विशेष आलेख : क़ानून नहीं, मानसिकता बदलनी होगी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 17 दिसंबर 2014

विशेष आलेख : क़ानून नहीं, मानसिकता बदलनी होगी

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दिल्ली में रेडियो टैक्सी ड्राइवर द्वारा एक महिला के साथ बलात्कार की वारदात को अभी हफ़्ता भी नहीं बीता था कि दिल्ली के ही अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ग्राउंड स्टाफ द्वारा एक महिला के साथ छेड़छाड़ की घटना ने न सिर्फ सभ्य समाज को शर्मिंदा किया है बल्कि क़ानून व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है. महिलाओं के साथ जिस प्रकार से सरेआम छेड़छाड़ की घटनाओं को अंजाम दिए जाने की ख़बरें आ रही हैं उससे 16 दिसंबर 2012 की घटना फिर से ताज़ा हो गई. इस घृणित अपराध के बाद एक बात तो साबित हो गया है कि कड़े से कड़े क़ानून बना देना ही मसले का हल नहीं है. फांसी की सजा का प्रावधान भी बलात्कार की घटना को समाप्त करने में कारगर साबित नहीं हो सका है. दो साल पहले निर्भया कांड के बाद जिस प्रकार से देश में गुस्से की लहर देखी गई थी वह हर बलात्कार की घटना के बाद भी बदस्तूर जारी है. हालांकि उस घटना के बाद सरकार ने अपराध के क़ानून को और भी सख़्त बनाया था. जिसके बाद यह उम्मीद बंधी थी कि मानवता को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाओं पर रोक अवश्य लगेगी। लेकिन बीते दो वर्षों में इसमें कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है. सख़्त सज़ा के प्रावधान के बावजूद बीते दो वर्षों में रेप केस में दोगुने की वृद्धि दर्ज की गई है. तीन साल की मासूम बच्ची से लेकर 73 साल की वृद्धा तक के यौन हिंसा के शिकार होने का सिलसिला नहीं रुका है. दफ्तर से लेकर बाज़ार और घर से लेकर स्कूल तक बलात्कार की ख़बरें सुर्खियां बनी हुई हैं. देखा जाए तो इस वक़्त भारत में बलात्कार एक संक्रमण की तरह फैलता जा रहा है. यौन हिंसा के मामले में भारत विश्व में तीसरे नंबर पर है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार भारत में औसतन 93 महिलाएं रोज़ाना बलात्कार की शिकार होती हैं. आंकड़े बताते हैं कि 2012 में यौन हिंसा के जहाँ 24,993 मामले सामने आये वहीं यह 2013 में बढ़कर 33,707 हो गए. वह भी इस स्थिति में जबकि रेप के पांच फीसद से भी कम केस दर्ज किये जाते हैं. सरकारी आकंड़ों के अनुसार अकेले देश की राजधानी में ही पिछले सालों की तुलना में इस वर्ष यौन हिंसा के मामलों में इज़ाफ़ा हुआ है. सरकार ने संसद में दिए आंकड़ों में इस बात को स्वीकार किया है कि दिल्ली में हर रोज़ महिलाओं से जुड़े अपराध के करीब 40 मामले थानों में दर्ज होते हैं. महज़ 11 महीनों में ही राजधानी के विभिन्न थानों में महिला हिंसा से जुड़े 13 हज़ार से अधिक रिपोर्ट दर्ज हुए हैं. जो पिछले साल की तुलना में 15 फीसद अधिक है.

बलात्कार की घटना जहाँ सभ्य समाज को शर्मिंदा कर देता है वहीँ इसकी शिकार पीड़िता को मानसिक रूप से तोड़ देता है. वह चाह कर भी इस घटना से उबर नहीं पाती है. अफ़सोस तो इस बात की है कि समाज के माथे पर यह कलंक केवल देश के छोटे शहरों में नहीं होता है बल्कि दिल्ली जैसी अतिसुरक्षित क्षेत्र, बंगलुरु जैसे शिक्षित इलाक़ों और शांत समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्तराखंड जैसे पहाड़ी इलाक़ों में भी ऐसे घृणित कार्य अंजाम दिए जा रहे हैं. हाल ही में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक सात साल की मासूम बच्ची का शादी समारोह से अपहरण और फिर बलात्कार और हत्या इस बात की ओर इशारा करता है कि ऐसी गन्दी मानसिकता से अब साफ़ दिल कहलाने वाला पहाड़ी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं है. ऐसे बहुत से केस हैं जो हमें इस बात को सोचने के लिए विवश कर देता है कि आखिर हमारी नैतिकता का पतन क्यूँ हो रहा है? क्यूँ हमारी मानसिकता नारी को केवल भोग की वस्तु समझने लगी है. कुछ तो कारक हैं जो हमारे समाज में विकार पैदा कर रहे हैं. यदि ऐसे कुछ कारकों की पड़ताल की जाये तो यौन हिंसा की भावना को प्रोत्साहित करने वाले बहुकारक तथ्यों में एक नशा यानि शराब है. यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस के आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर अपराध नशे की हालत में अंजाम दिए जाते हैं. सर्वे बताते हैं कि अल्कोहल 40% अपराध के लिए ज़िम्मेदार होती हैं जिनमे 37% अपराध बलात्कार के होते हैं. नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ अलकोहॉलिस्म एंड एब्यूज के एक अध्ययन में अत्यंत ही चौकाने वाली बात सामने आई है. जिसमे यह पाया गया है कि आधा से ज़्यादा रेप के मामलों में अपराधी और पीड़ित घटना के दौरान नशे में थे. ये आंकड़े कितने विश्वसनीय कहे जा सकते हैं यह ज़रूर बहस का मुद्दा हो सकता है. हमारे देश में यौन हिंसा के बढ़ते मामलों में शराब के साथ साथ अश्लील फ़िल्में, विज्ञापन और फ़ूहड़ बोल वाले गाने भी बहुत हद तक ज़िम्मेदार होते जा रहे हैं. जो समाज में यह सन्देश पहुंचा रहे है कि महिला भोग और कामुकता की पूर्ति मात्र है.

भारत को आज रेप कैपिटल की उपाधि दी जा रही है. दुनिया भर में इसकी छवि महिलाओं के लिए एक असुरक्षित देश के रूप में प्रचारित की जा रही है. जो 21वीं सदी में उभरते भारत की साख पर बट्टा है. कभी लड़कियों के कम कपड़ों  पहनने के ख़िलाफ़ फरमान जारी होता है तो कभी मोबाइल फ़ोन नहीं रखने का हुक्म सुनाया जाता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज महिलाओं पर ज़बरदस्ती इच्छा थोपी नहीं जा सकती है. उनके कपड़ों की साइज से उनकी मानसिकता का पता लगाना भी गलत है. दरअसल कम कपड़े पहनने से समाज में विकार नहीं आता है बल्कि अमर्यादित कपड़े इसके ज़िम्मेदार होते हैं. ऐसे लोगों का यह तर्क कि भड़काऊ कपड़े पहनने वाली महिलाएं यौन हिंसा की ज़िम्मेदार होती है, पूरी तरह से सत्य नहीं है तो असत्य भी नहीं है. हम इस तर्क से मुँह नहीं मोड़ सकते हैं कि ऐसे कपड़े जिनसे अंग प्रदर्शन होते हैं, आंशिक तौर पर महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराध के लिए बहुत हद तक ज़िम्मेदार हैं. आसपास के बदलते हालात और फिल्मों में नारी को कामुकता के रूप में प्रस्तुत किया जाना पुरुषों में मानसिक विकार उत्पन्न होने का एक अहम कारक बनता जा रहा है. मनोवैज्ञानिक अपनी शोध में इस बात को साबित कर चुके हैं कि फिल्मों में अश्लीलता या पोर्न फ़िल्में अथवा साइटें बलात्कार की प्रवृर्ति को उजागर करने में सबसे अहम कारक होते है. पोर्न देखते समय इंसान के दिमाग़ में एक रासायनिक स्राव होता है जो उसे कामुक सुख का एहसास कराती है. जिससे मनुष्य यौन सुख प्राप्ति की इच्छा जागृत करता है और यही क्रिया बार बार दुहराने से वह इंसान मानसिक विकार का शिकार हो जाता है. कुछ ऐसा ही कैब ड्राईवर शिव कुमार यादव में देखने को मिला। जिसके मोबाइल में पुलिस को अश्लील फ़िल्में मिली हैं. जब कोई महिला अंग प्रदर्शन करती है तो मानसिक विकार के शिकार ऐसे पुरुषों में उन्हें और कम कपड़ों में देखने और उनके साथ यौन सुख का आनंद उठाने की इच्छा जागृत हो जाती है. जो बलात्कार की संभावनाओं को अधिक बढ़ाते हैं. 2012 में किये गए एक सर्वे में 56% पोर्न फ़िल्में देखने वालों ने इस बात को स्वीकार किया कि उनकी रूचि इसमें लगातार बढ़ती जाती है और वह सामान्य पोर्न फिल्मों से आगे बढ़कर हिंसक पोर्न फ़िल्में देखने के आदी हो जाते हैं. ऐसी फ़िल्में देखने के बाद उन्हें अपनी इच्छा पूर्ति करनी होती है. इसके लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार होते हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि बलात्कार उसी वक़्त, उसी स्थान पर और उसी महिला के साथ हो जिसने कम कपड़े पहना हुआ हो. अपराधी अपनी यौन इच्छा की पूर्ति के लिए शिकार तलाशता है. इसके लिए वह किसी अकेली असहाय महिला के साथ दुष्कर्म कर सकता है, यहाँ तक कि मासूम अबोध बच्ची को भी अपनी दरिंदगी का शिकार बनाने से नहीं झिझकता है. उसका केवल एक लक्ष्य होता है और वह है किसी भी प्रकार से अपनी हवस को मिटाना। कई बार ऐसी ख़बरें भी सुनने को मिली हैं जब एक कपूत ने नशे की हालत में अपनी माँ के साथ दुष्कर्म किया है. जब एक पिता ने अपनी पुत्री को हवस का शिकार बनाया है. जब धोखे से एक पुरुष मित्र ने नशा देकर अपनी महिला मित्र से बलात्कार कर मित्रता के रिश्ते को तार तार किया है. यह भी ज़रूरी नहीं है कि सभी पोर्न उपभोक्ता बलात्कारी हों मगर वास्तविकता से मुँह भी मोड़ा नहीं जा सकता है. 

ऐमेनस्टी इंटरनेशनल की ओर से किये गए एक सर्वे में 27% लोगों ने यह माना कि भड़काऊ कपड़े दुष्कर्म की एक प्रमुख वजह होती है. उत्तेजक कपड़े पहनने के हिमायती चाहे जो भी दलीलें दें, चाहे पुरुषों को जितनी भी नसीहतें दें वास्तविकता तो यही है कि हमारा समाज अभी इतना अपडेट नहीं हुआ है कि खुलापन को आम जनजीवन का हिस्सा मानें। दूसरी बात यह है कि ऐसे कपड़े फैशन तक सीमित हो तो अच्छा लगता है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से भी इसे उपयुक्त नहीं कहा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि नारी अपने आप को चारदीवारी में क़ैद कर ले और दासी का जीवन जीने को मजबूर हो जाये। आज बाज़ार में ऐसे कई परिधान उपलब्ध हैं जिसमे एक औरत खूबसूरत और मॉर्डन होने के साथ साथ स्वयं को सुरक्षित भी महसूस कर सकती है. नारी कुदरत की एक अनमोल तोहफा है जिसमे ममता के साथ साथ सुंदरता भी शामिल है. इसे दिखाने के लिए किसी अंग प्रदर्शन की ज़रूरत नहीं है. अगर फिर भी कोई यह तर्क देता है कि छोटे कपड़े यौन हिंसा के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते हैं तो एक नारी होने के नाते मेरा उनसे एक साधारण सा सवाल है कि आखिर बार गर्ल्स, पोल डांसर और जिस्म की मंडी में पेश की जाने वाली औरत को कम और उत्तेजित करने वाले कपड़ों में क्यूँ प्रस्तुत किया जाता है? ऐसे कई तर्क़ हैं जिनका जवाब ढूँढना सभ्य समाज के हित में है. केवल क़ानून में बदलाव या फिर उसे सख़्त बनाने से इस मसले का कभी हल नहीं निकाला जा सकेगा, यदि कुछ बदलना है तो वह है अपनी मानसिकता और यह ज़िम्मेदारी सभी पर लागू होती है. 






(निशात खानम)

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