विश्व के किसी भी कोने में मानव जहाॅ कहीं भी निवास करता है, वह किसी न किसी धर्म, संस्कृति, प्राचीन परंपराओं, मान्यताओं, आस्थाओं अथवा सिद्धान्तों से जुड़ा होता है। कहीं न कहीं उसकी आस्था किन्हीं खास चीजों से अवश्य जुड़ी होती है जिसका पालन उसके लिये अनिवार्य सा होता है। कहीं लोग प्रकृति देवता के रुप में किसी खास आकृति की पूजा करते हंै, तो कहीं चाॅद, सूरज, पर्वत, पेड़-पौधे व नदी-घाटी की पूजा प्रत्यक्ष रुपों में। वर्ष 1920-21 ई0 में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, व कालीबंगा की खुदाई मंे सिंघु घाटी सभ्यता के रुप में एक नगरीय सभ्यता के अवशेषों का प्रार्दुभाव हुआ था जिसमें प्रकृति पूजा के कुछ दस्तावेजी सबूत मिलने के प्रमाण मौजूद हैं। इससे साफ पता चलता है कि जीवन जीने की तमाम संभावनाओं के बीच कही न कहीं किसी रुप में मानव की आस्था इन चीजों से जुड़ी होती ही है। चाहे हिन्दु हांे या मुसलमान। सिक्ख धर्मावलम्बी हांे या फिर इसाई, यहूदी, जैन अथवा पारसी। तमाम धर्मों में पूजा का अपना खास महत्व है। किसी-किसी धर्म में कई-कई सम्प्रदायों का संगम होता है। अलग-अलग मान्यता रखने वाले भी ईश्वर को किसी अन्य रुप में स्वीकार करते हुए अलग दिशा अपना लेते हैं जो कालान्तर में एक पंथ का रुप ले लेता है बाद में चलकर जो एक धर्म के रुप में परिणत हो जाता है। जहाॅ तक प्रकृति पूजा की बात है तो सभी धर्मावलम्बी प्रकृति की पूजा किसी न किसी रुप में करते ही हैं। यह पूजा आदिवासी समाज में काफी बढ़-चढ़ कर होता है।
जनश्रुतियों, किवदन्तियों व प्राचीन परंपराओं/मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में आदि मानव के रुप में जंगल-पहाड़ पर रहने वाले लोग भूकम्प, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, चेचक, कालाजार, मलेरिया, जैसी महामारियों से बचने के लिये किसी न किसी रुप में बलि देकर आसन्न समस्याओं का हल ईश्वर की प्रार्थना कर निकाला करते थे। यह दिगर बात है कि वर्तमान समय में नरबलि की खबरें एकाध जगहों पर ही देखने-सुनने को मिलती है, लेकिन जानवरों की बलि के साक्षात प्रमाण अभी भी प्रमुखता से मौजूद हैं। पूरे भारतवर्ष के अन्तर्गत छत्तीसगढ़, झारखण्ड उड़ीसा, मध्यप्रदेश, सहित तकरीबन 7 पूर्वोत्तर राज्यों (ेमअमद ेपेजमत ेजंजमेद्ध असम, मिजोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय व मणिपुर में आदिवासियों की बहुलता है। प्राप्त आॅकड़ों के मुताबिक भारत वर्ष में आदिवासियों की आबादी 8,43,26,240 है। इस प्रकार पूरी आबादी में इनका हिस्सा है 8.2 प्रतिशत। तमाम अलग-अलग प्रदेशों में आदिवासियों की अपनी अलग जीवन-संस्कृति व पद्धति है। रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, आतिथ्य सत्कार व सामाजिक -सांस्कृतिक ढाॅचे में तुलनात्मक अन्तर के बावजूद बहुत सारी समानताऐं पायी जाती है। जो लगभग समान होता है तथापि एक खास भौगोलिक परिवेश में पलने-बढ़ने के कारण उनमें समानताऐं दिखलायी पड़ ही जाती है। जंगल, पहाड़, नदी, घाटी वाले झारखण्ड प्रदेश में आदिवासियों की कुल 32 उपजातियाॅ पाई जाती है। आदिवासियों की ये उपजातियाॅ हैं-संताल, हो, मुण्डा, उरांव, माल पहाडि़या, कुमार भाग पहाडि़या, सौरिया पहाडि़या, विरहोर, भूमिज, गांेड, करमाली, बिरजिया, कोल, मोहली, बेदिया, असुर, बेईगा, बंजारा (कोड़ा), बाथूडी, बिंझिया, चेरो, चिक बड़ाईक, गोराइत, कोरवा, लोहरा, पड़हिया, सवर, शिवलंग, काॅवर व खडि़या, किसान इत्यादि। इन जनजातियों की अपनी-अपनी संस्कृति है। झारखण्ड में सबसे अधिक आबादी संतालों की है। दूसरी बड़ी आबादी मुण्डा व उरांव की है। संताल जनजाति मुख्यतः संताल परगना प्रमण्डल अन्तर्गत दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़, साहेबगंज, जामताड़ा तथा गिरिडीह, हजारीबाग व धनबाद में निवास करती है, इसके अलावे यह जनजाति उड़ीसा के कुछ जिलों, प0 बंगाल व बिहार में भी पाई जाती है।
संतालांे का विश्वास है कि सृष्टि की उत्पत्ति पिलचू हड़ाम व पिलचू बुढ़ी ने किया है जबकि पहाडि़या समुदाय में सृष्टि की उत्पत्ति की अलग कहानी है। ये आदि पुरुष लित् बाबा और आदि महिला लित् माय को मानते हैं। इनसे 7 पुत्र-सान्द्रा, सान्डोम, चारे, माने और अचारे देलूह (दो का नाम नामालूम) तथा 7 पुत्रियाॅं-छिता, कापू, हीसी, डुमनी, धनगी और पुनगी (एक का नाम नामालूम) हुई। संताल समुदाय किसी भी उत्सव में मरांग बुरु की पूजा अवश्य करते हैं जबकि पहाडि़या समुदाय में बड़े गोसाई, लेहू गोसाई, डारमेंटे गोसाई, जरमात्रे गोसाई के अलावे चोर दानू, महादाना, कारु दाना, जोख देवता, रंगाधारी बाबा, आंचाय कुदबी, किचीन जनानी, पातालपुरी किचीन, आकाशपुरी किचीन, वनशक्ति, वन मशान, माल जोग, गाॅव रखबार इत्यादि की पूजा-अर्चना करते हैं। संतालों में सात गोत्र (पारिस) का आविष्कार हुआ-वास्की, चैड़े, पाॅवरिया, बेसरा, बेदिया, किस्कु, मुर्मू, मराण्डी, टुडू, हेम्ब्रम, सोरेन व हाॅसदा। सहगोत्रिय विवाह का प्रचलन संतालों में नहीं है। इस समुदाय में कराम पेड़ का काफी महत्व है। वन्दना या सोहराय संतालों का प्रमुख त्यौहार है। बाहा, माघ, एरोक, हारियाड़, जान्थाड़, व दसाई इनके अन्य पर्व हैं। दक्षिणी छोटानागपुर व कोल्हान प्रमण्डल में सरहुल पर्व काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समाज काफी अंधविश्वासी होता है। इस समुदाय में बोंगा कोड़ा व बोंगाकुड़ी का खास महत्व है। इस समुदाय का विश्वास है कि आदमी मरने के बाद पातालपुरी में पहॅुचता है जहाॅ उन्हें उनके अच्छे और बुरे कर्मों के लिये दण्ड का प्रावधान अलग-अलग है।
इनका मानना है कि सृष्टि में दो प्रकार की शक्तिशाली आत्माओं का वास होता है। ओड़ाक् बोंगा व बाहरे बोंगा। इनका मानना है कि बोंगाओं को हमेशा प्रसन्न रखने से उनका जीवन सुखमय बीतेगा। रंगो रुजी, कान्दू, अस्थायी बोंगा, नहियर बोंगा, किसार बोंगा व युद्ध बोंगा की पूजा समय-समय पर संतालों द्वारा किया जाता है। जाहेर थान संतालों का सामुदायिक पूजा स्थल होता है। जाहेर थान गाॅव के बाहर जंगल या झुरमुट के बीच अवस्थित होता है। इस समुदाय की अपनी एक अलग न्याय व्यवस्था है। मांझी, हाड़ी मांझी, परगनैत, मोड़े मांझी, दिसोम वैसी, व मांझी थान इनकी न्याय व्यवस्था के अंग हैं। ग्रामीण व्यवस्था पर अगर गौर फरमाऐ ंतो पाऐगें कि इस समाज में गाॅव स्तर पर पद के अनुसार लोग अपने पावर का इस्तेमाल किया करते हैं। मांझी प्रधान होता है। मांझी के नीचे प्रराणिक, जोग मांझी, गुडि़त, व नाईकी होते हैं। बिठलाहा संताल समाज का सबसे कठोर दण्ड विधान है। इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है समाज से बहिष्कार कर देना। यह दण्ड प्रक्रिया अभी भी कायम है। सेन्दरा का अर्थ होता है शिकार। इस समाज में सेन्दरा का काफी महत्वपूर्ण स्थान है। जंगल में शिकार का नेतृत्व करने वाला गुरु देहरी बाबा के नाम से जाना जाता है। संताल समाज में 12 तरह की विवाह पद्धति है। रायबार बपला, गोलांटी बपला, हीरोम चेतना बपला, ईतयूत बपला, जव्ाय किरिन बपला, मुन्डू और आगू बपला, नीर बोलोक् बपला, सहाय् बपला, तुन्की विपिल बपला, अपानगिर बपला, घर जव्ाय बपला व घरदी जव्ाय बपला। इस प्रकार हम देखते हैं कि आदिवासी समाज में अलग-अलग उपजातियो की अपनी अलग-अलग परंपराऐं, रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार, शादी-विवाह, न्याय व्यवस्था, व अन्य तरह की व्यवस्थाऐं मौजूद हें। देश के 28 वें राज्य के रुप में 15 नवम्बर 2000 ई0 को बिहार से अलग हुए इस राज्य की तीन करोड़ आबादी में 25 से 30 प्रतिशत आबादी जनजातियों की है।
एक अपुुष्ट आॅकड़ें के मुताबिक इस राज्य में 70 से 80 लाख की आबादी सिर्फ जनजातियों की है जो अपनी अलग संस्कृति, पहचान के लिये जानी जाती हैं। सीधे व सरल स्वभाव के लिये मशहूर इस राज्य के आदिवासियों को तथापि मुख्य धारा से पूर्णतः नहीं जोड़ा जा सका है। कुल 32 जनजातियों में से 09 आदिम जनजातियों की स्थिति आज भी दोयम दर्जे की ही है। 15 नवम्बर 2000 ई0 को देश के 28 वें राज्य के रुप में बिहार से अलग हुए इस प्रदेश की जनता ने आदिवासी मुख्यमंत्री के माध्यम से अपनी विकास यात्रा का आगाज तो किया किन्तु सत्ता की लोलुपता ने यहाॅ के नेताओं को लालची बना दिया। आदिवासियों की राजनीति करने वाले लोग ही वर्तमान समय में पूॅजीपति बन उनका शोषण लगातार करते आ रहे हैं। इस राज्य में अब तक 100 से अधिक मेगा एमओयू पर सरकार के साथ विभिन्न कंपनियोें के समझौते व हस्ताक्षर हुए हैं जो झारखण्ड के खनिजों का देाहन कर उसे औद्योगिक स्वरुप प्रदान करने की कवायद में लम्बे समय से लगे हुए हैं किन्तु इससे आदिवासियों को कोई खास फायदा पहॅंुचने वाला नहीं है। इस राज्य के आदिवासियों की आबरु से खिलवाड़ करने का परिणाम यह हो रहा है कि धीरे-धीरे आदिवासी अपनी संस्कृति-परंपरा से लुप्त होते जा रहे।
अमरेन्द्र सुमन
दुमका

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