आलेख : जरूरतमंदों का हक मारने वालों के विरुध्द खडे होने का वक्त - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 19 जनवरी 2015

आलेख : जरूरतमंदों का हक मारने वालों के विरुध्द खडे होने का वक्त

रघुवरपुर के एक प्रतिभावान युवक को उसकी क्षमताओं के आधार पर महाराज ने उसे राजधानी बुलाकर राज-काज में लगा दिया। सदावर्त बांटने का काम सौंपा गया। युवक ने अपने काम को पूरी लगन, मेहनत और ईमानदारी से करना शुरू किया परन्तु अपने घर-गांव के मोह से बाहर नहीं हो पाया। अपने पडोस में रहने वाले गैर जरूरतमंदों की झोली में गरीबों का हिस्सा देने के कारण उसी शिकायतें होने लगी। शुरू में तो महाराज के विश्वास नहीं हुआ कि उस जैसा प्रतिभावान युवक ऐसा कर सकता है, परन्तु जब शिकायतों का अम्बार लगा, तो सच्चाई जानने के लिए महाराज स्वयं भेष बदलकर सदावर्त की लाइन में लग लगये। उसी लाइन में रघुवरपुर के कई रईसजादे भी लगे थे। युवक ने रईसजादों को देखा। दौनों की नजरें मिली। मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हुआ। युवक ने अपने गांव के सम्पन्न रईसजादों की झोली में बहुमूल्य वस्तुएं डाल दीं। भेष बदले महाराज की बारी आने पर युवक ने उसे सामान्यजन की तरह थोडा राशन देकर विदा करना चाहा तो महाराज ने कुछ और देने की मांग की। युवक ने मना करते हुए अगले दिन फिर से आने की बात कही। तब महाराज ने अपना वास्तविक परिचाय दिया और युवक से रघुवरपुर के रईसजादों को बहुमूल्य वस्तुयें देने का कारण पूछा। युवक को सिर झुकाकर अपने घर-गांव के मोह में जकडने का अपराध स्वीकार करना पडा।      

यह पूरा दृष्टांत महाराज छत्रसाल की नगरी के प्रभारी मंत्री नरोत्तम मिश्रा के वर्तमान क्रिया-कलापों पर एक दम सटीक बैठते हैं। अपने घर-गांव में मेडिकल कालेज की घोषणा और स्थापित करवाने के प्रयासों रईसजादों को दी गई बहुमूल्य वस्तुओं जैसा ही है। दतिया से अट्ठाइस किलोमीटर दूर झांसी और चौसठ किलोमीटर दूर ग्वालियर में पहले से ही मेडिकल कालेज स्थापित हैं। दतिया में रावतपुरा सरकार द्वारा मेडिकल कालेज की स्थापना करने का क्रम चल रहा है। ऐसे में छतरपुर के बहुप्रतीक्षित मेडिकल कालेज को अदृष्टिगत करते हुए दतिया में की जाने वाली घोषणा करना, न केवल अप्रसांगिक है बल्कि जरूरतमंदों का हक मारने जैसा है। पन्ना, टीकमगढ के अलावा उत्तर प्रदेश के महोबा, बांदा जिलों के केन्द्र में स्थापित छतरपुर में मेडिकल कालेज की स्थापना से जहां ‘सब को स्वास्थ्य’ की परिकल्पना को साकार करने में सहायता मिलेगी, वहीं बुंदेलखण्ड के इस उपेक्षित भू-भाग में स्वास्थ्य सेवायें बेहतर होने से चिकित्सा के अभाव में होने वाली मौतों पर अंकुश लग सकेगा। जरूरत है तो सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों तक वास्तविकता पहुंचाने की। वरना नक्कारखाने में कुम्भकरणी नींद में सोने वालों को तूती आवाज सुनाई ही नहीं देगी। आम आवाम के हितों पर पहरेदारी करने वाले नुमाइन्दों को घेरकर उन्हें उन्हीं की वह तस्वीर दिखाना होगी, जिसे वह किन्ही कारणों से देखने से कतरा रहे हैं।

माना कि विधायकों से लेकर अन्य चयनित जनप्रतिनिधियों तक पर अपनी ही पार्टी के बडे कदधारियों की जायज-नाजायज बातों को सिरोधार्य करने की बाध्यता रहती है, परन्तु मतदाताओं के अमूल्य मत का सम्मान न करना भी तो एक अक्षम्य अपराध होता है जिस पर व्यक्ति तो क्या सरकारें तक चली जातीं हैं। यह अलग बात है कि देश में अभी राइट टू रि-काल का अधिकार आम आवाम को नहीं दिया गया है अन्यथा क्षेत्र की जनता के लिये उत्तरदायी प्रतिनिधि उनकी आधारभूत मांगों को अनदेखा नहीं कर सकते। ऐसे में घेराव से लेकर धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन, रैलियों के माध्यम से भोपाल दरवार में बैठे सत्ताधारियों के सिंहासन को हिलाने के प्रयास तो किये ही जा सकते हैं। छोटे-छोटे प्रयासों से ही बडे-बडे कार्यों को मूर्त रूप देना सम्भव होता है। सत्ता, पार्टी और संगठनों से जुडे स्थानीय लोगों में भले ही असुरक्षा की भावना के कारण आवाज बुलंद करने का साहस सो गया हो परन्तु सच्ची समाज सेवा और जागरूकता को अंगीकार करने वालों की भी कमी नहीं है जो अपने तन, मन और धन की कीमत पर जन्म भूमि का श्रंगार करने से सामर्थ रखते हैं। तो आइये हम सब मिलकर छतरपुर में बहुप्रतीक्षित मेडिकल कालेज की स्थापना के लिये एक जुट होकर प्रयास करें।






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---रवीन्द्र अरजरिया---

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