विशेष आलेक : मान्यवर को भारत रत्न - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 5 जनवरी 2015

विशेष आलेक : मान्यवर को भारत रत्न

बसपा सुप्रीमो मायावती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के समय से ही पार्टी संस्थापक कांशीराम को भारत रत्न अलंकरण देने का राग अलाप रही हैं। ऐसे में जब मोदी सरकार ने अटल विहारी वाजपेई और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न घोषित किया तो फिर उनका मुखर होना स्वाभाविक ही है लेकिन यह मामला तीखी आपत्ति का कारण इसलिए बन गया है कि उन्होंने मोदी सरकार की नीयत पर जातिगत आधार पर सवाल खड़े किए हैं। समाज का एक बड़ा वर्ग इससे तिलमिलाया हुआ है। वैसे भी जब से मोदी सरकार केेंद्र में पदासीन हुई है तब से प्रतिक्रिया वाद चरमसीमा पर पहुंच गया है। न तो देश की एकता की चिंता की जा रही है और न ही अखंडता के बारे में सोचा जा रहा है। सदियों पहले पिटने का बदला अब एक ही दिन में ले डालने का पराक्रम दिखाया जा रहा है। खुद मोदी अपने भस्मासुरों की इस हरकत से कम परेशान नहीं हैं। उनकी नाराजगी के बाद ही उत्तर प्रदेश में संघ की ओर से भाजपा के साथ समन्वय के लिए नियुक्त किए गए राजेश्वर सिंह को जबरिया अवकाश पर भेज दिया गया है।

इस बारे में आगे की पंक्तियों में चर्चा होगी। फिलहाल तो यह कि मायावती जो अभी तक भूमिगत सी थीं एकदम हमलावर अंदाज में सामने कैसे आ गईं। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा उपचुनाव में उनके मूल वोट बैंक के बिक जाने की खबर ने मायावती को बेचैन कर रखा है। दरअसल मायावती ने उपचुनावों में मैदान छोडऩे का फैसला कर लिया था। उन्हें यह पता था कि सपा की सरकार में उनका वोट बैंक स्वतंत्र होकर वोट नहीं कर पाएगा। इस कारण उनकी फजीहत वैसे भी होगी। दूसरी ओर जब बसपा का उम्मीदवार सामने नहीं होगा तो सपा का सताया उनका वोट बैंक भाजपा को वोट कर देगा जिससे सपा को उपचुनावों में नीचा देखना पड़ेगा लेकिन उन्हें यह कल्पना नहीं थी कि उनके वोटर सपा से कीमत लेकर उसकी अप्रत्याशित सफलता का कारण बन जाएंगे। उपचुनाव के परिणाम जब सामने आए तो मायावती के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके सामने खतरा यह उपस्थित हो गया कि कहीं ऐसा न हो कि उनके वोटर को पैसा लेकर वोट देने की लत पड़ जाए। इस कारण मायावती ने उपचुनाव के बाद से ही अपनी रणनीति में बदलाव के संकेत देने शुरू कर दिए थे जिसके तहत सामान्य जातियों से दूरी बनाकर बहुजन समाज की पार्टी के प्रति पुरानी गर्मजोशी को जगाने की नीति शामिल थी। कांशीराम को भारत रत्न की मांग के बहाने उन्होंने इस सिलसिले को और प्रभावी बनाते हुए अटल विहारी वाजपेई व मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न देने की परिघटना का जातिगत चश्मे से मूल्यांकन किया है। यह सही है कि मायावती जिस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं उसमें उनका इस तरह से बयानबाजी करना अशोभन महसूस हो रहा है। दूसरी ओर यह भी सही है कि उनका कहने का तरीका अनगढ़ हो सकता है लेकिन उनकी शिकायत में कहीं न कहीं वजन जरूर है।

कांशीराम ने समाज के एक बड़े हिस्से के स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष में अपनी नौकरी कुर्बान की। परिवार छोड़ा। गृहस्थी आबाद करने की स्वाभाविक इच्छा का त्याग किया। इस मिशन के लिए वे समर्पित होकर जुटे रहे जिसमें उनके असीम त्याग की झलक मिलती है। कांशीराम ने पार्टी के लिए कितना भी फंड जुटाया हो लेकिन उन्होंने खुद पूरी तरह सादगी का जीवन जिया। यही नहीं उनकी अपनी राजनीति से उन्होंने अपने परिवार के किसी आदमी को लाभ पहुंचाने की चेष्टा की हो ऐसा आरोप कोई भी नहीं लगा सकता। सामाजिक उद्देश्य के लिए अपनी जिंदगी न्यौछावर करने वाले हर व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए। कांशीराम इस मामले में भाजपा के किसी भी नेता से बहुत ऊंचे हैं पर दुर्भाग्य की बात यह है कि कांशीराम तो क्या महान विद्वान बाबा साहब अंंबेडकर तक की कुर्बानी को वर्ण व्यवस्था वादी चेतना से अनुप्रेरित लोग सम्मान नहीं देते। सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी विजय शंकर सिंह के पोस्ट पर छिड़े प्रतिक्रियाओं के दौर में बाबा साहब का जब जिक्र आया तो वर्ण व्यवस्था वादी वर्ग चेतना के एक व्यक्ति का कमेंट था कि बाबा साहब तो अंग्रेजों के एजेंट थे। अगर वे अंग्रेजों के एजेंट होते तो निधन के बाद उनकी हैसियत कर्जदार की न निकलती। बाबा साहब ने वर्ण व्यवस्था की वजह से अपमान का जहर पीते-पीते अंत में प्रतिज्ञा की थी कि उन्होंने हिंदू धर्म में जन्म तो लिया है लेकिन वे हिंदू रहकर मरेंगे नहीं। उनकी इस प्रतिज्ञा के बाद ईसाईयों और मुसलमानों के नेताओं ने उन्हें बहुत प्रलोभन देकर अपने धर्म में शामिल करना चाहा पर बाबा साहब ने सारे प्रलोभन ठुकरा दिए। उन्होंने अपनी वेदना को अंध प्रतिशोध में परिणित नहीं होने दिया और एक ऐसे धर्म को अपनाने का निश्चय किया जिसका उद्घोष इसी देश की धरती पर हुआ था और जिसकी वजह से ही भारत को पहली बार विश्व गुरु का सम्मान मिला था और आज भी मिल रहा है। राष्ट्रीय और सामाजिक एकता के लिए बाबा साहब ने जो योगदान दिया वह किसी भी स्वयं भू राष्ट्रवादी नेता से बहुत अधिक है। उन्होंने बहुत पुरजोर तरीके से इस बात का खंडन किया कि भारत में अछूत और दलित समस्या इस कारण है क्योंकि बाहर से आए हुए आर्यों ने इस देश पर कब्जा करने के बाद यहां के मूल बाशिंदों के लिए अमानुषिक सामाजिक विधान रचे। बाबा साहब अंबेडकर ने कहा कि जाति व्यवस्था का सूत्रपात तब हुआ जब द्रविड़, सीथियंस, आर्य आदि के बीच रोटी-बेटी के संबंध हो चुके थे और इनके बीच नस्ल और खून का भेद कभी का समाप्त हो चुका था। इस कारण मूल भारतीय बनाम विदेशी के झगड़े को जाति व्यवस्था का कारण बताने की थ्योरी गलत है। यही नहीं बाबा साहब ने शूद्रों के लिए कठोर नियमों के प्रतिपादन से मनु को बरी करते हुए कहा कि कोई एक व्यक्ति एक समय में इतने कठोर विधान नहीं बना सकता था वरना समाज में विद्रोह हो जाता। इस कारण अस्पृश्यता की समस्या के लिए मनु को दोषी ठहराना गलत है। उन्होंने बताया कि किस तरह ब्राह्म्ïाण बनाम क्षत्रिय संघर्ष, बौद्ध धर्म के सफाए के उन्माद और अनुलोम-प्रतिलोम विभाव पर अंकुश के क्रम में जाति व्यवस्था के प्राविधान कठोर व अमानुषिक होते गए। 

सामाजिक एकता की इतनी बड़ी सेवा करने के बावजूद अगर बाबा साहब को देशद्रोही कहा जाए तो कहना पड़ेगा कि ऐसे हिंदू धर्म और हिंदू समाज को कोई बचा नहीं पाएगा। कांशीराम के त्याग को भी निरपेक्ष होकर स्वीकार करने की हिम्मत सवर्ण बुद्धिजीवियों में नहीं है इसलिए मायावती ने भारत रत्न के लिए महापुरुषों के चयन में जातिगत पक्षपात का आरोप लगाया है तो यह पूरी तरह गलत नहीं है। सही बात तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा में अपने तरीके से कई गेम खेल रहे हैं। उन्हें अटल विहारी वाजपेई गुजरात के दंगों के बाद गुजराद के मुख्यमंत्री पद से हटाने पर आमादा थे। मोदी जिस मिट्टी के बने हुए हैं उसके संदर्भ में सभी को पता है कि अपने साथ ऐसा सलूक करने वाले को वे बख्श नहीं सकते। इस कारण मोदी को अटल जी से श्रद्धा हो सकती है यह बात हजम नहीं की जा सकती। मोदी युग में भाजपा में जिस तरह से ब्राह्म्ïाणों का पराभव हुआ है और उसकी प्रतिक्रिया जिस तरीके से विवादित मुद्दों को उग्र तेवरों में हवा देने के रूप में सामने आ रही है उससे उत्पन्न संकट के निवारण के लिए अटल विहारी वाजपेई और मालवीय जी को भारत रत्न घोषित करना एक हथकंडा मालूम होता है। अगर ऐसा नहीं है तो मोदी ने भी चुनावी सभाओं में सामाजिक मामलों में कई क्रांतिकारी वकतव्य दिए हैं जिनके अनुरूप उन्हें फौरन मान्यवर कांशीराम को भारत रत्न की घोषणा कर देनी चाहिए।



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के पी सिंह 
ओरई 

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