देश को सियासत सिखाने और सियासत का अंदाज़ बताने वाली दिल्ली एक बार फिर खुद सियासत मे उलझी दिख रही है ।जिस जनता पर शासन करने के लिए राजनीतिक दल पैंतरे खेलतें हैं , वही जनता आज मतदाता की भूमिका मे उनकी किस्मत लिखने जा रही है ।इस बार यहां का चुनावी माहौल काफी बदला हुआ दिख रहा है ।शनिवार को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होने जा रहा है, जिसमें आठ पार्टियों के उम्मीदवार मैदान में हैं । आज़ाद उम्मीदवारों को मिलाकर कुल 673 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला एक करोड़ 33 लाख से अधिक मतदाता करेंगे ।इसी लिए देश की राजधानी पर फिर सभी की निगाहें टिक गई हैं। दिलचस्प और कांटे का मुकाबला हो रहा है ,तो वहीं चुनाव पूर्व सर्वाक्षणों मे रोज बदलते नतीजों ने बेचैनी और बढ़ा दी है ।कभी अन्ना आंदोलन के दौरान मंच साझा करने वाले दो महारथी अब एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। "मफलर मैन" अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ भाजपा ने कभी उन्हीं की साथी रहीं रौबदार पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में उतारा है।सब की अपनी – अपनी अपीलें हैँ ।दरअसल दिल्ली की जनता की अपनी सरकार से वैसी ही अपेक्षाऐं हैं जैसी कि देश के दूसरे राज्यों के लोगों को होती हैं ।क्यों कि दिल्ली की हालत भी देश के दूसरे शहरों से अलग नहीं है। चकाचौंध वाली दिल्ली के लोगों की अपने स्तर के हिसाब से सरकार से उम्मीदें हैं तो वहीं अभावग्रस्त दिल्ली के लोगों के थके और मायूस चेहरों को सरकार से कुछ और आस है ।यानी झुग्गी के बदले मकान दिल्ली में भी चाहिए। बिजली, पानी, सड़क सरीखी जरूरतें यहां भी चाहिए। शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक की जरूरत दिल्ली को भी है। महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार से मुक्ति और स्थिर सरकार भी दिल्ली को चाहिए ।देश के अन्य इलाकों की तरह गरीबों की भरमार दिल्ली में भी है।
एक आंकड़े के मुताबिक करीब साढ़े तीन लाख परिवार दिल्ली में भी गरीबी की रेखा से नीचे जीपन याजन कर रहें हैं। तंग गलियों की गंदगी मे आबाद हजारों बस्तियां भी दिल्ली मे हैं ।60 लाख से अधिक लोग आज भी 2000 अनधिकृत कालोनियों में बसें हैं ।हर बार राजनीतिक दलों ने इन कालोनियों को नियमित करने को चुनावी मुद्दा बनाया है । मगर हर बार इन बस्तियों में रहने वाले लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते रहे हैं ।लेकिन इसमे नई बात ये हे कि राज्य बनने के बाद पहली बार दिल्ली चुनाव देश के सामाजिक-आर्थिक हालात का आईना बनकर हर सियासी दलों को डरा रहा है ।पहली बार पाश इलाकों की चकाचौंध से हट कर दिल्ली मे भी गरीबों ,रेहड़ी पटरी वालों और फुटपाथ पर जिंदगी जीने वालों की बात हो रही है ।इसी लिए दिल्ली चुनाव में सिर्फ भावी मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले नेता ही नहीं, प्रधानमंत्री से लेकर सरकार का हर मंत्री पहली बार चकाचौंध की राजनीति खारिज कर रहा है।बेहतर बिजली सप्लाई पर सवाल उठाया जा रहा है।हर कालोनी मे पीने का पानी देने की खुली वकालत हो रही है।यानी दिल्ली के लोगों के सपनों को उड़ान दी जा रही है ।दिल्ली के इन चुनावों मे गरीबों को आवाज किसने दी ये अब बहस का मुद्दा नही रहा ,बहस तो इस पर होगी कि 7 फरवरी को दिल्ली के लोग इस बार अपने सपनों को पूरा करनें के लिए किस पर भरोसा जताते हैं ।
सभी दलों ने अपने तरकश के सारे तीर प्रयोग कर लिये हैं और चुनावी तैयारियों में पूरी ताकत झोंक दी है।नाक की इस लड़ाई मे भाजपा नेतृत्व ज़्यादा बेचैन दिख रहा है ।लोकसभा और चार प्रदेशों मे बड़ी कामयाबी हासिल करने के बाद पहली बार भगवा खेमे का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ दिख रहा है ।करीब 120 सांसद और 22 मंत्रियों ने मोर्चा सम्भाला ।इसके अलावा खुद प्रधानमंत्री ने भी अपनी तर्ज पर कई रैलियां की है । लोकसभा चुनाव से लेकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव तक तो मुकाबला नरेंद्र मोदी बनाम अन्य ही हो रहा था। दिल्ली के चुनाव के लिए रामलीला मैदान में हुयी मोदी की रैली तक भी मुकाबला मोदी और केजरीवाल के रूप मे देखा गया ।लेकिन इस रैली मे जनता के बदले हुये तेवर देख कर बीजेपी ने अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव किया।दरअसल अरविंद केजरीवाल की दिल्ली सरकार के खिलाफ उस तरह का माहौल नहीं है, जिस तरह का महाराष्ट्र, हरियाणा आदि राज्यों में वहां की सरकार के खिलाफ रहा था। केजरीवाल खुद परिवर्तन की राजनीति की उपज हैं इसलिए जनता में उनके खिलाफ आक्रोश नही है । इसके साथ ही भाजपा को यह भी लगा कि यदि दिल्ली में भाजपा हार गई तो उसे सरकार की, भाजपा की और यहां तक कि नरेंद्र मोदी की हार के तौर पर पेश किया जाएगा। इन बातों को भांपते हुए भाजपा ने आनन-फानन में उसी परिवर्तन की राजनीति की उपज वाले एक अन्य चेहरे किरण बेदी को साथ जोड़ा और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे अब मुकाबला मोदी बनाम केजरीवाल ना होकर किरण बेदी बनाम केजरीवाल हो गया है।लेकिन विज्ञापनों की बमबारी , पोस्टर वार और एफएम रेडियो अभियान के बाद भी चुनाव पूर्व अधिकतर सर्वेक्षण पिछले 9 महीने मे पहली बार भाजपा के मन की बात नही कर रहे हैं ।कुछ सर्वे ये बता रहे हैं कि बेदी को पीछे छोड़कर केजरीवाल की लोकप्रियता बढ़ी है और केजरी वाल सीएम के रूप में लोगों की पहली पसंद हैं । उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2013 में दिल्ली चुनावों में उसने सबसे अधिक संख्या में सीटें जीती थीं ।लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को सभी सात सीटों पर जीत मिली थी।इसके अलावा मोदी की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के मद्देनज़र ये चुनाव पार्टी के लिए बहुत आसान होना चाहिए था। ख़ासकर तब जब पिछले साल के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की ज़बरदस्त हार हुई। केजरीवाल ने दिल्ली में 49 दिन सरकार चलाने के बाद अचानक सत्ता छोड़ दी, जिससे पार्टी
और केजरीवाल की छवि काफी ख़राब हुई।आज दिल्ली को चुनाव के रास्ते पर ले जाने के गुनाहगार केजरीवाल ही हैं । इसके लिए हर सभा मे केजरीवाल को मतदाताओं से माफी मांगनी पड़ी । एक समय ऐसा भी आया जब पार्टी के नेताओं के बीच आपसी मतभेद और आन की लड़ाई से आप का वज़ूद ख़तरे में पड़ गया। लेकिन आज आम आदमी पार्टी एक बार फिर दिल्ली चुनाव में सब से अहम पार्टी मानी जा रही है। लेकन मुक़ाबला सही मायने में कांटे का है.
लोकसभा चुनावों के बाद लगा था कि देश मे जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति का असर कम हो गया हे ।लेकिन दिल्ली जैसे विकसित प्रदेश मे भी पूरे चुनाव अभियान के दौरान सियासत में स्वच्छता लाने की बात करने वाले मुकाबले के दोनों दल एक दूसरे के खिलाफ जाति की राजनीति का आरोप लगाते रहे हैं ।नेताओं की जुबान भी जानबूझकर खूब फिसली ।जातिगत और क्षेत्रीय गणीत के हिसाब से टिकट भी बांटें गये । दिल्ली चुनाव में पूर्वांचल के मतदाताओं की अहमियत को देखते हुए सभी पार्टियों ने इन्हें लुभाने के लिए कोई कसर नही बाकी रखी हैं। एक ओर भाजपा लोगों को यह बताने में लगी है कि प्रधानमंत्री तो पूर्वांचल से सांसद हैं ही साथ ही पार्टी ने राज्य में अहम जिम्मेदारी पूर्वांचल के नेताओं को ही दी है। इसके साथ ही पार्टी ने पूर्वांचल के सभी मंत्री-नेताओं को यहां चुनाव प्रचार में पूरी तरह झोंक दिया है। उधर, आम आदमी पार्टी ने पूर्वांचल के 11 लोगों को टिकट देकर उन्हें रिझाने की कोशिश की है।दिल्ली में पूर्वांचल के मतदाताओं की तादाद लगभग 30 लाख आंकी जाती है।ये भी माना जाता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में सत्ता सुख उसी दल को मिला है जिसके कब्जे में सुरक्षित और अल्पसंख्यक मतदाता बहुल सीटें रही हैं । इस तरह से माना जा सकता है कि यहां सत्ता की कुंजी 12 सुरक्षित और 15 उन सीटों के पास है जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की तादात नतीजे पर असर डालने वाली है ।इस बार कई सीटें ऐसी हैं जहां आप और कांग्रेस का मुकाबला पाला बदलने वाले अपने पुराने नेताओं से है ।पटपड़गंज मे आप नेता मनीष सिसोदिया का मुकाबला आप के पुराने साथी अब बीजेपी के विनोद कुमार बिन्नी से है ।पुरानी कांग्रेसी कृष्णा तीरथ पटेल नगर से कमल निशान पर मैदान मे हैं ।केजरीवाल की नई दिल्ली , किरण बेदी की कृष्णा नगर और दिल्ली चुनाव मे कांग्रेस के अगुवा अजय माकन की सदर विधान सभा सीट पर पूरे देश की निगाहें लगी हैं ।प्रचार के अंतिम दिन सभी राजनीतिक दलों ने ताबड़तोड़ रैलियां और रोड शो कर के अपनी ताकत दिखायी और मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की ।भाजपा ने सबसे अधिक रैलियां की है ।बहरहाल शनीवार का दिन मोदी और भाजपा दोनों के लिए अहम है क्यों कि मोदी अभी तक नाबाद रहे हैं, 2002 के बाद हर चुनाव जीत रहे हैं । लेकिन अगर भाजपा हार गयी तो मोदी की अपराजेय वाली छवि धूमिल हो जाएगी, जो उन्होंने पिछले 12 सालों से बना रखी है।वहीं अगर आम आदमी पार्टी जीतती है तो ये एक राजनीतिक मॉडल स्थापित हो जाएगा और जो देश के किसी और हिस्से में भी उभर सकता है। लेकिन मुक़ाबला सही मायने में कांटे का है । ऐसे में फतह उसी की होगी जो मतदान के दिन अधिक हरकत में रहे और लोगों को वोट डालने की सलाह देने सुबह सुबह वोटरों के घर पहुंच जाए ।चुनाव आयेग के सामने भी अधिक मतदान की चुनौती है । दिल्ली विधान सभा चुनावों में साल 2013 में अब तक सबसे अधिक 65.6 फीसदी मतदान का रिकार्ड है ।
** शाहिद नकवी **
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