आप विश्वास करे या न करें परंतु आज भी यदि यह कहा जाए कि राजस्थान के रेगिस्तान में दूध की नदियां बहती हैं तो गलत नहीं होगा। क्योंकि आज भी वहां के नागरिक अपने अतिथियों को पानी पिलाने से बेहतर समझते हैं कि उन्हें दूध या घी परोसा जाये। शायद यह उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि पानी जहां 20 रुपए लीटर मिलता है वहीं गाय का दूध आज भी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में दस या बारह रुपए में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। प्रकृति ने इस रेगिस्तान के हालात पर दया करते हुए यहां के निवासियों को राठी गाय और रेगिस्तान का जहाज कहा जाने वाला पशु ऊंट उपहारस्वरूप भेंट किया है, जो वहां की परिस्थितिनुसार आसानी से न केवल अपना जीवन गुजार लेते हैं बल्कि अपने मालिक के जीवकोपार्जन का भी माध्यम बनते हैं। दूध की बहुतायत को देखते हुए अमूल डेयरी गुजरात की तर्ज़ पर राजस्थान के बीकानेर में राज्य सरकार की ओर से 1972 में उर्मुल अर्थात उत्तर राजस्थान मिल्क यूनियन लिमिटेड का गठन किया गया।
उर्मुल की इस सफलता के पीछे उसके संस्थापकों में एक संजोय घोष का बहुत बड़ा योगदान रहा है। चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क के संस्थापक स्वर्गीय संजोय घोष 1984 में राजस्थान के बीकानेर आये। यहाँ उन्होंने अमूल की तर्ज़ पर 1985 में उर्मुल ग्रामीण स्वास्थ्य ट्रस्ट (उर्मुल रूरल हेल्थ ट्रस्ट) की स्थापना की। इसके बाद वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए। वर्ष 1986 में वापस आने के बाद फिर से उर्मुल ट्रस्ट से जुड़ गए। ट्रस्ट को चलाने के लिए प्रति किसान तीन पैसे लिए जाते थे जबकि पांच फीसद उर्मुल डेयरी दिया करती थी। लेकिन किसानों और ट्रस्ट के सदस्यों के बीच संवादहीनता और कुछ कारणों के बाद वर्ष 1987 में यह फैसला किया गया कि अब किसानों से कोई पैसा नहीं लिया जायेगा और ट्रस्ट को डेयरी से अलग कर दिया जायेगा तथा उसका संचालन आम लोगों से लिए गए चंदे से किया जायेगा। कुल मिलाकर तीन साल में उर्मुल डेयरी से 18 लाख रुपए लिए गए। इसी दौरान 1987-88 में राजस्थान में जबरदस्त अकाल पड़ा जिसमे उर्मुल ने जनसेवा में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। अकाल की त्रासदी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेगिस्तान का जहाजकहे जाने वाला ऊंट भी तड़प-तड़प कर मरने लगे। इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए ऊंटों का एक कैंप लगाया गया जहाँ उनका सभी प्रकार से ख्याल रखा गया। यह व्यवस्था उस समय के आयुक्त अनिल भाटिया को बहुत पसंद आई और उन्होंने बॉडर एरिया डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत बीकानेर से 100 किलोमीटर दूर बज्जू में 25 बीघा जमीन उपलब्ध कराकर उसपर निर्माण कार्य के लिए बजट मंगवाया। जिसके लिए पीडब्लूडी के एक इंजीनियर ने नक्षा तैयार करके उसकी लागत एक करोड़ रखा। लेकिन उर्मुल सीमांत के मौजूदा चेयरमैन अरविन्द ओझा ने मात्र पचास लाख रुपए में ही इसके निर्माण का प्रस्ताव दिया। परन्तु इस कैंपस (जिसका नाम उर्मुल सीमांत है) का निर्माण मात्र 35 लाख में ही हो गया था बाकी के रूपयों दूसरे कामों में लगा दिया गया। इस सुन्दर कैंपस में कार्यालय के अतिरिक्त मीटिंग हॉउस, प्रशिक्षण केंद्र, सिलाई सेंटर, कंप्यूटर सेंटर, व्यापार केंद्र, अतिथिगृह और स्टाफ क्वार्टर के साथ साथ एक बड़े मैदान में सब्जी लगाकर रेगिस्तान में खेती के नए नए प्रयोग किये जा रहे हैं।
स्वर्गीय संजोय घोष के द्वारा 1985 में स्थापित उर्मुल ट्रस्ट के बैनर तले राजस्थान के भौगोलिक परिस्थिति और जनमुद्दों के निवारण हेतु कई संगठन स्थापित हुए। इन्हीं में से एक उर्मुल सीमांत भी है। इसके अधिकतर कार्य सरकारी योजनाओं को उन्नत बनाने वाले हैं। इसके वर्तमान संरक्षक और चरखा संस्थापक संजोय घोष के परम मित्र अरविंद ओझा के अनुसार पहली बार अगस्त 1991 में 25 आंगनवाड़ी सेंटर की जिम्मेदारी मिली जिसको हमने बहुत अच्छी तरह से निभाया। वह एक घटना की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि इस क्षेत्र में किसान चार माह के लिए आबादी से दूर अपने खेतों में चले जाते हैं जिसे धात्री कहते हैं। जब मैंने अपनी रिपोर्ट सरकार के समक्ष प्रस्तुत की तो चार माह का पैसा भी वापस कर दिया। जिसको देखकर हमसे प्रश्न किये गए कि आपने यह पैसा क्यों नहीं खर्च किया? मैंने जवाब दिया की इन चार महीनों में बच्चे आबादी में नहीं होते हैं और जहाँ होते हैं वहां आंगनबाड़ी सेंटर नहीं हैं। अधिकारियों ने कहा कि दूसरे आंगनबाड़ी सेंटरों की रिपोर्टों में इन चार माह में भी पैसे खर्च दिखाए जाते हैं, ऐसे में आप की रिपोर्ट का क्या अर्थ हुआ? मैंने जवाब दिया कि आप स्वयं तहकीकात करा लीजिये। जांच में मेरी बात सच साबित हुई। जिसके बाद स्थानीय प्रशासन की ओर से हमारे संगठन को 190 आगनबाड़ी सेंटरों का जिम्मा दिया गया।यह संगठन सरकारी स्कूलों में स्वच्छता के अतिरिक्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और प्रशिक्षण पर भी कार्य कर रही है। इसके लिए अन्य गैर सरकारी और सरकारी संगठनों की सहायता से क्षेत्र के तकरीबन सभी स्कूलों में पुस्तकालय की न सिर्फ स्थापना की गई बल्कि इसके बेहतर संचालन के लिए इससे छात्रों और स्थानीय लोगों को भी जोड़ा गया है। मुझे आश्चर्य तब हुआ जब पता चला कि इन सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का रिपोर्ट कार्ड छात्र तैयार करते हैं।
यह संगठन कस्तूरबा गांधी स्कूलों में बेहतर शिक्षा मुहैया करवाने के अतिरिक्त अध्यापकों के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था करती है। जिसके लिए इस संगठन को न केवल कई पुरूस्कार प्रदान किये गए हैं बल्कि हमारे इस मॉडल को देश के अन्य भागों में भी लागू करने की योजना बनाई जा रही है। यहां का स्टाफ देश के अन्य राज्यों में जाकर न केवल लोगों को इसकी जानकारी दे रहे हैं बल्कि प्रशिक्षण भी प्रदान कर रहे हैं। यही कारण है कि न केवल देश भर के कई कॉलेजों और स्कूलों के छात्र छात्राएं ही नहीं बल्कि आईएएस और आईपीएस भी इस मॉडल को देखने आते हैं। वर्तमान में यह संगठन बालिका शिक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है। इस लिए केवल छह माह में दसवीं और बारहवीं तक की शिक्षा ब्रिज कोर्स के माध्यम से पूर्ण की जा रही है जो एक सराहनीय कदम है।
उर्मुल ट्रस्ट लोगों को आवश्यकता और योग्यतानुसार रोजगार उपलब्ध करवाने में भी मील का पत्थर साबित हुई है। इस क्षेत्र में बुनकर समुदाय के बहुत से ऐसे लोग थे जो भूखे मर रहे थे। उर्मुल ट्रस्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समुदाय के लोगों और उनकी कला को जीवित रखना था। इसलिए उर्मुल ट्रस्ट ने इस समुदाय को न केवल काम दिलाया बल्कि मार्केटिंग के हुनर से भी परिचित कराया। आज उनकी कला न केवल भारत बल्कि दक्षिण अफ्रीका समेत दुनिया भर में फलफूल रही है.
पकिस्तान के सिंध की प्रसिध्द कषीदाकारी राजस्थान में 1971 में आने वाले विस्थापितों के कारण बर्बाद हो रही थी। क्योंकि इन विस्थापितों को पहले बाड़मेर और फिर दस वर्श के बाद बीकानेर के रेगिस्तान में बसाया गया जहां इन लोगों के पास जीविकोपार्जन का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। ऐसे में कषीदाकारी के काम माहिर इन लोगों की आर्थिक स्थिति खराब होने के साथ-साथ इनके हाथों को भी जंग लगने लगा था। इस स्थिति में उर्मुल सीमांत ने इनकी कला को फिर से जिदा करने और इन्हें रोजगार से जोड़ने का जिम्मा उठाया। संगठन ने बुनकरों के बनाये कपड़ों में न केवल कशीदाकारी करवाकर उन्हें और भी आकर्षक बना दिया बल्कि उनके कपड़ों की मार्केटिंग के लिए इन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों से भी सम्बद्ध करवा दिया। इन्हीं में फेब इंडिया और रंगसूत्र भी सम्मिलित है।
संगठन के जरिए अकुशल किसानों को बकरी और गाय पालन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाकर उनकी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का कार्य प्रषंसनीय है। रेगिस्तान की विषम परिस्थिति में भी जीने वाली ‘‘राठी गाय’’ की नस्ल को बचाने और उसकी नस्ल सुधार के कार्य में भी यह संगठन एक अहम भूमिका निभा रहा है। यह संगठन किसानों में जागरूकता बढ़ाने के लिए मशीनों के माध्यम से दूध की गुणवत्ता पहचानने और उसका उचित कीमत लगाने का प्रशिक्षण भी देती है। इसी प्रकार न केवल बकरी पालन बल्कि उसके खरीदारी और बिक्री करने का भी तरीका सिखाती है। इसके अतिरिक्त उन्हें वजन करने वाली मशीने देकर यह बताती है कि यदि बीस किलो का बकरा है तो आधा यानि दस किलोग्राम मांस की कीमत लेकर उसे बेचें। रेगिस्तान के किसानों की मदद करने के लिए ‘‘किसान क्लब’’ बनाकर उनकी फसलों को उन्नत बनाने, कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने, सिंचाई का बेहतर प्रयोग बताने, बीज और खाद देने के अतिरिक्त कर्ज दिलाने का कार्य भी बखूबी कर रही है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि विकास का जो स्वप्न चरखा संस्थापक ने रेगिस्तान में देखा था आज वह न केवल साकार हो रहा है बल्कि देश के अन्य भागों में रहने वालों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन रहा है।
मो. अनीसुर्रहमान खान
(चरखा फीचर्स)



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