महीने भर की राजनितिक उठापटक के बाद आखिरकार जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। कोई भी राजनितिक दल राज्य की जनता को स्थिर सरकार देने लायक आंकड़ा जुटा नहीं पाया। हालांकि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही यह साफ हो गया कि जम्मू कश्मीर की जनता ने किसी एक दल पर विश्वास नहीं किया है और त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर तैयार हुई है। विपक्षी पीडीपी को जहाँ घाटी में सीटें मिली हैं वहीं मिशन 44़ का लक्ष्य लेकर चुनाव में उतरी भाजपा को जम्मू में जनता का विश्वास प्राप्त हुआ है। 19 जनवरी को मौजूदा सरकार का कार्यकाल समाप्त हो रहा है लेकिन अलग अलग विचारधारा का समर्थन करने वाले राजनितिक दल जनता के हित में एक मंच पर आने और गठबंधन की सरकार बनाने को राज़ी नहीं हैं। चुनाव परिणाम से एक बात तो साफ हो गया था कि राज्य की जनता मौजूदा सरकार के कामकाज से नाखुश है और उसे नकार दिया है। देखा जाये तो इस बार के विधानसभा चुनाव में जम्मू कश्मीर की जनता ने शोषणकारी राजनितिक नीति से खुद को आजाद करने की ठान ली थी। पाठकों को याद होगा बीते असेंबली कार्यकाल में ऐसे कई अवसर आये जब जनहित फैसले टेबिलों, कुर्सियों और घूसों के बीच लिए गए। जहाँ विधानसभा के कामकाज को बाधित करना एक ट्रैंड बन गया था।
बहरहाल राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद अब राज्य का कामकाज परोक्ष रूप से केंद्र के अधीन आ गया है। केंद्र की मोदी सरकार द्वारा स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठाये गए सकारात्मक कदमों से न केवल जम्मू कश्मीर की जनता सीधे लाभान्वित होगी बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों की जिंदगी को बेहतर बनाने में मील का पत्थर साबित होगा। सलाना बजट में इसका खास ख्याल रखते हुए विभिन्न योजनाओं के तहत करोड़ों रूपये खर्च करने का प्रावधान किया गया है। उदाहरण के तौर पर इन क्षेत्रों में स्कूल, सड़कें और अस्पतालों का जाल बिछाने की बात की जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देने और योजनाएं तैयार करने के हुक्मनामे जारी किए जा रहे हैं। मगर जमीनी सच्चाई को देखकर ऐसा मालूम होता है कि यह योजनाएं सिर्फ नाम के लिए हैं और कागज़ों तक सिमटी हुई हैं। चंद जगहों पर इन योजनाओं के तहत काम अवश्य होते हैं, मगर अब तक सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों को इसका समुचित फायदा होता नज़र नहीं आ रहा है। जिसकी ताजा मिसाल पुंछ जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर गांव कोसल्लियां जोकि हिंद-पाक की सरहद पर है। इस गांव की आबादी दो हजार से अधिक है। इस गांव के लोगों की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय है और अधिकतर ग्रामीण दैनिक मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते है। विकास की लौ से काफी हद तक पिछड़े हैं। साइंस और टैक्नोलाजी के इस आधुनिक युग में जहां घर बैठे लोग इंटरनेट के माध्यम से शिक्षा, व्यापार और विकास के लिए दुनिया के कोने कोने से संपर्क बनाए हुए हैं, ऐसी परिस्थितियों में भारत-पाक के व्यापारिक केंद्र से तकरीबन पांच किलोमीटर पर स्थित यह सरहदी इलाका अनदेखी का षिकार बना हुआ है। आज भी यह क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। यहाँ मोबाइल की बात कौन करे, साधारण फोन की सुविधा भी आज तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। ऐसे में इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि इस इलाके के वह बच्चे जो रोजी रोटी कमाने परदेस गए हुए हैं उनकी खबर-खैरियत किस तरह उनके परिवार वालों को मिल पाती होगी।
यहां बात केवल खस्ताहाल संचार व्यवस्था की नहीं है बल्कि यहाँ की सड़कों की हालत भी बदतर है। बरसों से टूटी फूटी सड़कें होने के कारण समय पर इस इलाके में कोई सवारी-गाड़ी भी उपलब्ध नहीं हो पाती है। यहां यह भी बताना दिलचस्पी से खाली नहीं होगा कि यह गांव जिला मुख्यालय से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद आपातकाल स्थिति में यहाँ आवागमन का कोई सिलसिला नहीं है। ऐसे में बीमारी की हालत में समय पर गाड़ी न मिलने वाले व्यक्ति को काफी परेषानी का सामना करना पड़ता है। बुनियादी सुविधाओं से वंचित इस गांव की खस्ताहाली का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ प्राथमिक स्वास्थ केंद्र की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। हालांकि हाथी के दिखावे वाले दांत के रूप में सब सेंटर अवश्य स्थापित है लेकिन उसकी बदहाली की कहानी भी सुनते जाइये। सब सेंटर में पदस्थापित डॉक्टर अल्ताफ जो यहाँ के निवासी भी हैं, बताते हैं कि इस सेंटर में वर्ष में एक बार दवाईयां आती हैं। जो तीन माह में ही खत्म हो जाती हैं। इसके बाद यह सेंटर किसी को प्राथमिक चिकित्सा भी उपलब्ध कराने में नाकाम रहता है। यदि किसी को मामुली खरोच भी आ जाए तो उसे फस्र्ट एड भी नहीं मिल सकता है। गांव के रहने वाले एक षख्स षब्बीर अहमद 40 यहाँ की बदहाली की दास्तान बयान करते हुए कहते हैं कि गांव कोसल्लियां में हमें आज तक मोबाइल सर्विस सेे महरूम रखा गया है।
स्वास्थ सुविधा के नाम पर एक सब सेंटर है जिसका खुलने का कोई निश्चित समय नहीं है। गांव के ही आजाद षाह कहते हैं कि यहाँ का सब सेंटर भगवान भरोसे चलता है, जहाँ न तो समय पर दवाईंयां मिलती है और न ही कर्मचारी समय पर आते हैं। इस सब सेंटर में चार कर्मचारी हैं लेकिन गर्भवती औरतों के लिए कोई भी लेडी डाक्टर नहीं जो इनका चैकअप कर सके। इस सब सेंटर में सफाई की भी कोई विशेष सुविधा नहीं है। भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को बेहतर स्वास्थ सुविधा मुहैया कराने को लेकर सरकार की ओर से बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हों, लेकिन ज़मीनी वास्तविकता कुछ और ही बयान कर रही हैं। लोगों को घर के पास ही चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए प्रत्येक पंचायतों में प्राथमिक उप स्वास्थ केंद्र बनाने की योजना सराहनीय अवश्य हैं लेकिन इनकी सुविधा विस्तार पर ठीक से ध्यान नहीं दिए जाने के कारण ही ग्रामीण आज भी इलाज के लिए शहरों की ओर दौड़ लगाने को विवश हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि हर गांव में स्वास्थ विभाग की ओर से कोई न कोई संचालित सेंटर होना चाहिए लेकिन केंद्र का यह मानना षायद झूठा साबित होगा क्योंकि रियासत जम्मू कश्मीर जिसको जन्नत का दर्जा दिया गया है, यहां पर स्थिति इसके बिलकुल विपरीत है। सरहद पर रहने वाले आज अपनी ही हुकूमत से सवाल करते हैं कि हमने मुष्किल दौर अपने देष की सलामती के लिए कीमती जानें भी कुरबान की हैं। देश की रक्षा के लिए कदम से कदम मिला कर हर तरह की मुसीबतें झेली हैं। इसके बावजूद सरकार की ओर से एक सब सेंटर के लिए क्यों तरसाया जा रहा है? लोकतंत्र, जनतंत्र और गणतंत्र में समान रूप से भागीदार देश के इन पिछड़े और सीमावर्ती लोगों के साथ अन्याय हमारी राजनितिक और प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करता है जिसे दूर करना हम सब की जि़म्मेदारी बनती है।
मुसर्रत यासमीन
(चरखा फीचर्स)

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