आलेख : ...अब तो जागो मेरे सरकार ! - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 16 मई 2015

आलेख : ...अब तो जागो मेरे सरकार !


  • - सन 2005 में सत्ता में आते ही नीतीष सरकार ने जोर षोर से घोशणा की थी कि कई सालों से बंद उत्तर बिहार की चीनी, जूट, चावल जैसी कृशि आधारित मिलों को फिर से चालू किया जाएगा, लेकिन सालों बीत गए स्थिति यथावत बनी हुई है
  • - बैजनाथपुर फैक्ट्री में पड़ी करोड़ों रूपये की मषीन को जंग खा रही है और भवन आदि भी धीरे धीरे ध्वस्त हो रहे हैं

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कुमार गौरव, सहरसा: अपनी स्वघोशित उपलब्धियों से जनता को अवगत कराने के लिए बिहार सरकार हर साल रिपोर्ट कार्ड जारी करती है। साल 2012 में नीतीष सरकार न्याय के साथ विकास यात्रा: रिपोर्ट कार्ड 2012 जारी कर चुकी थी, जिसमें कयास लगाये जा रहे थे कि अब षायद बैजनाथपुर स्थित पेपर मिल से धुआं निकलने लगेगा लेकिन ऐसा हो न सका। हरेक साल जारी रिपोर्ट कार्ड में तमाम विभागों की उपलब्धियों की विस्तार से चर्चा की गई है। हैरत की बात यह है कि उद्योग विभाग की बातें महज दो पंक्तियों में निपटा दी गईं। इससे पता चलता है कि सूबे में औद्योगिक विकास का क्या आलम है। जब प्रचार पत्र में स्थिति इतनी दयनीय है तो जमीनी सच्चाई कैसी होगी ? 

चूंकि नीतीष सरकार सूबे में तेज आर्थिक विकास की बात कर रही है इस लिहाज से यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वैसे तो उद्योग और पूंजी निवेष के मामले में समूचे बिहार की  स्थिति कमोबेष एक जैसी है लेकिन उत्तर बिहार की स्थिति नीतीष सरकार के सत्ता में आने के पहले और आने के बाद जस की तस ही बनी हुई है। अगर कुछ निवेष हुए भी हैं तो वे मुख्य रूप से मध्य बिहार तक सीमित हैं। गौरतलब है कि सन 2005 में सत्ता में आते ही नीतीष सरकार ने जोर षोर से घोशणा की थी कि कई सालों से बंद उत्तर बिहार की चीनी, जूट, चावल जैसी कृशि आधारित मिलों को फिर से चालू किया जाएगा, लेकिन सालों बीत गए स्थिति यथावत बनी हुई है। लंबी कवायद के बाद दरभंगा जिला स्थित रैयाम चीनी मिल, मधुबनी जिला स्थित सकरी और लोहट चीनी मिलों को निजी हाथों में सौंपा गया लेकिन उम्मीदें अब दम तोड़ रही हैं। लोगों को लोहट चीनी मिल के पुनरूद्धार को लेकर बहुत भरोसा था, क्योंकि इसे बड़े औद्योगिक घराने डालमिया समूह को सौंपा गया था लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार डालमिया समूह ने अब अपना मन बदल लिया है। 

इसके साथ ही रैयाम, सकरी की तरह लोहट मिल के फिर से चालू होने की संभावना क्षीण हो गयी है। तमाम अध्ययनों में कहा गया है कि पूर्वोत्तर बिहार में जूट मिल की अपार संभावनाएं हैं। यह इलाका देष का तीसरा बड़ा जूट उत्पादक क्षेत्र है लेकिन नई मिलों की बात तो दूर पुरानी मिलों के खुलने की भी संभावना नहीं दिख रही है। केद्र सरकार द्वारा संचालित प्रसिद्ध कटिहार जूट मिल वर्शों तक बंद रही। एक जमाने में यह एषिया की सबसे बड़ी जूट मिल थी। लंबी कवायद के बाद कुछ समय पहले इसकी कुछ यूनिटों को दोबारा चालू किया गया लेकिन भारी भ्रश्टाचार, मजदूरों की हकमारी और लालफीताषाही के कारण स्थिति फिर डांवाडोल हो गई है। दूसरी ओर बिहार सरकार द्वारा संचालित तमाम जूट मिलें दो-तीन दषक से बंद हैं। जिनमें से कई खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। समस्तीपुर में एक जूट मिल चालू तो है लेकिन इसकी भी स्थिति दयनीय है। एक जमाने में बड़े तामझाम से बैजनाथपुर (सहरसा) और दरभंगा में पेपर मिलें षुरू की गई थी। 

इसके लिए काफी जमीन अधिगृहित की गई और बड़े बड़े भवन बनाए गए लेकिन कुछ ही सालों के बाद दोनों फैक्ट्रियों पर ताले लग गए। बैजनाथपुर फैक्ट्री में पड़ी करोड़ों रूपये की मषीन को जंग खा रही है और भवन आदि भी धीरे धीरे ध्वस्त हो रहे हैं। सरकार इसे न तो खुद चालू करवा सकी और न ही निजी कंपनियों को सौंप सकी। दरभंगा स्थित अषोक पेपर मिल निजी हाथ में दिये जाने के बावजूद बार बार विवादों में फंसती रही और बार बार बंद होती रही। हाल में ही यह मिल हत्या के गंभीर कांड में उलझ गई है और इसके फिर से बंद होने की नौबत है। मालिक धरम गोधा पर मिल के बेषकीमती सामान चुराने के अलावा हत्या के आरोप हैं। जहां तक उत्तर बिहार के अन्य उद्योगों की बात है तो लगभग सभी की हालत खास्ता है। मधुबनी जिले के पंडौल स्थित सूत मिल को आज भी किसी उद्धारक का इंतजार है। उत्तर बिहार में मछली पालन और मखाना उद्योग की प्रचुर संभावनाएं हैं लेकिन इस दिषा में कुछ खास नहीं हो सका है। 

इन विडंबनाओं को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कुछ समय पहले नई औद्योगिक नीति बनाई थी लेकिन सवाल यह है कि अच्छी औद्योगिक नीति के बावजूद जमीन पर कोई बदलाव षक्ल क्यों नहीं ले सका ? विषेशज्ञों को कहना है कि इसके लिए लालफीताषाही, बुनियादी सुविधा का अभाव, राजनीितक इच्छााषक्ति की कमी और औद्योगिक संस्कृति का अभाव आदि मुख्य रूप से जिम्मेदार है। यह सही है कि मौजूदा सरकार ने उद्योगों के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं और छोटे उद्योगों में करोड़ों रूपये का पूंजी निवेष हुआ है। यह भी सच है कि औद्योगिक समूह अब रंगदारी, अनावष्यक राजनीतिक हस्तक्षेप, कमजोर कानून व्यवस्था आदि की षिकायतें नहीं करते। लेकिन भरपूर संभावना और नीतिगत सुधारों के बावजूद बड़े उद्योग नहीं लग रहे यह बेषक बिहारी आवाम के लिए चिंता का विशय है।

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