देश के जाने.माने बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यर्कताों ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए लाये गये अध्यादेश को वापस लेने की मांग की है। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यर्कता अरूणा राय. न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर. नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेघा पाटकर. राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मोहिनी गिरि. पूर्व केन्द्रीय विधि मंत्री शांति भूषण. फिल्म निर्देशक आनंद पटवद्र्धन. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जयंती घोष. जाने माने पत्रकार प्रफुल्ल किदवई. हर्ष माथुर. वंदना शिवा समेत कई बुद्धिजीवियों ने श्री मुखर्जी को कल लिखे पत्र में यह मांग की है। उन्होंने अपने पत्र की प्रतियां उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भी भेजी है। पत्र में कहा गया है कि विभिन्न जनआंदोलनों के कार्यर्कताों तथा राजनीतिक कार्यर्कताों से विचार. विर्मश के बाद भूमि अधिग्रहण कानून 2013 पारित हुआ था और उसमें किसानों के अधिकारों की रक्षा की गयी थी एवं जबर्दस्ती भूमि अधिग्रहण को रोका गया था। इस कानून में किसानों तथा ग्रामीणों की सहमति का ख्याल रखा गया था लेकिन अध्यादेश लाकर उन कानून की जनपक्षधरता को खत्म किया गया और भूमि अधिग्रहण करते समय लोगों की सहमति एवं सामाजिक आकलन के प्रावधान को खत्म कर दिया गया।
पत्र में कहा गया है कि इस अध्यादेश के जरिए किसानों की जमीन जबर्दस्ती छीन ली जायेगी और उनकी रोजी रोटी तथा आजीविका का जरिया खत्म हो जायेगा तथा निजी परियोजनाों एवं पीपी माडल को बढ़ावा दिया जायेगा। पत्र में यह भी कहा गया है कि जब उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा है कि अध्यादेश तब लाया जाये जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और कोई आपात स्थिति पैदा हो जाये पर भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र में विधेयक न लाकर सत्र समाप्त होते ही अध्यादेश लाना उचित नहीं है। हमने अखबारों में भी पढ़ा कि आपने हस्ताक्षर करते हुए भी अध्यादेश की तत्काल आवश्यकता के बारे में सरकार से पूछताछ की थी। पत्र में कहा गया है कि आप संविधान के रक्षक है. इस नाते इस अध्यादेश पर पुनर्विचार कर इसे तत्काल खारिज करें एवं संसद के बजट सत्र में सरकार को इसके स्थान पर विधेयक लाने की सलाह दें।

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