एक अमेरिकी थिंक ने भारत सरकार को काला धन विदेशों से वापस लाने के बजाय देश का काला धन बाहर जाने से रोकने पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना है कि विदेशों में जा रहा भारत का अघोषित धन वर्ष 2003 से नौ गुना अधिक हो गया है। अमेरिका में केंद्रित थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंट्रेगिटी (जीएफआई) के अध्यक्ष रेमंड बेकर का कहना है कि भारत को विदेशों से काले धन की वापसी में सफलता इसलिए नहीं मिल सकती क्योंकि इस अवैध का सबसे अधिक फायदा अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को सबसे अधिक होता है।
बेकर ने कहा कि ये मसला आसान नहीं है। उनके विचार से देश के बाहर जा रहे काले धन को रोकने की अधिक आवश्यकता है। इसे रोकने की बेहतर प्रणाली पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत काला धन वापस लाने के मुकाबले इस बात में सफलता मिलने की अधिक गुंजाइश है। जीएफआई की पिछले महीने की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत से विदेशों में जाने वाले काले धन की धनराशि पिछले ग्यारह सालों में नौ गुना बढ़ चुकी है। वर्ष 2003 में भारत से विदेशों में जाने वाला काला धन 10 अरब डॉलर (करीब 63 अरब रुपये) था जोकि 2014 तक बढ़कर 94.7 अरब डॉलर (करीब 5,966 अरब रुपये) हो गया है। काले धन को देश से बाहर भेजने में भारत मलेशिया को पछाड़कर चौथा स्थान पर आ गया है।
वर्ष 2003-2012 के बीच चीन, रूस और मेक्सिको के बाद भारत काले धन का चौथा सबसे बड़ा आयातक देश बन गया है। बेकर ने दावा किया कि काले धन की ये रकम एक अनुमान भर है। असली रकम इससे कहीं अधिक हो सकती है। किसी भी देश के लिए काला धन वापस लाना एक कठिन लक्ष्य हो सकता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दरअसल इसका समर्थन करता ही नहीं है। भारत के काले धन से अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मुख्य लाभांवित पश्चिमी देश कभी भी नहीं चाहेंगे कि उनकी अर्थव्यवस्था से ये बेहिसाब रकम अलग हो जाए।
उन्होंने कहा कि वैश्विक विचार तो यही है कि सरकारी अधिकारियों या अन्य किसी अवैध तरीके से देश का चुराया पैसा मूल देश को वापस लौटाया जाए। लेकिन कराधान को लेकर वाणिज्यिक क्षेत्रों में ऐसी वैश्विक समझ विकसित नहीं हुई है। करों की चोरी से बनाई गई मोटी रकम ही भारत के बाहर अवैध रूप से भेजी जा रही है। विकासशील देश इस मुद्दे पर अपना दुखड़ा रोते हैं लेकिन इस समस्या का ठोस निराकरण जी-20 स्तर पर किया जाना चाहिए।
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