अन्नदाता किसान दिल से बहुत मजबूत होता है। इस देश में तो किसान न जाने कितने नुकसान और अत्याचार को झेलता रहा लेकिन उसकी जिजीविषा खत्म नहीं हुई। इस देश का प्राचीन इतिहास किसानों की खुशहाली के किस्सों से भरा पड़ा है। यहां तक कि मुगल काल में भी किसानों की हालत बहुत बेहतर थी। भारत की कृषि अर्थ व्यवस्था इतनी मजबूत थी कि वैश्विक जीडीपी में इसी की बदौलत भारत की भागीदारी तैंतीस प्रतिशत से ज्यादा आंकी जाती थी। ब्रिटिश राज में किसानों का भारी दमन और उत्पीडऩ हुआ। उन्हें कंगाल बना दिया गया। अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो यहां कृषि अर्थ व्यवस्था की स्थिति कितनी दयनीय हो गई थी इसका अंदाजा वैश्विक जीडीपी में भारतीय भागीदारी एक प्रतिशत से भी कम में सिमट जाने के आंकड़े से हो जाता है। फिर भी किसानों की आत्महत्या या सदमे से उनकी थोक मौत की खबरें उस समय कहीं दर्ज नहीं हैं। उस पर बुंदेलखंड में तो किसान के जीवट का कोई जवाब ही नहीं है। यहां कम वर्षा का क्षेत्र होने से खेती के लिए हमेशा चुनौती रही। फिर भी यहां के किसानों ने खेती को सरसब्ज रखा।
हर कुछ वर्ष के अंतराल में सूखा और कई-कई वर्ष के लिए सूखे की निरंतरता यहां की जलवायु का अभिन्न अंग रहे हैं। किसानों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। बुंदेलखंड के किसान कुदरत की विरासत में मिली बेरुखी की वजह से दीनहीन नियति के लिए मजबूर भले ही रहे हों लेकिन उन्होंने कभी जीवन संघर्ष का साहस नहीं खोया इसलिए सूखा और अकाल की भीषण पुनरावृत्ति के बावजूद ब्रिटिश काल में भी यहां किसानों के बेमौत मरने की खबरें इतिहास में नदारद हैं।
लेकिन ऐसा क्या हो गया कि अब बुंदेलखंड में सामूहिक रूप से खेती के नुकसान के बाद किसान हाराकीरी जैसे रास्ते पर चल पडऩे लगे हैं। इस इलाके के लिए यह एक नया और झकझोरने वाला ट्रेंड है। सूखे के दौरान इस शताब्दी के पहले दशक में बुंदेलखंड में लगभग साढ़े तीन हजार किसानों ने आत्महत्याएं कीं। इसके बाद सरकारें जागरूक हुईं। केेंद्र और राज्य सरकार दोनों ने ही बुंदेलखंड में खेती की स्थिति सुधारने के लिए काफी कुछ नए उपाय लागू किए। पहले की तुलना में सिंचाई के साधन काफी बढ़े हैं जिससे इस इलाके में अब बारहमासी खेती की गुंजाइश कई जगह पैदा हो गई है और अगर एक सीजन में किसान को नुकसान होता है तो दूसरे सीजन में वह इसकी भरपाई कर सकता है। इसी कारण 2013 में जब अनवरत बरसात होने की वजह से खरीफ की बुआई बिल्कुल भी नहीं हो पाई तो किसान को इससे ज्यादा सदमा नहीं लगा। इस फसली वर्ष में भी अवर्षण के कारण खरीफ की खेती नहीं हो पाई थी लेकिन किसान की उम्मीद नहीं टूटी थी।
इसके बाद रबी में शुरू में तो बारिश नहीं हुई लेकिन बाद में बारिश का क्रम इतना ठीकठाक रहा कि उम्मीद से ज्यादा बेहतर फसल खेतों में लहलहाने लगी जिससे किसान फूले नहीं समा रहे थे लेकिन फरवरी और मार्च में अप्रत्याशित रूप से अनवरत बारिश हुई तो किसान की पूरी मेहनत चौपट हो गई। जब उम्मीद ज्यादा होती है तो आघात भी ज्यादा लगता है। स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में किसान इस बार कुछ ज्यादा ही विचलित होते लेकिन जिस तरह से किसानों की इस प्रतिक्रिया स्वरूप बुंदेलखंड अंचल में ताबड़तोड़ असामायिक मौतें हुई हैं वह स्तब्ध करने वाली हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश भर में बेमौत किसानों के मरने का मामला ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के अनुसार 1995 से 2013 तक 296438 किसानों ने देशभर में आत्महत्याएं कीं। 2012 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या देश में 13524 थी और 2013 में यह घटकर 11747 रह गई। इससे लगा था कि किसानों का मनोबल शासन की नीतियों से अब बढ़ रहा है लेकिन इस वर्ष तो स्थिति बेहद भयावह हो गई है।
बहरहाल इसके पहले किसानों की आत्महत्या के कारणों को जानने के लिए तमाम शोध हुए। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने पंजाब जैसे संपन्न राज्य में किसानों की आत्महत्या के मामलों को लेकर कुछ स्टडी केस के आधार पर निष्कर्ष निकाले। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या को जातिगत कारणों से भी जोड़ा गया। अध्ययन में पाया गया कि सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति के किसानों के पास एक तो जोत छोटी थी दूसरे उनमें तकनीकी जागरूकता का अभाव था जिसकी वजह से बीटी काटन कपास जैसी पूंजी आधारित खेती में घाटे का झटका वे झेल नहीं पाए। बुंदेलखंड में पहले किसानों की आत्महत्या के पीछे बैंक कर्जों की वजह से जमीनों की नीलामी का भय रेखांकित किया गया था लेकिन कुछ वर्षों से बुंदेलखंड में हाईकोर्ट ने किसानों से वसूली में उत्पीड़क कार्रवाई पर रोक लगा रखी है। साहूकारी कर्जे का प्रकोप भी बुंदेलखंड के किसानों पर कम हुआ है तो भी इस कदर आत्महत्याएं और जीवन का अंत करने वाले फसल नुकसान जनित आघात चौंकाने वाला है। निश्चित रूप से यह कारणों की खोज के मामले में नए विश्लेषण की मांग करता है। बुंदेलखंड में खेती के मामले में जालौन जिला सर्वाधिक प्रगतिशील है लेकिन यहां पर भी कम मौतें नहीं हुईं। सिंचाई के बेहतर साधन होने की वजह से किसानों ने यहां पर पिछले कुछ वर्षों में मटर व मैंथा जैसी अत्यंत लाभकारी जिंसों की पैदावार की है। किसानों में यहां कृषि वाहनों के अलावा निजी वाहनों की बढ़ती तादाद उनकी अपेक्षाकृत संपन्नता को बयान करती है।
लेकिन इस सबके साथ-साथ यहां कई चीजें और भी हुई हैं। अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव डालने वाले सामाजिक कारक नजरअंदाज किया जाना यहां आत्महत्याओं की तह तक न पहुंच पाने की एक प्रमुख वजह है। एक समय था जब लालबहादुर शास्त्री जैसे प्रधानमंत्री ने सामाजिक कुरीतियों के निवारण को भी सरकारी कार्यक्रमों में प्रमुखता से शामिल किया था। इसके तहत उत्सव व समारोहों में आयोजित की जाने वाली दावतों में लोगों की संख्या को प्रतिबंधित किया गया था। इस दिखावे की वजह से बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में गरीब ही नहीं आम लोग तक बर्बाद हो रहे हैं। पिछले कुछ समय से इन प्रथाओं ने फिर तेजी से सिर उठा लिया है। यहां त्रयोदशी तक के भोज में ठीकठाक परिवार को एक हजार लोगों को न्यौतना पड़ता है। शादियां यहां जितनी खर्चीली होती चली जा रही हैं वह किसानों पर अप्रत्याशित व्यय भार की तरह है। किसान भी इस इलाके में उत्सव गृहों में लड़के-लड़कियों के वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित करने के अभ्यस्त हो गए हैं। विवाहघरों की वजह से कैटरिंग का व्यवसाय फलफूल उठा है। इसके कारण कैटरिंग के ठेकेदार अधिक मुनाफे के लिए अपने ग्राहक को तमाम तामझाम करने को प्रेरित करते हैं। विवाह के खाने के साथ-साथ चाट, फ्रूट, पान आदि के स्टाल शादी की व्यवस्था को बहुत महंगा कर देते हैं। किसान क्रेडिट कार्ड का ऋण यहां इसी अनुत्पादक खर्चों में जाया हो जाता है। जहां तक ज्यादा मुनाफा दिलाने वाली फसलों की स्थिति है वे एक छलना की तरह हैं। मटर कभी उम्मीद से तिगुना चौगुना मुनाफा दिलाता है तो अगले साल वह इतने नीचे आ जाता है कि लागत वसूलना तक मुश्किल हो जाती है।
ऐसा ही उतार-चढ़ाव मैंथा में भी हुआ जबकि किसान अपने सारे खर्चे इनके अधिकतम मुनाफे के हिसाब से निर्धारित कर लेने की नादानी कर बैठता है। यह उसकी अर्थ व्यवस्था को ध्वस्त करने का कारण बन गया है। जीवन स्तर बढऩे के साथ-साथ उसने दहेज का रेट भी कई गुना ज्यादा स्वीकार कर लिया है जिससे लड़की वाले किसान खेती के एक झटके की रिकवरी भी नहीं कर पाते। घाटे के सीजन में लड़की की शादी का दहेज तो उन्हें पहले से तय वदा के आधार पर ही देना पड़ता है जो इतना अंतराल पैदा कर देता है कि उसे पाटने में उसका पूरा जीवन गुजर जाए फिर भी वह पट नहीं सकता। उस पर गांवों में उपभोक्तावादी संस्कृति की तेजी से पैठ। इसके कारण किसान के जीवन में भी आवश्यक वस्तुओं का दायरा सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता चला जा रहा है। पहले आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में गांवों में दस्तकारी, पशुपालन जैसे व्यवसाय भी खूब फलते-फूलते थे जो किसान की अतिरिक्त आय का कारण बनते थे लेकिन अब गांवों में आजीविका के वैकल्पिक साधनों की कोई गुंजाइश नहीं बची है।
किसानों की असामायिक मौत के पीछे इन अदृश्य कारणों को समझने की कोशिश नहीं की जा रही। आर्थिक उपायों मात्र से यहां के किसानों के संबल नहीं मिलने वाला। सरकारों को सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी सशक्त वैधानिक प्रतिकार की व्यवस्थाएं करनी होंगी। दावतों में संख्या की पाबंदी, दहेज जैसी बुराई को रोकने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन इसमें शामिल है लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी। वजह यह है कि इस देश में उपभोक्ता बाजार तो दहेज प्रथा पर भी टिका हुआ है। वैसे लोग बहुत कम खरीददारी करते हैं लेकिन सबसे ज्यादा खरीददारी इसी कुप्रथा के कारण होती है और आज हालत यह है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो लेकिन वह बाजार के हाथों बंधक है और बाजार के स्वार्थ के खिलाफ नीतिगत फैसले लेना उसके बूते की बात नहीं है।
के पी सिंह
ओरई
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