श्रधांजलि : अब भी जिंदा है लक्ष्‍मण का आमआदमी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 28 जनवरी 2015

श्रधांजलि : अब भी जिंदा है लक्ष्‍मण का आमआदमी

r k laxman
एक अंग्रेज़ी अखबार के पन्ने पर हर दिन हिन्दी का आम आदमी बन कर आने वाले आर के लक्ष्‍मण अब नही रहे । पुणे के एक अस्पताल मे उन्‍होने अपने आम आदमी को हमेशा के लिए अलविदा कहा ।मशहूर कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण  94 साल के हो गये थे । लेकिन उनकी कूची आम आदमी की पीड़ा पिछली अर्द्ध शती से व्यंग्य के रूप मे बयान कर रही थी ।आज हम सत्‍ता को सत्‍ता के नजदीक जाकर देखने के आदी हो चुके हैं ।लेकिन लक्ष्‍मण का आम आदमी सत्ता को बाहर से सामान्य और तटस्थ भाव से देखता था । उनका आम आदमी शासन सत्‍ता और कुर्सी से दूरी बना कर र्निणायक भूमिका अदा करने वाला था ।लक्ष्‍मण की कूची मे दिखने वाला आम आदमी सत्‍ता मे झांक कर और छुप कर देखने वाला था ।वह ये बताता था कि जनता ने सब देख और जान लिया है बस जनता के लिए और जनता के नाम पर शासन चलाने वालों को इस की खबर नही है ।

सत्‍ता मे तांक-  झांक करने और सरकार पर नजर रखने की आमआदमी को हिम्‍मत आरके लक्ष्‍मण ने ही दी थी । वह हर दिन सत्तानशीनों को याद दिलाते थे कि आप ने जो वादा किया हे उसको पूरा करने की मियाद घट रही है ।उनके कार्टून खामोश आवाज जरूर थे लेकिन उनकी आवाज  इतनी तेज होती थी कि वह नेताओं और शासन सत्‍ता को सीघे सुनाया पड़ती थी ।आम आदमी की अगर किसी ने  सही मायने मे खिदमत की तो वह सिर्फ लक्ष्‍मण थे ।आपके कार्टून भारतीय लोकतंत्र के लिए हमेशा मील के पत्थर की तरह रहेगे ।
                            
पांच दशकों से अधिक समय से लक्ष्मण ने अपने कार्टून के किरदार 'कॉमन मैन' के जरिए समाज के तमाम पहलुओं को उकेरा था। राजनीतिक मसलों पर उनके बनाए कार्टून बहुत मशहूर हुए थे। हालांकि बाद में उन्होंने राजनीतिक मसलों पर कार्टून बनाना बंद कर दिया था। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।वैसे तो वह 'साल 2010 में लकवे की चपेट में आ गए थे। लकवे से उनके शरीर का दायां हिस्सा प्रभावित हुआ था और उन्हें बोलने में दिक्कत भी होती थी।लेकिन उनकी कूची इस पर भी नही रूकी और उन्होंने कार्टून बनाना जारी रख था। इसमें उनका अजीज किरदार आम आदमी भी शामिल होता था। अपने कार्टूनों के जरिए आर.के लक्ष्मण ने एक आम आदमी को एक खास जगह दी।हमेशा हाशिये पर पड़े रहने वाले आम आदमी के जीवन की 
मायूसी,उसके जीवन मे आने वाल अंधेरे वा उजाले, खुशी और गम को चित्रों के सहारे दुनिया के सामने रखा।जो किसी लिखी इबारत से भी बड़ा संदेश देते थे ।इसी लिए उनके कार्टूनों की दुनिया काफी व्यापक है। इसमें समाज का चेहरा तो दिखता ही है, साथ ही भारतीय राजनीति में होने वाले विभिन्‍न बदलाव भी दिखाई देते हैं ।असल मे भ्रष्टाचार, अपराध, अशिक्षा, राजनीतिक दलों के पैंतरों से जो तस्वीर निकल कर आती है वो है आर. के लक्ष्मण का आम आदमी की ।

देश के समाज मे अक्‍सर देखा जाता है कि आम आदमी सिर्फ जिंदगी की दुश्‍वारियों से लड़ता है, उसे चुपचाप अकेले झेलता है ,पर बोलता नहीं, यही वजह है कि आर के लक्ष्मण का आम आदमी ताउम्र खामोश रहा । आर के लक्ष्मण का आम आदमी शूरूआत मे किसी भी इलाके का होता था ।लेकिन जल्‍दी ही उसकी अपनी एक खास पहचान बन गयी । इसमें खानेदार शर्ट और धोती पहने एक व्यक्ति को आम आदमी की समस्याओं को लेकर व्यंग करते वह दिखाते थे । उनके कार्टूनों की एक बड़ी खासियत ये भी है कि उन्होंने हर उस शख्स को अपने कार्टून में जगह दी जो उनके कार्टून की योजना मे फिट बैठता था ।उन्‍होने इस बात से कभी समझौता नही किया कि व्यक्ति का कद 

क्‍या है और पद क्‍या है ।देश की बड़ी – बड़ी हस्‍तियों का उन पर कभी प्रभाव नही पड़ा ।ऐसी मिसाल मिलना बहुत मुश्‍किल है जब उनकी चित्र कृति पर किसी नेता या हस्‍ती ने सवाल उठाया हो । चुनावों के मौसम में और उसके बाद राजनेताओं का चरित्र कैसे तरह बदलता है, लक्ष्मण की कलम ने समय समय पर इसे भी कार्टून में बखूबी दिखाया है ।उनका आमआदमी केवल हिन्‍दुस्‍तान मे ही नही दुनियां के कई मुल्‍कों मे पहचाना जाता था ।कई देशों मे तो लक्ष्मण का आम आदमी खास बन गया था ।इसी लिए वह सन 1985 में ऐसे पहले भारतीय कार्टूनिस्ट बन गए जिनके कार्टून की लंदन में एकल प्रदर्शनी लगाई गई । लक्ष्मण के कार्टून इतने बेजोड़ हुए कि आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी कृतियां किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं ।

इनका पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण था और 23 अक्टूबर 1921 को मैसूर में लक्ष्मण का जन्म हुआ था । समाज की विकृतियों, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा के विषमताओं पर भी वे तीख़े ब्रश चलाते थे। लक्ष्मण सबसे ज़यादा अपने कॉमिक स्ट्रिप "द कॉमन मैन" जो उन्होंने द टाईम्स ऑफ़ इंडिया में लिखा था, के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।मैसूर में जन्मे लक्ष्मण के पिता एक स्कूल के संचालक थे और लक्ष्मण उनके छः पुत्रो में सबसे छोटे थे।उनके बड़े भाई आर. के. नारायण एक प्रसिद्ध उपन्यासकार रहे हैं और इस समय केरल के.एम.जे. विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर हैं ।बचपन से ही लक्ष्मण को चित्रकला में बहुत रूचि थी ।वह बचपन में फर्श, दरवाज़ा, दीवार, आदि में चित्र बनाते थे ।लड़कपन में ही एक बार उन्हें अपने अध्यापक से पीपल के पत्ते के चित्र बनाने के लिए शाबाशी मिली थी ।इसी घटना से उनके अन्दर एक चित्रकार बनने की इच्छा ने जन्म लिया । वे ब्रिटन के मशहूर कार्टूनिस्ट सर डेविड लौ से बहुत प्रभावित थे। लक्ष्मण अपने स्थानीय क्रिकेट टीम "रफ एंड टफ एंड जॉली" के कप्तान भी रहे थे ।लक्ष्मण के बचपन में ही उनके पिता पक्षाघात के शिकार हो गए थे और उसके एक साल बाद उनका देहांत हो गया । बचपन का सुख छिन जाने के बावजूद लक्ष्मण ने अपनी स्कूली शिक्षा को जारी रखा। हाई स्कूल के बाद, लक्ष्मण ने आर्ट, ड्राइंग और पेंटिंग की कला सीखने पर ध्यान केंद्रित करने की उम्मीद करते हुए मुंबई के जे.जे. स्कूल के लिए आवेदन किया । लेकिन कॉलेज के डीन ने यह कहते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया कि उनके चित्रों में वह बात नहीं, जिससे वह उन्हें अपने कॉलेज में दाखिला दे सके ।इसके बाद भी लक्ष्मण ने हिम्मत नहीं हारी और मैसूर विश्वविद्यालय में  दाखिला लेकर बी.ए. उतीर्ण किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी स्वतंत्र कलात्मक गतिविधियों को भी जारी रखा और स्वराज्य पत्रिका एवं एक एनिमेटेड चित्र के लिए अपने कार्टूनों का योगदान दिया ।
                
देश के एक बड़े अखबार के लिए उन्‍होने 50 से ज्यादा वर्षों तक काम किया। राजनीतिक मामलों पर बनाए गए उनके कार्टून बहुत मशहूर हुए। उन्होंने कई नॉवेल लिखने के अलावा एशियन पेंट्स ग्रुप के लिए एक ऐंबलम भी बनाया था। उनके कार्टूनों को मिस्टर ऐंड मिसेज 55 नाम के हिंदी सीरियल में दिखाया गया था। उनकी रचनाओं में वे कार्टून भी थे जो उनके नॉवेल मालगुड़ी डेज में शामिल किए गए थे । दूरदर्शन पर एक टीवी सीरियल भी मालगुड़ी डेज के नाम से प्रसारित हुआ। सब टीवी पर भी आर के लक्ष्मण की दुनिया सीरियल ने भी काफी शोहरत हासिल की थी । लक्ष्मण ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के 'गरीबी हटाओं' कार्यक्रम पर एक कार्टून बनाया था जिनसे उनको बहुत ख्याति मिली थी और इससे उनकी गहरी सोच का भी पता चलता है। उनकी निजी जिंदगी भी काफी दिलचस्‍प थी ।फिल्म कलाकार और पहली पत्नी कुमारी कमला से तलाक होने के बाद लक्ष्मण ने एक लेखिका से दूसरी शादी की, जिनका नाम भी कमला ही था। मैगजीन फिल्मफेयर के एक कॉलम में उन्होंने अपनी पत्नी का कार्टून बनाया था, जिसका टाइटल था- द स्टार ओनली आई हैव मेट। उनके कटाक्ष भरे कार्टूनों के लिए भारत सरकार ने साल 2005 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। इसके अलावा कॉमन मैन पर 1988 में एक टिकट भी जारी किया गया था। पुणे में साल 2001 में कॉमन मैन कार्टून की 8 फुट की एक प्रतिमा भी लगाई गई है।ताउम्र लक्ष्मण की वफ़ादारी और ज़िम्मेदारी सिर्फ वो आम आदमी ही रहा जो उनके जीवन आदर्श था ।उन्‍हें आम आदमी की पीड़ा को अपनी कूची से गढ़ने वाला शिल्‍पकार भी कहा जा सकता है ।लोगों ने नम आंखों से उस व्यक्ति को श्रद्धांजलि अर्पित की जिसके ब्रश के जादू से सभी के चेहरों पर मुस्कान आ
जाती थी। उन्होंने अपने कार्टून के माध्यम से जो कहा, वह भावी सरकारों को प्रेरित करेगा. वह नहीं रहे, लेकिन उनके द्वारा बनाया गया ‘द कॉमन मैन’ हमेशा जिंदा रहेगा ।
                         





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 ** शाहिद नकवी **

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