विशेष आलेख : राजनीति बदल गई, समस्या नहीं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

विशेष आलेख : राजनीति बदल गई, समस्या नहीं

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जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। उम्मीद की जा रही है कि इस महीने के अंत तक राज्य में नई सरकार कामकाज संभाल लेगी। किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलने के कारण राज्य की दो सबसे बड़ी पार्टी पीडीपी और बीजेपी मिलकर सरकार बनाएगी। जम्मू कश्मीर की जनता को राज्य में बनने वाली सरकार से बहुत उम्मीदें हैं। उन्हें आशा है कि गठबंधन में बनने वाली सरकार खींचतान से ऊपर उठकर जनता के हित में कार्य करेगी और सड़क, बिजली, पानी तथा स्कूल जैसी उनकी बुनियादी समस्याओं का निवारण करेगी। दरअसल सितंबर माह में आई विनाशकारी बाढ़ ने जम्मू एवं कष्मीर में सब कुछ तहस नहस कर दिया था। ऐसे में यहां के लोग राज्य में स्थिर सरकार का गठन चाहते हैं ताकि बाढ़ प्रभावितों का पुनर्वास हो सके। जम्मू एवं कष्मीर के सीमावर्ती जिले पुंछ के बालाकोट के निवासी इस उम्मीद में हैं कि षायद राज्य में बनने वाली नई सरकार उनके क्षेत्र में भी विकास के कामों को गति देगी। बालाकोट का धराटी दो पंचायतों में बंटा हुआ है। 21 वीं सदी के इस दौर में भी यह क्षेत्र तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। सरकारें आईं और चली गईं लेकिन किसी का ध्यान इस क्षेत्र की ओर नहीं जाता है। राज्य की राजधानी से कोसांे दूर सीमावर्ती क्षेत्र होने का यहाँ के निवासियों को खामियाज़ा भुगतना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण राज्य में जनहित में बनने वाली योजनाएं हैं जो यहां पहुचते-पहुंचते दम तोड़ देती हैं। दूसरे रूप में देखा जाये तो ऐसा लगता है कि यहां के लोग पिंजरे में कैद होकर रह गए हैं। जिन्हें जीने की आज़ादी तो है परंतु बुनियादी सुविधाओं का लाभ उनके लिए वर्जित है।
           
2011 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल आबादी तकरीबन 14 हजार है। यह क्षेत्र बिजली, पानी, सड़क, षिक्षा और स्वास्थ्य जैसी तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। हिंदुस्तान को आजाद हुए 67 साल से ज्यादा का समय हो चुका है। लेकिन तब से लेकर आज तक यहां की जनता पिंजरे में बंद किसी पक्षी तरह कैद है। सड़क की अगर बात की जाए तो 1973 में यहां 10 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कार्य षुरू हुआ था। प्रोजेक्ट इतना बड़ा है कि 2013 तक सिर्फ आधा किलोमीटर ही सड़क तैयार हो सकी है। 1973 में जब इस पर निर्माण कार्य आरंभ हुआ था तो उस समय एक या दो पैसे मजदूरी थी। इस सड़क को जब हाथों से बनाया गया था तो इस पर छोटी-मोटी गाडि़यां चलती थी लेकिन जब मषीनों से काम षुरू किया गया तो इस सड़क पर अब घोड़े भी चलना पसंद नहीं करते। 2012 में जब यह सड़क पीएमजीएसवाई (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) के अंर्तगत आई तो यहां के लोगों में खुषी की लहर दौड़ गई कि अब इस सड़क का अधूरा निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा। लेकिन लोगों को आखिर में नाउम्मीदी ही हाथ लगी। सड़क का टेंडर किसी एक ठेकेदार के नाम होता है। लेकिन यहां 2011 से लेकर 2013 तक कई ठेकेदार बदल चुके हैं और सड़क का निर्माण कार्य 100 मीटर भी नहीं हो सका है। 

इसके अलावा इस क्षेत्र में बिजली का हाल भी बेहाल ही है। बालाकोट में बिजली का नामोनिषान नहीं है। 2011 में यहां 40 खंबे आए थे मगर उन पर लगाने के लिए आज तक तार नहीं मिल सका। यहां षिक्षा की स्थिति भी बहुत दयनीय है। शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत यह प्रावधान है कि प्रत्येक पांच किलोमीटर पर एक स्कूल होना आवश्यक हैं मगर बालाकोट के इस सीमावर्ती इलाके में कोई भी हायर सेकेंडरी स्कूल नहीं है। षिक्षा के बिना देष का विकास संभव नहीं है। ऐसे में यहां के छात्र-छात्राएं तकरीबन 30 किलोमीटर का सफर तय करके कैसे षिक्षा हासिल कर सकते हैं? यह प्रश्न आज भी ज्वलंत है। 1947 से लेकर आज तक यहां की जनता की किसी भी अपील को सरकार ने पूरा नहीं किया है। इस क्षेत्र के लोगों को इस बात का मलाल है कि राजनेता केवल चुनाव का वक्त नजदीक आने पर यहां आते हैं और वादों को अपनी डायरियों में नोट कर ले जाते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद उनका उल्लू सीधा हो जाता है और दोबारा कोई यहां लौटकर नहीं आता। ऐसे में उम्मीद लगाएं तो किससे? यही कारण है कि अब यहां के लोगों ने राजनितिक दलों से उम्मीद भी करनी छोड़ दी है।
         
दिल्ली में हुए  विधानसभा चुनाव नतीजों से एक बात साफ हो गयी है कि देष की राजनीति में अब बदलाव आ रहा है। पिछली यूपीए सरकार को जनता ने सिर्फ इसलिए नकार दिया कि वह महंगाई, भ्रश्टाचार और बढ़ती बेरोजगारी से परेषान आ चुकी थी। इसलिए 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में लोगों ने बीजेपी को प्रचंड बहुमत दिया। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी नई बीजेपी सरकार से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन 9 महीने गुजर जाने के बाद भी लोगों को कोई खास फायदा नहीं हुआ। परिणामस्वरूप 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी को ज़बरदस्त हार का सामना करना पड़ा और पार्टी मात्र 3 सीटों पर सिमट कर रह गई। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जितने वाली आम आदमी पार्टी ने इतिहास रचते हुए 70 में से 67 सीटों पर कब्ज़ा जमा लिया। चुनाव नतीजों से एक बात साफ हो गयी है कि देष की जनता अब बहुत सोच समझकर वोट करने लगी है। जो बातों से ज़्यादा ज़मीनी स्तर पर विकास करेगा जनता उसी को ही सत्ता की कमान सौंपेगी। दिल्ली में 2013 में हुए विधान सभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी मगर दिल्ली की जनता को लगा कि केंद्र में मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार अपने वादों को पूरा नहीं कर पा रही है। लिहाजा उसने आम आदमी पाटी को 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनाव में प्रचंड बहुमत दिया। देष के दूसरे राज्यों में सत्ता की कुर्सी पर काबिज राजनीतिक पार्टियों को इस पर गहरा मंथन करना होगा कि अगर वह विकास करेंगे तो ही सत्ता का सुख भोग सकेंगे अन्यथा उनका हाल भी दिल्ली जैसा ही होगा। दिल्ली के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद अब षायद जम्मू एवं कष्मीर में भी बनने वाली नई सरकार विकास को अपना प्रमुख एजेंडा बनाएगी। दिल्ली में बदली सियासी फि़ज़ा ने यह साबित कर दिया है कि समस्याओं के निदान से पहले राजनितिक विचारधारा को बदलना होगा। 





ज़हीर खान
(चरखा फीचर्स)

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