पाकिस्तान के पेशावर शहर में एक आर्मी स्कूल पर हमले कर बच्चों की हुई निर्मम हत्या के बाद चरमपंथियों के मामलों की सुनवाई के लिए देश में गठित की जा रही सैन्य अदालत पर नागरिक संगठन आपत्ति जता रहे हैं। देश के प्रमुख नागरिक संगठन और बौद्विक चिंतक सरकार के इस कदम का यह कह कर विरोध कर रहे हैं कि सैन्य अदालतों में पर्याप्त पारर्दशिता मुश्किल होगी। वहीं देश के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा है कि गठित की जा रही इन सैन्य अदालतों में सब कुछ व्यवस्था के मुताबिक ही होगा। सूत्रों के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि पाकिस्तानी संसद दो सालों के लिए इन सैन्य अदालतों को मंजूरी दे सकती है । संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ आबिद हसन मिंटो ने इसका विरोध करते हुए कहा ..सैन्य अदालतें इसलिए गठित की जा रही है क्योंकि सेना प्रमुख इस बात से नाराज हैं कि हमले में एक आर्मी स्कूल को निशाना बनाया गया।
श्री मिंटो ने कहा हम उनका गुस्सा समझ सकते हैं लेकिन यह गुस्सा जब क्यों नहीं दिखा था जब क्वेटा में एक सौ से ज्यादा शिया समुदाय के लोगों की हत्या कर दी गई थी और बीते साल पेशावर में 127 ईसाइयों को एक चर्च में मार दिया गया था उन्होंने कहा कि देश के अंदर लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कार्यर्कता लंबे समय से चरमपंथियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे थे लेकिन तब सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया था। पत्रकार और लेखक अहमद राशिद ने पारर्दशिता का सवाल उठाते हुए कहा..सैन्य अदालत कितने गोपनीय होंगे एवं जो सबूत पेश किए जायेंगे क्या वह अदालत आने वाले सभी लोगों और दोनों तरफ के वकीलों को मिलेंगे और क्या खूफिया एजेंसियों के सबूत को चुनौती दी जा सकेगी। दूसरी तरफ पाकिस्तान के गृह मंत्री चौधरी निसार अली खान ने कहा..सरकार की तरफ से गठित की जा रही सैन्य अदालत में सभी नियमों का पालन किया जायेगा।ऐसा नहीं होगा कि जिसका मामला वहां चलेगा उन सबको फांसी दे दी जायेगी पाकिस्तान की मुख्यधारा की कुछ राजनीतिक दलों ने भी सैन्य अदालत के प्रस्ताव का शुरु में विरोध करते हुए कहा था कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हो सकता है ।

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