहीं दिख रहा है। देखने मे आ रहा है कि विद्युत बिभाग के ऐसे उपभोक्ता भी हैं जो बिजली कार्यालय के बार-बार चक्कर लगा कर फरियाद कर रहे हैं कि उन्हें प्राप्त हो रहे बिल गलत हैं, जितनी विद्युत खपत बिलों मे दर्षाई गई है उस हिसाब से उनके यहां बिजली की खपत ही नहीं है। वे प्रत्येक माह अपने बिलों मे विद्युत खपत व राषि मे कटौती करने की भीख सी मांगते हुये विद्युत कार्यालयों मे देखे जा सकते हैं। ऐसे भी उपभोक्ता हैं, जिनके मीटर या तो खराब पड़े हैं या वास्तविक और सही खपत को प्रदर्षित नहीं कर पा रहे हैं अथवा जिनके मीटर तो ठीक हैं और सही विद्युत खपत भी दर्षा रहे हैं, परन्तु उन्हें आंकलित खपत के आधार पर बिल प्रेषित हो रहे हैं। यदि उपभोक्ता आंकलित बिल की राषि का भुगतान कर भी दे तो अगले महिने मे ही 50-100 यूनिट की बढ़ौत्तरी करते हुये उसे पुनः आंकलित खपत का बिल दे दिया जाता है। हजारों उपभोक्ता इस प्रक्रिया से परेषान हैं। परन्तु बड़े मजे की बात तो यह है कि इन्हें लोक अदालत मे किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाना है। यह कैसी बिडम्बना है ? यह तो ऐसे हुआ कि चोरी करो और इनाम पाओ एवं यदि नियम, हिसाब किताब की बात कही तो कोई लाभ नहीं दिया जायेगा। परन्तु यह कहना भी गलत नही होगा कि ऐसे भी अनेकों उपभोक्ता हैं जो जानबूझकर विद्युत बिलों का भुगतान कई-कई महिने इस कारण से भी नहीं करते हैं क्यों कि जब लोक अदालत का समय आयेगा तो 50 प्रतिषत की छूट मिलने के इन्तजार मे बने रहते हैं। इसका परिणाम बीते समय मे यह भी हुआ कि विद्युत कम्पनियों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी और बिलों की बसूली मे कमी आ गई। सच तो यह है कि विद्युत उपभोक्ताओं को भी बिलों की राषि का भुगतान नियमित रूप से करना चाहिये और बिलों के ऐरियर्स से सम्बन्धित यदि विवाद है तो वे न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।
समय की आवष्यकता के साथ विद्युत कम्पनियों को यह सोचना होगा कि ग्रामीण अंचल मे ऐसे अनेकों-अनेक व्यक्ति हैं, जिनके घरों मे पिछले 5-10 साल से न तो बिजली सप्लाई हो रही है, न ही मीटर लगा है, न ही विद्युत लाईन है और डी.पी. भी नहीं है, फिर भी उन्हें बिजली के बिल पहुंच रहे हैं। उनके बिलों की राषियां 50-50 हजार रूपये से भी अधिक की हैं। ऐसे उपभोक्ताओं के लिये भी लोक अदालत मे विद्युत कम्पनियों ने कोई छूट नहीं दी है। ग्राम भरसूला (जिला दतिया मध्य-प्रदेष) का निवासी लखनसिंह रावत का कहना है कि वर्ष 2006 मे उसने अपने विद्युत कनेक्षन की समस्त राषि 10,361/- रूपये जमा करते हुये कनेक्षन काटने का निवेदन किया था और तब मकान मे से मीटर भी निकाल लिया गया था। वह गत 8 वर्षों से अपने खेत के कुंआ पर बने कमरे मे निवास कर रहा है तथा गांव के मकान मे न तो कनेक्षन है न ही मीटर लगा है और अचानक 8 वर्ष बाद उसे 43,764/- रूपये की बसूली का बिल थमा दिया गया। इसी तरह इसी जिला मे तहसील बसई के ग्रामीण क्षेत्र के अनेकों पीडि़त ग्रामवासी परेषान होकर भटक रहे हैं, जिन्हें 50 हजार और एक लाख रूपये तक के बिलों की बसूली के नोटिस पहुंचे हैं। जब कि उनका कहना है कि गांव मे न तो विद्युत लाईन है, न ही डी.पी. लगी है, न ही मीटर लगा है, न ही बिजली सप्लाई है और बिजली की बिलिंग फिर भी हो रही है। परन्तु लोक अदालत मे इनकी भी कोई सुनवाई नहीं होगी। स्थानीय जिला एवं तहसील स्तर पर पदस्थ बिजली बिभाग के इन्जीनियर भी बेचारों की स्थिति मे हैं और वे स्वयं भी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के दबाव के कारण बसूली के टारगेट की पूर्ति के कारण टेन्षन मे रहने को मजबूर हैं। उपभोक्ताओं की पीड़ा से वे भी अवगत हैं। विद्युत वितरण कम्पनी के नीति निर्धारण अधिकारी अपने विभागीय कागजी हिसाब किताब और टारगेट बना कर बसूलने योग्य बिलों की राषियों की आऊटस्टैण्डिग कुछ भी लाखों करोड़ों रूपये मे प्रदर्षित करते रहें, लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत को समझना होगा। व्यवसाय का एक सामान्य नियम है कि माल सप्लाई करो और भुगतान बसूल करो। परन्तु यदि यह होगा कि बिजली की सप्लाई भी नहीं करेंगे, उपभोक्ता को संतुष्ट भी नहीं करेंगे, बिल भी भेजेंगे और लोक अदालत मे छूट भी नहीं देंगे। इससे तो आम उपभोक्ता और जनता को न तो न्याय मिल पावेगा और न ही बिजली विभाग के प्रति विष्वसनीयता स्थापित हो पावेगी।
हमें यह ध्यान रखना होगा कि देष के प्रत्येक नागरिक के लिये बिजली की आवष्यकता अब ठीक उसी तरह से है, जिस तरह आम नागरिक को भोजन और पानी की जरूरत होती है। गरीबी की रेखा से नीचे वाला व्यक्ति भले ही बिजली के बिना अपना जीवन-यापन कर भी ले परन्तु देष का निम्न-मध्यम वर्ग का व्यक्ति बिजली के बिना नहीं रह सकता है और बिलों के निर्धारण के लिये बनाये गये टैरिफ के आधार पर राषि के भुगतान करने मे भी वह सक्षम नहीं है। बाजार मे बिकने वाला माल यदि सस्ता होगा तो उपभोक्ता अपनी आर्थिक क्षमता के आधार पर उसे खरीद भी सकेगा और लाभ का टर्न-ओवर भी बढ़ेगा। परन्तु इसके बिपरीत जब माल की कीमत उपभोक्ता की क्रय क्षमता से अधिक होगी, तब वह चोरी करने को मजबूर हो जायेगा। देष का आम व्यक्ति ईमानदारी से रहना चाहता है और प्रथम दृष्टि मे ईमानदारी से बिलों का भुगतान भी करना चाहता है, वह अपने लेन-देन के संव्यवहार मे पारदर्षिता भी चाहता है। लेकिन वह इस बात से भी संतुष्ट होना चाहता है कि बिजली की वास्तविक खपत के आधार पर उसे सही बिल दिया जा रहा है। यह देखने मे आ रहा है कि उपभोक्ता की विष्वसनीयता बिल राषि और विद्युत खपत के आंकलन के प्रति शनैः-शनैः समाप्त हो रही है और यहीं से विवाद प्रारम्भ होता है। सम्पूर्ण देष मे बिजली की खपत और बिल की राषि पर आम उपभोक्ता असंतुष्ट एवं असहमत होता हुआ दिखता है। इसका स्पष्ट तात्पर्य यह है कि देष के बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के बीच मे संव्यवहार की पारदर्षिता नहीं है, संसूचनाओं का अभाव है और उपभोक्ता की फरियाद को सुनने के लिये विद्युत विभागों मे नियमित रूप से कोई फलदाई खिड़की नहीं है। जब कि इसके साथ-साथ विद्युत उपभोक्ता को विद्युत कार्यालय मे बड़ी नकारात्मक और हेय दृष्टि से देखा जाता है। कम से कम यह कार्य तो बन्द होना चाहिये कि बिजली चोरी के कारण विद्युत कम्पनियों पर पड़ रहा आर्थिक बोझ की भारपाई हेतु बसूली का टारगेट उन नियमित विद्युत उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जावे, जो बिलों का भुगतान अपनी खपत के आधार पर नियमित रूप से करना चाहते हैं।
लेखक- राजेन्द्र तिवारी,
अभिभाषक, छोटा बाजार दतिया
फोन- 07522-238333, 9425116738
नोट:- लेखक एक वरिष्ठ अभिभाषक एवं राजनीतिक, सामाजिक विषयों के समालोचक हैं।

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