यह स्पष्ट है कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में गांव की सत्ता और विकास के फैसलों में कुछ संपन्न एवं दबंग लोगों का ही वर्चस्व रहता आया है। पंचायतों में दलित, आदिवासी एवं महिलाओं के आरक्षण से वर्चस्व की यह डोर थोडी ढीली जरूर हुई, किन्तु पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई। इन दिनों हो रहे पंचायत चुनाव में यह साफ देखा जा रहा है कि महिलाएं अब अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अनारक्षित सीटों पर बराबरी से सामने आई हैं।
प्रदेष के मालवा, निमाड़, बुन्देलखण्ड और बघेलखण्ड में आज पंचायती चुनाव में महिलाओं बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। इस दौरान कई महिलाएं तो ऐसी पाई गई, जो अनारक्षित सीटों पर पुरूषो के मुकाबले चुनाव लड़ रही है। झाबुआ जिले की ग्राम पंचायत महूंडीपाड़ा की सरपंच रही राजूड़ीबाई पिछले पंचायत चुनाव में जहां घूघट से बाहर नहीं आ पा रही थीं, वही इस चुनाव में वह सरपंच की अनारक्षित सीट पर पांच पुरूषांें के मुकाबले खुद चुनाव प्रचार कर रही हैं। 9 गांवों वाली इस ग्राम पंचायत में वह सुबह से ही अपने समर्थकों के साथ निकल जाती है और गांव-गावं में सम्पर्क कर अपनी बात रखती हैं। खास बात यह है कि साथ चलने वाले उनमें समर्थकों में उनके पति, भाई या कोई परिवार के सदस्य नहीं है, बल्कि गांव के कुछ महिला-पुरूष है, जो मानते हैं कि राजू़ड़ीबाई में पंचायत का विकास करने की काबिलयत है।
मध्यप्रदेष के बघेलखण्ड क्षेत्र के रीवा जिले की ग्राम पंचायत छिरहटा की सरपंच रही गुडडीबाई भी इस बार अनारक्षित सीट पर अपना जोर आजमा रही है। उनके सामने खड़े पुरूष प्रत्याषियों ने पहले तो पुरूष सीट का भ्रम फैलाकर उनके नामांकन फार्म भरने में बाधा उत्पन्न करने कोषिष की, किन्तु उन्हें पक्का भरोसा था कोई भी सीट पुरूषों के लिए नहीं होती। कई धमकियां मिली और कहा गया कि पिछली बार तो महिला सीट थी, इसलिए हमने कुछ नहीं कहा, लेकिन इस बार चुनाव लड़ा तो ठीक नहीं होगा। लेकिन गुड्डीबाई के पास भी इसका जवाब था -‘‘चुनाव लड़ने का अधिकार मुझे भारत के संविधान से मिला, और मेरा यह अधिकार कोई नहीं छीन सकता। जिताना और हराना जनता के हाथ में है, लोग जो फैसला करेंगे वह मानूंगी, लेकिन चुनाव जरूर लडूंगी।’’ इस संकल्प के साथ गुडडीबाई आज चुनाव के मैदान में है। वह अपनी सभा में भाषण देती है, विरोधियों के सवालों का जवाब देती है और अपने सरपंचीय कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाती हैं।
कटनी जिले के ग्राम पंचायत लखाखेरा की तुलसीबाई अपनी पंचायत की अनारक्षित सीट पर मैदान में है। यह सीट पूरी तरह अनारक्षित है, यानी किसी भी जाति-समुदाय के कोई भी महिला-पुरूष प्रत्याषी चुनाव लड़ सकती हैं। ऐसी सीटांे पर आमतौर पर सामान्य वर्ग के पुरूष ही चुनाव लड़ते हैं। किन्तु इस सीट पर आदिवासी समुदाय की तुलसीबाई ने दावेदारी करते हुए सबको चैका दिया। इसी जिले की ग्राम पंचायत नन्हवारा कला की सरपंच रही कौषल्याबाई जनपद पंचायत सदस्य की अनारक्षित सीट पर चुनाव लड़ कर जमीनी राजनीति की अगली सीढ़ी पर कदम रख रही है। सरपंच के रूप में पिछले पांच सालों में समाज के दबंग लोगों से संघर्ष करती रही सतना जिले की मुन्नीबाई इस बार उन्हीं लोगों के सामने चुनाव मैदान में है। वह कहती है कि ‘‘चुनाव में मै नहीं, मेरा काम ही बोलता है।’’
अनारक्षित सीटों पर चुनाव मैदान में डटी महिलाओ की यह सूची यहीं खत्म नहीं होती। शहडोल जिले की ग्र्राम पंचायत कनाड़ीकला की सुषीलासिंह एवं धनियाबाई और ग्राम पंचायत झिरियाटोला की सुमंत्रा भी जमीनी राजनीति की दौड़ में पीछे नहीं है। सतना जिले की ग्राम पंचायत देवरा की रानीदेवी, हरदा जिले की ग्राम पंचायत छुरीखाल की उर्मिला धुर्वे, ग्राम पंचायत पड़वा की सुषीलाबाई, ग्राम पंचायत बाबडि़या की जयंति सोलंकी, छतरपुर जिले की ग्राम पंचायत बंधा चमरोई की शकुंतला और ग्राम पंचायत रंजिता की ललिता सहित कई महिलाएं चुनावी समर में शामिल है।
इस तरह मध्यप्रदेष में पंचायत चुनाव में सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया साफतौर पर दिखाई दे रही है। कई महिला प्रत्याषियों के बैनर पोस्टर में जहां उनके पति या परिवार के सदस्यों फोटो और नाम भी प्रमुखता से पाए जाते हैं, वहीं उपरोक्त महिला प्रत्याषियों के पोस्टर में उनके पुरूष रिष्तेदारांें का कोई स्थान नहीं है। यह महिलाएं अपने नाम, अपने काम और अपनी पहचान के बल पर चुनाव मैदान में है, जो सामाजिक-राजनैतिक बदलाव का खास संकेतक है। बहुत जल्द यह बदलाव मध्यप्रदेश से निकल कर देश के अन्य भागों के पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए मिसाल बन जायेगा।
राजेन्द्र बंधु
(चरखा फीचर्स)


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