- इमू पालन कर लिक से हटकर एक अलग तरह के व्यवसाय से लाभ कमाने का बीजारोपण
व्यवसाय कोई भी हो, छोटा-बड़ा नहीं होता। शर्त यही कि पूरी इमानदारी व जीवटता के साथ व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति समर्पित हो। अपने मूल्यों, सिद्धान्तों को जो समय की परिधि में बाँध कर चलते हैं वे ही इतिहास गढ़ते हैं। काम करने के लिये बहुत बड़ी पूँजी आड़े नहीं आती। पूँजी थोड़ी ही क्यों न हो, तकनीकी ज्ञान व सिस्टमेटिक तरीकेे से किया गया काम दूसरों के लिये एक मिसाल बन जाता है। कई लोग वैज्ञानिक तरीके से खेती व पशु-पक्षी पालन के जरिये देश-विदेश में अपनी पहचान बना रहे हैं। दूसरों को तकनीकी जानकारी देकर आर्थिक सम्पन्नता की ओर उन्हें जागरुक करने का काम भी किया जा रहा है। यह दिगर बात है कि प्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफी संपन्न राज्य झारखण्ड में वैज्ञानिक व तकनीकी रुप से काम का अभाव आज भी देखा जा रहा, तथापि एक छोटे से जिले में किसी ने बड़े काम का दायित्व संभाल रखा है तो वह काबिले-तारीफ माना जाऐगा। मुर्गी-मुर्गा, कबूतर, बत्तख, बकरी, सुअर व अन्य मांसाहारी जानवरों को पालने की परंपरा तो दुमका में काफी पुरानी रही है, ननवेज (मासांहारी) डिस में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा
आस्ट्रेलियाई पक्षी इमू के व्यवसाय से लाभ कमाने की पहली पहल दुमका में महानंद हेम्ब्रम के नाम जाता है, जिन्होनें लिक से हटकर अलग तरह के व्यवसाय से लाभ कमाने की परंपरा का बीजारोपण किया। उप राजधानी दुमका के मसलिया रोड स्थित मुहल्ला विजयपुर में इमू वर्ड फार्म के जरिये महानंद हेम्ब्रम व्यवसाय को काफी आगे ले जाना चाहते हैं। महानंद हेम्ब्रम के अनुसार सरकारी नौकरी से मुक्त होने के बाद घर पर बैठे रहने से वे घुटन महसूस कर रहे थे। अखबार में एक दिन उन्होनें इमू वर्ड पालन से संबंधित एक समाचार पढ़ा। सामान्य व्यवसाय से यह अलग हटकरं लगा। फिर क्या था, उन्होनें इमू वर्ड पालन की जानकारियाँ जुटानी प्रारंभ कर दी। अंततः उन्होनें जानकारियाँ जुटा ही ली। खाली वक्त का सदुपयोग भी हो गया और एक नये व्यवसाय की नींव भी पड़ गई। अपने आवास के खाली पड़े स्थानों को चारों ओर घेरकर श्री हेम्ब्रम ने एक छोटा सा फार्म बना लिया। श्री हेम्ब्रम के अनुसार अप्रैल 2014 में इमू वर्ड फार्म खोलकर उन्होनें इसका व्यवसाय भी प्रारंभ कर दिया। पहले तो इस असुन्दर पक्षी को देखकर ही लोग डर गए।
किसी ने घाटे का बिजनेश कहकर इसे बंद करने को कहा तो किसी ने इस पक्षी से संबंधित अनुकूल मौसम न रहने की वजह से पक्षियों के असमय काल के गाल में समा जाने की दुहाई देकर उन्हें हतोत्साहित करना चाहा। सारी भ्रान्तियों को दरकिनार करते हुए श्री हेम्ब्रम ने इसे आजमाने का मन बना ही लिया, फिर क्या था। कुछ ही महीनें के दौरान एक अच्छी आमद ने श्री हेम्ब्रम के इमू पालन साहस को दूना बना दिया। श्री हेम्ब्रम के अनुसार एक इमू का औसत वजन 35 से 50 कि0ग्रा0 तक होता है। इस पक्षी का माँस तीन सौ रुपये प्रति कि0ग्रा0 की दर से बेचा जाता है। इमू माँस की मांग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। पहले यह विजयपुर व आसपास के क्षेत्रों तक ही सीमित था, धीरे-धीरे बाजार से भी काफी संख्या में प्रति रविवार लोगों का फार्म हाउस पहुँचना प्रारंभ हो गया। श्री हेम्ब्रम के अनुसार यूँ तो इमू पालन के लिये पर्याप्त भूखंड की आवश्यकता होती है, किन्तु व्यवसाय के लिये थोड़े भूखण्ड में भी काम चलाया जा सकता है। अन्य पशु-पक्षियों की तुलना में इमू पालन सबसे आसान है। इसके लिये न तो किसी बड़े व महंगे शेड की दरकार होती है और न ही किसी खास मौसम व भोजन की। मकई का दर्रा इस पक्षी का एकमात्र आहार है। गोभी पत्ता, कोमल पत्तियाँ व घर की सब्जियों के छिलके जाया नहीं जाते। एक पक्षी एक दिन में आधा किलो मकई का दर्रा खा जाता है।
शरीर की तंदुरुस्ती व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद लाभकारी इमू माँस में कोलेस्ट्रोल का न होना ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इस पक्षी के माँस में आयरन, मेग्निशियम, फाॅस्फोरस व प्रोटिन्स काफी मात्रा में पाये जाते हैं। इमू पक्षी की चर्बी से ओमेगा दो, तीन व नौ नामक दवा तैयार की जाती है जो हदय रोग पीडि़तों के लिये काफी कारगर माना जाता है। इमू पालक महानंद हेम्ब्रम के पुत्र रितेश हेम्ब्रम के अनुसार दुमका में इमू हेचरी नहीं है। मनोहर इमू फार्म डालाबार (नाला) जामताड़ा स्थित हेचरी में इमू के अंडे प्रस्फूटन के लिये भेज दिये जाते हैं। 52 दिनों तक हेचरी में अंडों को रखकर उसे सेया जाता है और फिर बच्चे निकल जाने के बाद इमू पालक को लौटा दिया जाता है। इमू का अंडा तकरबीन 7 से 9 सौ ग्राम तक का होता है। इमू पालक महानंद के पुत्र रितेश हेम्ब्रम के अनुसार 0 से 55 डिर्गी सेंटीग्रेड में यह पक्षी बिना किसी परेशानी के रह सकता है। अक्टूबर से मार्च तक इस पक्षी के प्रजनन का अनुकूल मौसम होता है। इर्मू वर्ड का फार्मिंग झारखण्ड में हाल के वर्षों में ही प्रारम्भ हुआ है। आस्ट्रेलियाई पक्षी इमू की अधिकतम उँचाई 5 फीट तक होती है। इस पक्षी के त्वरित विकास के लिये पर्याप्त जगह की आवश्यकता होती है। एक पक्षी के लिये तकरीबन 3 सौ स्क्वायर फीट जमीन की जरुरत होती है जिसमें इसका ग्रोथ निर्धारित समय बढ़ाया जा सके।
आस्ट्रेलियाई पक्षी जिनियस ड्रोमेईसस (वैज्ञानिक नाम) प्रजाति के इस पक्षी का फारमिंग दक्षिण के राज्यों केरल, गुजरात, आन्ध्रप्रदेश सहित महाराष्ट्र व उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश, बंगाल, बिहार व झारखण्ड में काफी लोकप्रिय हो चुका है। इस प्रजाति का दूसरा प्राणी शुतुरमुर्ग माना जाता है। वेस्टर्न आस्ट्रेलिया में भ्रमण के दौरान सर्वप्रथम यूरोपियन घुमक्कड़ों ने वर्ष 1696 में पहली मर्तबा इस पक्षी को देखा था। रेफरल पशु चिकित्सालय (संताल परगना) के प्रभारी पशु चिकित्सक डा0 समीर सहाय के अनुसार इमू पालन आर्थिक दृष्टिकोण से जहाँ एक ओर काफी फायदेमंद है वहीं दूसरी ओर ननवेज (मांसाहारी) लोगों के लिये बिना कोलेस्ट्रोल वाला आहार। डा0 समीर सहाय के अनुसार अमूमन देखा जाता है पशु-पक्षियों के मांस भक्षण से कोलेस्ट्रोल व चर्बी काफी बढ़ जाती है जिससे मनुष्य में तरह-तरह के रोग विद्यमान हो जाते हैं। इमू के माँस में इस तरह की कोई बात नहीं होती। डा0 सहाय ने कहा वैसे मांसाहारी की तुलना में शाकाहारी रहना अधिक उम्र तक स्वस्थ रहने का प्रमाण है।
अमरेन्द्र सुमन
(दुमका) झारखण्ड
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