केंद्र की सियासत पर नरेन्द्र मोदी के कदम पड़ते ही महंगाई के सबसे बड़े गुनहग़ार पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में धड़ाम होने लगीं।दिल्ली मे उनकी ताजपोशी के बाद से अब तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत आधे से भी कम हो गई है । जून 2014 में दुनिया के बाजार में तेल के दाम करीब 107 डॉलर प्रति बैरल थे यानी 6324 रुपये में एक बैरल तेल था और अब दाम 50 डॉलर से भी कम प्रति बैरल हो गया। फरवरी महीने के लिए दुनिया के बाजार में तेल के दाम की बोली 45 से 47 डॉलर प्रति बैरल तक लगाई जा रही है।इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की किस्तम कहा जाये या फिर दुनियां मे तेल के बड़े खिलाड़ी अमेरिका का अपने दुश्मनों को नीचा दिखाने और उनकी माली हालत को कमजोर करने का शातिराना खेल ।चाहे जो हो लेकिन ओपेक देशों और ईरान के बीच इस गलाकाट प्रतियोगिता का फायदा भारत को पुरा हो रहा है । अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत के लिहाज से भारत में पेट्रोल की कीमत अब तक आधी हो जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं ।पेट्रोल की कीमतें प्रधानमंत्री से ये सवाल पूंछ रही हैं कि क्या आम आदमियों को सब्ज़ बाग दिखा कर सत्ता हासिल करने वाली सरकार ने तेल की कीमतें लगातार घटने के बावजूद लोगो को अच्छे दिन का तोहफा देने के बजाय अपना खजाना भरना शुरू कर दिया है ? दुनियां मे तेल के दामों मे बीते पांच साल मे आई आधे से ज़्यादा की गिरावट मे मुनाफा कमाने का उपाय खोजते देश के पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के सामने भी जनता का ये यक्ष प्रश्न खड़ा है कि आखिर पेट्रोल का सारा फायदा कहां जा रहा है ।सरकार ने भारी दबाव के बाद तेल की कीमतों मे कटौती तो कि लेकिन ये कटैती ना काफी मानी जा रही है ।केन्द्र सरकार ने अब तक चार बार मे पेट्रोल पर पौने आठ रूपये और डीजल पर साढ़े छह रूपये के आसपास उत्पाद शुल्क बढ़ाया है ।अगर ये बढ़ोत्तरी भी ना कि जाती तो भी जनता को बड़ी राहत मिल जाती ।लेकिन सरकार तो राजकोषीय संतुलन के फेर मे खजाने मे बजट तक 20 हजार करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाना चाहती है ।सरकारी खजाने मे ये रकम आम आदमी और किसानों का हक मार कर जा रही है ।
ऐसा लगता है कि गरीबों के नाम पर हमेशा टेसुए बहाने वाली यूपीए सरकार की तरह मोदी सरकार ने भी पेट्रोल को अमीरों का ईधन मान लिया है ।जबकि हकीकत यह है कि देश के साठ फीसदी से ज्यादा दुपहिया-तिपहिया वाहनों की बिक्री छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में होती है। महानगरों में निम्न मध्यवर्ग ही पेट्रोल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है।देश की तेल कम्पनियां और सरकार के दावे मे कितना दम है इसको कुछ इस तरह से समझा जा सकता है । भारत के 90 फीसदी तेल कारोबार पर सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है और सरकार की मानें तो ये कंपनियां जनता को सस्ता तेल बेचने के कारण भारी घाटे में हैं। दूसरी ओर, फॉच्र्यून पत्रिका कि एक पुरानी रपट के मुताबिक दुनिया की आला 500 कंपनियों में भारत की तीनों सरकारी तेल कंपनियां- इंडियन ऑयल (98), भारत पेट्रोलियम (271) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (335)- शामिल हैं। तेल और गैस उत्खनन से जुड़ी दूसरी सरकारी कंपनी ओएनजीसी भी फॉच्र्यून 500 में 360 वे पायदान पर है। आखिर यह कैसे संभव है कि सरकार घाटे का दावा कर रही है लेकिन तेल कंपनियां की बैलेंसशीट खासी दुरुस्त है। दरअसल भारत में रोजाना 34 लाख बैरल तेल की खपत होती है और इसमें से 27 लाख बैरल तेल आयात किया जाता है। आयात किए गए कच्चे तेल को साफ करने के लिए रिफाइनरी में भेज दिया जाता है। तेल विपणन कंपनियों के कच्चा तेल खरीदने के समय और रिफाइनरी से ग्राहकों को मिलने वाले तेल के बीच की अवधि में तेल की कीमतें ऊपर-नीचे
होती हैं। यहीं असली पेंच आता है । फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 50 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे है और अंडररिकवरी हमेशा मौजूदा कीमतों के आधार पर तय की जाती है।जानकारों का कहना है कि तेल कम्पनियां प्रति बैरल के पुराने भाव से अंडररिकवरी की गणना करके भारी-भरकम आंकड़ों से जनता को छलती है। तेल विपणन कंपनियों का कथित घाटा भी आंकड़ों की हेराफेरी है। सकल रिफाइनिंग मार्जिन (जीआरएम) इसका सबूत है। कच्चे व शोधित तेल की कीमत के बीच के फर्क को रिफाइनिंग मार्जिन कहा जाता है और भारत की तीनों सरकारी तेल विपणन कंपनियों का जीआरएम दुनिया में सबसे ज्यादा है।
दरअसल देश में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने तेल विपणन को खजाना भरने का जरिया बना लिया है। पेट्रोल पर तो करों का बोझ इतना है कि ग्राहक से इसकी दोगुनी कीमत वसूली जाती है। ताजा कटौती के बाद दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 58 रुपए 91 पैसे प्रति लीटर हो गयी है और जबकि तेल विपणन कंपनियों के सारे खर्चों को जोड़कर पेट्रोल की प्रति लीटर लागत 30 रुपए से भी कम ठहरती है। केंद्र सरकार पेट्रोलियम पर कस्टम के साथ – साथ छह तरह का अतिरिक्त कर वसूल करती है ।इसी तरह राज्य सरकारें भी वैट, सरचार्ज, सेस और प्रवेश शुल्क के मार्फत तेल में तड़का लगाती हैं। दिल्ली , राजस्थान , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ मे पेट्रोल पर 20 से 28.75 फीसदी के आसपास वैट है ।जबकि मध्य प्रदेश सरकार एक फीसदी प्रवेश शुल्क लेती है वहीं राजस्थान और उत्तर प्रदेश मे भी वैट के अलावा प्रति लीटर सेस लिया जाता है।इसी लिए देश के हर राज्यों मे कीमतें भी अलग – अलग हैं ।केन्द्र सरकार जहां एक लीटर पर 17.48 की कमाई कर रही है तो उत्तर प्रदेश, दिल्ली ,हरियाणा ,पंजाब , उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश 10 रूपये से लेकर 13.85 पैसे तक की कमाई कर रहें हैं ।जिन राज्यों मे कीमतें अधिक हैं उन राज्यों मे बिक्री पर भी असर पड़ता है । भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश हैं जहां सरकार की भ्रामक नीतियों के कारण विमान में इस्तेमाल होने वाला एयर टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ, पेट्रोल से सस्ता है। दिल्ली और नागपुर जैसे शहरों में तो एटीएफ, पेट्रोल से 3 से लेकर 15 रुपए तक सस्ता है। विमान के ईधन और पेट्रोल की कीमतों के बीच यह अंतर शुल्क की अलग-अलग दरों के कारण है।
सरकार सब्सिडी खत्म करने का भी तर्क देती है। सब्सिडी को अर्थशास्त्र गरीब मानव संसाधन में किया गया निवेश मानता है लेकिन देश की सरकारें इस सब्सिडी को रोककर तेल कंपनियों का खजाना भरना चाहती है।वित्तीय हालात को मजबूत बनाने में जुटी मोदी सरकार अब सरकारी कंपनियों के जरिए खजाना भरने की तैयारी कर रही है। यूपीए सरकार के कार्यकाल के अंतिम समय में जो कवायद तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने की थी, कुछ वैसी ही कवायद मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली कर रहे हैं।सरकार का कहना है कि शंल्क के जरिए वसूली गयी रकम को वह जनउपयोगी कार्यक्रमों पर खर्च करना चाहती है । इस पैसे से सरकार 15 हजार किलोमीटर की सड़क बनाना चाहती है। सरकार के मुताबिक ऐसा करने से रोजगार बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी ।पहली नजर मे सरकार का इरादा तो नेक दिखता है ।लंकिन हकीकत मे सड़क बनाने के नाम पर सरकार पहले से ही पेट्रोल के जरिए पैसे वसूल रही है। साल 2000 से हर लीटर पेट्रोल पर वसूला जाने वाला सेस (एक तरीके का टैक्स) सेंट्रल रोड फंड में जाता है । साल 2000 में वाजपेयी सरकार के दौरान ही सेंट्रल रोड फंड एक्ट अमल में आया था । इस कानून के प्रावधान के मुताबिक पेट्रोल की कीमत के साथ सेस वसूला जा सकता है । इस सेस के पैसे का इस्तेमाल नेशनल हाइवे, स्टेट हाइवे, रेलवे और देश भर की
सड़कें बनाने में किया जाता है ।
सवाल है कि जब पहले से पेट्रोल पर सेस लगाकर सड़कें बनाने के लिए पैसा वसूला जा रहा है तो फिर ये अतिरिक्त शुल्क वसूली क्यों? 2013-14 की कंन्द्र सरकार के परिवहन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1 नवंबर 2000 से लेकर 31 दिसंबर 2012 तक देश भर में 6859 विभिन्न कार्यो के लिए सेंट्रल रोड फंड से करीब 23780 करोड़ रुपए जारी किए गए।सरकार ने सेस के जरिए आज तक कितने पैसे उगाहे हैं इसका कोई ताजा और पुख्ता आंकड़ा मौजूद नहीं है । लेकिन पुराने आंकड़ों के मुताबिक सन 2000 से लेकर 2008 तक पेट्रोल और हाईस्पीड डीजल के सेस के जरिए 69268 करोड़ रुपए जमा किए थें। इस हिसाब से ही एक अनुमान तो लगाया जा सकता है ।विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार पेट्रोल ज्यादा सस्ता नहीं कर सकती , इसकी दो वजह समझ में आती है। एक आर्थिक और दूसरी राजनीतिक , मोदी सरकार ने देश से वादा किया है कि वो महंगाई कम कर देंगे। महंगाई कम करने करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमत कम करनी जरूरी है। लेकिन ये सरकार के हाथ में पूरी तरह से नहीं है। क्योंकि पेट्रोल-डीजल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत के आधार पर तय होती है।वैसे तो अभी भी तेल कंपनिया सरकार से सलाह मशविरा करके ही पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ाती या घटाती है।लेकिन सरकार को डर है कि अगर पेट्रोल सस्ता कर दिया गया तो लोगों को सस्ते पेट्रोल-डीजल की आदत लग सकती है ।ये जरूरी नही कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल हमेशा सस्ता ही रहेगा । ऐसे में कभी न कभी पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ेगी। अगर कीमत बढ़ाई तो जनता गुस्सा हो सकती है। मोदी सरकार को अब तक ये गुस्सा झेलना नहीं पड़ा है। लेकिन जनता का भरोसा नही ऐसी नौबत कभी भी आ सकती है। जनता अपना गुस्सा वोट के जरिए दिखा सकती है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल ज्यादा सस्ता न किया जाए तो ही बेहतर है। सरकारें अपना राजकोषीय संतुलन बनाने और वित्तीय घाटा कम करने के लिए पेट्रोलियम पर अतिरिक्त शुल्क का सहारा लेती है ।फिलहाल दुनियां के तेल बाजार के ताजा हालात मे मोदी सरकार को बिना मंहगाई बढ़ाए ये आमदनी हो रही है । इसके अलावा ये तर्क भी है कि अगर इस पैसे से सड़क बनेगी तो इसमें भी
तो देश की जनता की ही भलाई है । पेट्रोल-डीजल की कीमत कम करना ही जनता को फायदा पहुंचाने का एकमात्र तरीका नहीं है।
सरकार के सारे तर्क जायज हो सकतें हैं लेकिन ये भी सवाल खड़ा होता हे कि देश मे रेल किराया ,माल भाड़ा सरकारी परिवहन बसों का किराया तेल कीमतें घटने के बाद भी कम क्यों नही हुआ ।दूघ ,फल ,सब्जी और जिन्सों के दाम क्यों कम नही हुए ।जनता की अदालत मे यही सबसे बड़ा सवाल है कि अच्छे दिनों मे पेट्रोलियम के दम कम होने के बाद भी आंकड़ों के खेल से इतर बाजार मे मंहगाई की रफ्तार जस की तस क्यों हैं?आखिर इस की जवबदेही सरकारें किस पर डालेगी ।
** शाहिद नकवी **
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