विशेष आलेख : मुलायम सिंह की नजर में कौन मंत्री हैं दागी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

विशेष आलेख : मुलायम सिंह की नजर में कौन मंत्री हैं दागी

समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव एक बार फिर अपने बेटे के लिए धर्मसंकट का कारण बनते नजर आए। गाहे-बगाहे प्रदेश सरकार के नाकारा और अपना घर भरने वाले मंत्रियों के खिलाफ बमकना उनका शगल बन चुका है। बुधवार को मुलायम सिंह यादव ने फिर कहा कि कार्यकर्ताओं का भरोसा खो चुके मंत्रियों को अगर नहीं हटाया जाता तो पार्टी को अगले विधान सभा चुनाव में मुश्किल हो जाएगी। एक तरफ उन्होंने आभास दिया कि सरकार की स्वच्छ छवि का महत्व उन्होंने स्वीकार कर लिया है। दूसरी ओर उन्होंने खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति का जिक्र आने पर उनका पूरी तरह बचाव करने में भी कोई संकोच नहीं किया। उन्होंने कहा कि प्रजापति के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई सबूत नहीं हैं जबकि लोकायुक्त की जांच जिन साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ी है उनको देखते हुए बच्चा-बच्चा जान गया है कि बीपीएल रहे प्रजापति किस तरह रातोंरात करोड़ों की दौलत के मालिक बन गए हैं। फिर सरकार के चेहरे को स्वच्छ बनाने के लिए उन्हें किन मंत्रियों की दरकार है। यह एक पहेली बन गया है।

मनुष्य का भाग्य और त्रिया का चरित्र विधाता भी नहीं जानता। यह एक पुरानी कहावत है लेकिन नई कहावत यह है कि पिता क्या चाहते हैं पुत्र भी यह नहीं जानता। पहले भी मुलायम सिंह सार्वजनिक रूप से अखिलेश को अपने बदनाम मंत्रियों को हटाने की चेतावनी दे चुके हैं। मुलायम सिंह के सरकार को मुश्किल में डालने वाले बयानों पर जब अखिलेश से पूछा गया था तो उन्होंने बहुत ही विषाद भरे अंदाज में जवाब दिया था कि वे समझ नहीं पाते कि नेता जी कब पार्टी के अध्यक्ष हो जाते हैं और कब पिता बन जाते हैं। मुलायम सिंह एक ओर मुख्यमंत्री पर दागी मंत्रियों को दंडित करने के मामले में कमजोरी बरतने की तोहमत लगाते हैं तो दूसरी ओर यह भी कहते हैं कि लोक सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ऐसे मंत्रियों को उन्होंने खुद बचाया जो कि उनकी बहुत बड़ी गलती थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस समय सिर्फ अपना घर भरने की चिंता करने वाले मंत्रियों से कार्यकर्ताओं की नाखुशी का जिक्र वे कर रहे थे उस समय उन्होंने अपनी बात के समर्थन में नारद राय और मनोज पांडेय से हामी भरवाई। यहां भी विरोधाभास है। इन्हीं मनोज पांडेय पर मुलायम सिंह इस बात के लिए खफा थे कि लोक सभा चुनाव में उन्हें तरजीह देकर हैलीकाप्टर क्यों मुहैया कराया गया जबकि वे पार्टी को कोई लाभ नहीं पहुंचा सके। इसी नाराजगी की वजह से मनोज पांडेय के विभाग में फेरबदल किया गया था। अब उन्होंने जाहिर किया है कि गायत्री प्रजापति ही नहीं मनोज पांडेय भी उन मंत्रियों में नहीं हैं जो उनके निशाने पर हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि जिस समय मुलायम सिंह यह बयान दे रहे थे उस समय उनके चचाजाद भाई और पार्टी में नंबर टू रामगोपाल यादव संकेत दे रहे थे कि गायत्री प्रजापति से जल्द ही छुटकारा पा लिया जाएगा। समाजवादी पार्टी एक घरेलू कंपनी में बदल गई है और राज्य सरकार का संचालन भी खानदानी रियासत की तरह हो रहा है। जिस तरह से रियासतों में पारिवारिक कलह के चलते सत्ता के केेंद्र बदलते रहते हैं। उसी तरह सपा मुखिया के परिवार में भी वर्चस्व के केेंद्र में बदलाव होता रहता है। सपा मुखिया के सगे भाई शिवपाल सिंह यादव और चचाजाद भाई रामगोपाल यादव के बीच पुरानी अदावत है। 2004 में जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे पुलिस अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग के मामले में दोनों के बीच संबंध इतने तल्ख हो गए थे कि सैफई महोत्सव के समय सार्वजनिक रूप से यह देखा गया था कि शिवपाल से नाराज होने की वजह से ही मंच से पुकारे जाने के बावजूद रामगोपाल यादव ने महोत्सव के संचालन के लिए राजी होना तो दूर मंच तक पर पहुंचना गंवारा नहीं किया था।

इस बीच अघोषित रूप से यह तय हो गया था कि राष्ट्रीय राजनीति में सपा मुखिया का प्रतिनिधित्व रामगोपाल यादव करेंगे और प्रदेश की राजनीति में यह जिम्मा शिवपाल सिंह के हवाले रहेगा। इसके बावजूद शिवपाल सिंह ने अतिक्रमण करके राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी की ओर से दखल शुरू कर दिया। राष्ट्रीय गठबंधन के लिए हो रही तमाम पहल में रामगोपाल की जगह वे नजर आए। पार्टी के आइडियोलाग के रूप में मान्यता पाने के लिए आचार्य नरेंद्र देव और लोहिया जी की जयंती पर बड़े-बड़े अखबारों में संपादकीय पृष्ठ पर उनके अग्रलेख प्रकाशित होने लगे। मुलायम सिंह यादव ने भी कई मौकों पर शिवपाल सिंह के पुरुषार्थ को सराहा और संकेत दिया कि वे राष्ट्रीय राजनीति में भी शिवपाल सिंह को अब बड़ी भूमिका देने के इच्छुक हैं लेकिन अंततोगत्वा मुलायम सिंह अपने सामने अपने परिवार में विघटन न होने देने के लिए भी कृत संकल्पित नजर आते हैं। इस कारण वे रामगोपाल को हाशिए पर फेेंकने से बाज आने को मजबूर हो गए। हाल में रामगोपाल का दबदबा राष्ट्रीय राजनीति में भी बढ़ा है और ऐसा लगता है कि प्रदेश में भी उनके दखल को अखिलेश ज्यादा मान्यता दे रहे हैं। इस द्वंद्व के बीच मुलायम सिंह के मन में अपने सगे अनुज के प्रति जब मोह जगता है तो लगता है उनसे मिले फीडबैक को महत्व देते हुए वे अपने बेटे की सरकार के कतिपय अनाम मंत्रियों के खिलाफ गुबार निकालना शुरू कर देते हैं इसीलिए मुलायम सिंह के ताजा भाषण के बाद अब इस बात की छानबीन शुरू हो गई है कि वे मंत्री कौन हैं जो रामगोपाल यादव की ज्यादा चेलागीरी करने की वजह से शिवपाल की नजरों में खटक गए हैं। क्या उन मंत्रियों को सपा मुखिया का कोपभाजन बनकर अपनी बलि चढ़वानी पड़ेगी या फिर जिस दिन मुलायम सिंह और रामगोपाल यादव की अंतरंग बैठक हो जाएगी उस दिन उनके भाव फिर बदल जाएंगे और वे ही उन मंत्रियों को बख्शने के लिए मुख्यमंत्री से कहेंगे जिन्हें हटाने का इशारा अभी वे दे रहे हैं। चर्चा इस बात की है कि डीजीपी के रूप में एएल बनर्जी के सेवानिवृत्त होने के बाद उनके उत्तराधिकारी की तलाश में भी शिवपाल और रामगोपाल की अलग-अलग पसंद की वजह से बड़ी खींचतान हुई। इसी कारण कुछ महीनों के पुलिस महानिदेशकों की नियुक्ति करके घरेलू संघर्ष विराम का माहौल पैदा किया गया है। चर्चा यह है कि अखिलेश यादव प्रो. रामगोपाल पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं जिन्होंने गत विधान सभा चुनाव के पहले ही अखिलेश को मोहन सिंह के बयान के प्रसंग में उक्त दिग्गज समाजवादी नेता के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करके अपना मुरीद बना लिया था।

मुलायम सिंह के बयानों के पीछे उनकी घरेलू उठापटक की प्रतिच्छाया होने की बात पता चलना उनके मोहभंग का कारण होगा जो सपा मुखिया के बयानों से भ्रमित होकर यह मान बैठते हैं कि उन्होंने मोदी से मुकाबला होने की वजह से शायद अब राजनीति करने की अपनी पुरानी कार्यशैली बदलकर लोकलाज के मानकों के अनुरूप पार्टी और सरकार को संचालित कराने की मानसिकता बना ली है। मोदी के लगभग अपराजेय और अलंघ्य बन जाने के इस दौर में दिल्ली विधान सभा चुनाव में केजरीवाल ने जिस तरह से उनकी चूलें हिलाई हैं उससे अन्य राजनीतिज्ञ सबक ले रहे हैं। उन्हें लगता है कि अब जनता गुड गर्वनेंस और स्वच्छ छवि के प्रति बेहद संवेदनशील हो गई है जिसके कारण कानून के राज का सम्मान न करने पर बहुत जोखिम है। पर मुलायम सिंह के मामले में अभी भी यह बात अपवाद ही है क्योंकि कुछ भी हो जाए वे अपना मौलिक चरित्र नहीं बदल सकते। इसके पहले भी कई बार सत्ता गंवाकर उन्हें दुर्दिनों का सामना करना पड़ा लेकिन अंततोगत्वा उन्होंने वीरभोग्या वसुंधरा के अपने विश्वास में कभी परिवर्तन नहीं किया क्योंकि इसी विश्वास से प्रेरित होकर काम करने की वजह से वे अलोकप्रिय होते हैं और यही विश्वास उनकी गाड़ी को फिर पटरी पर चढ़ाने का कारण बनता है।






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के पी सिंह
ओरई 

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