महाराष्ट्र के मराठवाड़ा का एक गांव है झरी। यह गांव पाथरी के पास है। यहां एक छोटे घर में चटाई पर महिलाएं बैठी हैं। वह यहां अपने गांव में चल रहे देशी बीजों के बारे में बताने आई थी। घर के कोने में मिट्टी के छोटे-छोटे मटकों में कई किस्म के रंग-बिरंगी बालियों वाले देशी बीज रखे थे। हालांकि भीषण सूखे के दौर से गुजर रहे इस इलाके में ठीक से फसलें नहीं हो पा रही हैं। फिर भी बीज संरक्षण का काम जितना संभव हो किया जा रहा है।
फरवरी के पहले सप्ताह में मैंने मराठवाड़ा के कुछ गांवों का दौरा किया। वहां मैंने नकदी फसलों का भी अवलोकन किया, किसान और खासतौर से महिला किसानों से बातचीत की। परंपरागत खेती के कुछ प्रयासों को भी देखा। परभणी जिले में देशी बीजों के संरक्षण में लगे बालासाहेब गायकवाड ने बताया कि झरी, रेनाखाली, बांदरबाड़ा, इटाली, खोने पीपली आदि गांव में बीज बैंक बनाए हैं। गायकवाड जी ने ही मुझे पूरे गांव में घुमाया। यहां कई तरह के देशी बीजों का संग्रह किया गया है। इन बीजों का किसानों के बीच आदान-प्रदान किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उनके संग्रह में ज्वारी की 17, बाजरी की 4, मूंग की 5, सब्जियों की 22 और गेहूं की 4 किस्में हैं। पाथरी के झरी गांव की रंजना धरमी, सुमन भिसे, चंद्रकला, शांताबाई, लता, पारो, शांताबाई आदि ने बताया कि ज्वार. मूंग, बाजरी, उड़द, तिल, करड़, अरहर, मटकी के बीज संग्रह में हैं। इसके अलावा, गेहूं, चना, राजगिरी का देशी बीज भी है। इनकी एक से अधिक किस्में भी है।
विटा गांव की वनमाला काडवदे ने अपने छोटे खेत में विविध प्रकार की फसलें लगाई हैं। उन्होंने अपने खेत में गेहूं के साथ कई प्रकार की सब्जियां, मुनगा और आम जैसे फलदार पेड़ लगाए हैं। उनका कहना कि हम अपने खेत में थोड़ा-थोड़ा सब कुछ उगाते हैं जिससे हमारी भोजन की जरूरतें पूरी हो जाती हैं। खेती की लागत भी कम होती है, कर्ज भी नहीं लेना पड़ता। पिछले कुछ सालों से महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या के मामले में अग्रणी राज्यों में से एक रहा है। इस वर्ष भीषण सूखे के दौर से गुजर रहे किसान अपनी जान देने मजबूर हैं। विदर्भ के बाद अब मराठवाड़ा में किसान खुदकुशी कर रहे हैं।
पिछले दो सालों से गंभीर अकाल से जूझ रहे किसानों की इस वर्ष सूखे ने कमर तोड़ दी है। चारा-पानी के अभाव में मवेशी भी कम हो रहे हैं। गाय, बैल, भैसों की संख्या कम हो रही है। बी.टी. कपास, अंगूर, संतरे, केले, गन्ना जैसी नकदी फसलों के किसान प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं। लेकिन साथ ही उन्हें मानवनिर्मित आपदा का सामना करना पड़ रहा है। खेती की लगातार बढ़ती लागतें, खाद दृबीज की समस्या और नई आर्थिक नीतियों के कारण किसानों का संकट बढ़ता जा रहा है।
किसानों का संकट सिर्फ उसी समय नहीं होता है जब प्राकृतिक आपदा से उनकी फसल चैपट हो जाती है। उनका संकट तब भी होता है जब उनकी फसल अच्छी आती है। जब किसान की फसल आती है तब उसके दाम कम हो जाते हैं और जब वह बाजार में आ जाती है तो उसके दाम बढ़ जाते है। लेकिन इसका लाभ किसान को न मिलकर बिचैलियों को मिलता है। यह भी देखने में आ रहा है कि जो किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं उनमें सबसे ज्यादा वह हैं जिन्होंने हरित क्रांति के साथ आई नकदी फसलों की खेती अपनाई है। परंपरागत और सूखी खेती से आत्महत्या की खबरें कम आती हैं। किसानों की बढ़ते संकट के मद्देनजर परंपरागत खेती को बढ़ावा देने की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही है। इसका एक कारण मौसम बदलाव है।
बालासाहेब गायकवाड का कहना है कि अब जून में बारिश नहीं होती, जुलाई में होती है। अगर कम बारिश हुई तो बीज अंकुरण नहीं होता। इसके अलावा ज्यादा बारिश हुई तो फसल सड़ जाती है। लेकिन परंपरागत बीजों में प्रतिकूल मौसम झेलने की क्षमता होती है। देशी बीज ऋतु के प्रभाव से पक कर तैयार हो जाते हैं। पहले कई प्रकार की फसलें एक साथ लगाते थे। इसके साथ पारंपरिक खेती में खाद्य सुरक्षा तो होती थी, मवेशियों को भूसा और चारा भी मिलता था।
विविधता और मिश्रित खेती में खाद्य सुरक्षा के साथ पोषक तत्वों की पूर्ति भी जरूरी है यानी खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा भी जरूरी है। कम खर्च और कम कर्ज वाली खेती जरूरी है। इन सभी दृष्टियों से उपयोगी और सार्थक, देशी बीजों की टिकाऊ खेती है, जो सराहनीय होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी है।
बाबा मायाराम
(चरखा फीचर्स)



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