बिहार में भागलपुर जिला के करीब साठ किलोमीटर के गंगा नदी के क्षेत्र में जल दस्युों की मदद से प्रतिबंधित जालके डाले जाने के चलते राष्ट्रीय जलीय जीव डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में दिखाई पड़ रहा है। विलुप्त प्राणी की श्रेणी में आने वाले गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण एवं संवर्धन के लिये राज्य सरकार द्वारा जिले के सुल्तानगंज से कहलगांव तक 60 किलोमीटर के गंगा के क्षेत्र को डॉल्फिन अभयारण्य के रूप में घोषित कर इस जलीय जीव के शिकार पर रोक लगायी गयी है लेकिन पिछले कुछ समय में गंगा नदी में मछली पकड़ने के लिये प्रतिबंधित जाल के डाले जाने से आम मछलियों के साथशसाथ डॉल्फिन भी फंस जाती हैं और बाद में उसकी मौत हो जाती है । गंगा एवं अन्य नदियों में प्रतिबंधित जाल के डाले जाने का धंधा जल दस्युों के सहयोग से बदस्तूर जारी है । ऐसे धंधे से जहां एक ओर छोटे मछुआरों को आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही हैं वहीं दूसरी तरफ आए दिन डॉल्फिन की अकाल मौत हो रही है। विगत एक दिसम्बर को जिले के खरीक प्रखंड के राघोपुर दियारा के निकट डॉल्फिन अभयारण्य क्षेत्र में एक डॉल्पिंन प्रतिबंधित जाल में फंसी और बाद में उसकी मौत हो गयी। साढे़ पांच फुट की लम्बाई वाले इस डॉल्फिन का वजन 67 किलोग्राम था।
स्थानीय ग्रामीणों की सूचना पर भागलपुर के वन एवं पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंच कर मृत डॉल्फिन को अपने कब्जे में लिया। इससे पूर्व भी अभयारण्य क्षेत्र के कहलगांव. सुल्तानगंज और भागलपुर के निकट भी प्रतिबंधित जाल में फंसने की वजह से कई डॉल्फिनों की मौतें हो चुकी हैं। बावजूद इसके संबंधित विभाग के इस दिशा में काई ठोस उपाय नहीं किया है। इसके चलते गांगेय डॉल्फिन की अकाल मौत में इजाफा होता जा रहा है। वन एवं पर्यावरण विभाग के स्थानीय रेंज पदाधिकारी विद्यापति सिन्हा का कहना है कि डॉल्फिन मीठे पानी का बहुत नाजुक जीव है और पूरी तरह से संरक्षित भी है। यह एक स्तनधारी जलीय जीव है जो बड़ी मछली की तरह दिखती है। उन्होंने बताया कि स्थानीय भाषा में इसको सोंस के नाम से भी जाना जाता है और इसके सरंक्षण के लिये राज्य सरकार ने वर्ष 2012 में डॉल्फिन टास्क फोर्स का गठन किया है। तब से कई योजनाएं चल रही है। इधर डॉल्पिंन संरक्षण पर कार्य कर रहे जलीय वैज्ञानिक डा. सुनील चौधरी का कहना है कि आए दिन डॉल्फिन की हो रही मौत से हमारी चिंताएं बढ़ी है क्योंकि इसके संरक्षण की दिशा में ठोस पहल नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि गंगा में जल माफिया का राज है और इससे गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य क्षेत्र भी प्रभावित है जिस कारण इस क्षेत्र में विचरण करने वाले डॉल्फिन के अस्तित्व पर खतरे की संभावना प्रबल होती जा रही है।
श्री चौधरी ने कहा कि इस जलीय जीव के संरक्षण एवं संवद्र्धन के लिये सरकारी स्तर पर किये जा रहे उपायों के साथ साथ आम नागरिकों की भी सहभागिता जरूरी है। एक र्सवेक्षण के मुताबिक बड़ी मछली की तरह दिखने वाले इस जीव की अस्सी प्रजातियों में से चार प्रजातियां समुद्री है । समुद्री डॉल्फिन की चार प्रजातियों में एक चीन में पायी जाती थी जो वर्ष 2006 में विलुप्त हो चुकी है जबकि भारत में बिहार के भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से कहलगांव तक के गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य क्षेत्र में 234 डॉल्पिंनें पायी गयी है जो पहले की अपेक्षा कापंी अधिक है। बहरहाल गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य क्षेत्र में गंगा में विचरण करने वाले डॉल्फिनों को हो रही मौतों से जलीय वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों में क्षोभ देखा जा रहा है।

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