तकनीकी विकास ने समाज की हर गतिविधि को बदला है और पत्रकारिता भी इसमें शामिल है। प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रानिक मीडिया और इसके बाद अब साइबर मीडिया तक के सफर में पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे में काफी बदलाव आया है। साधनों या उपकरणों के बदलने से हर क्रिया बदलती ही है यह सृष्टि का एक नियम है। इस कारण पत्रकारिता में तकनीकी के कारण हो रहा बदलाव कोई अजूबा नहीं है।
आधुनिक पत्रकारिता का उदय लोकतंत्र के साथ हुआ और धीरे-धीरे यह गतिविधि लोकतंत्र का अनिवार्य पहलू बन गई। भारत में आधुनिक पत्रकारिता का जन्म उस समय हुआ जब देश विदेशी शासन के अधीन था। इस कारण यहां पत्रकारिता का विकास कुछ अलग ढंग से हुआ। ज्ञान का कोई भी रूप हो, बाद में वह कितने भी भौतिक लाभ और समृद्धि की कुंजी बना हो लेकिन उसकी शुरूआत में व्यवसायी करण का कभी कोई स्थान नहीं रहा। यह नियम अभियांत्रिकी से लेकर चिकित्सा विज्ञान तक के लिए लागू किया जा सकता है जबकि दुनिया में सबसे पहले प्रोफेशनल कोर्स इंजीनियरिंग और मेडिकल साइंस के ही बने। इस कारण गुलाम भारत में जब पत्रकारिता का प्रकाश पुंज फूटा तो जिन दीवानों ने इस गंगा का अवतरण किया उनके मन में यह बात होना तो दूर कि इससे लाभ क्या होगा वे तो इसे कुर्बानी की विधा मानकर और समझकर अपनाने की जुर्रत कर रहे थे। उनके मन में दीए की लौ के लिए अपने अस्तित्व को न्यौछावर करने वाले पतंगे की भावना थी और उनके संदर्भ में दीए की लौ थी देश को किसी भी कीमत पर आजादी दिलाने की कशिश। उस समय सरकार विरोधी लेख और समाचार लिखने की वजह से प्रेस कुर्क होने के साथ पत्रकार का सर्वस्व चला जाता था। इसके बाद भी वह अखबार निकालने के साहस से बाज नहीं आता था। जेल की यातनाएं भी उसे पत्रकारिता के रास्ते से विपथ नहीं कर पाती थीं। खैर आजादी के बाद पत्रकारिता में जुनून का यह तत्व धीरे-धीरे कम हुआ और कैरियर व व्यवसाय का आग्रह प्रबल होता गया लेकिन फिर भी कई दशकों तक गनीमत रही। बैनेट कोलमेन एंड कंपनी की दिनमान जैसी पत्रिका की प्रतिष्ठा चाहे जितनी ऊंची हो लेकिन वह व्यवसायिक रूप से घाटे की पत्रिका थी फिर भी साहू शांतिप्रसाद जैन को उसे निकालने पर गर्व था लेकिन उनकी तीसरी पीढ़ी आते-आते तक समीर जैन ने मुनाफे को सर्वोपरि मानते हुए पहले दिनमान के स्वरूप को बदला और इसके बाद भी जब कामयाबी नहीं दिखी तो उस पर ताला डाल दिया।
तकनीकी विकास के क्रम में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पहले अवतार में दूरदर्शन के समाचार आए जो सरकारी होने की वजह से मर्यादाओं से बंधे थे। इस बीच यह बहस छिड़ी कि लोकतंत्र में जानकारी देने का सबसे सशक्त माध्यम सरकारी शिकंजे में कैद रखा जाना कहां तक उचित है। इसके बाद तमाम किंतु परंतु के बीच निजी क्षेत्र को इलेक्ट्रानिक माध्यम से समाचार चैनल चलाने की छूट मिली। शुरू में जब दूरदर्शन पर ही आज तक और परख के लिए स्लाट एलाट कराए गए थे तब इलेक्ट्रानिक चैनल के क्षेत्र में निजीकरण का प्रयोग बेहद आकर्षक लगा था। लोगों को लगा था कि अब सरकार के लिए असुविधाजनक खबरों को दबाना मुश्किल होगा और सच्चाई जानने में उन्हें पहले से बहुत ज्यादा मदद मिलेगी। लोकतंत्र में पारदर्शिता का जरूरी गुण और निखरेगा वगैरह-वगैरह। अपने मयार तक पहुंचते-पहुंचते निजी इलेक्ट्रानिक चैनल कहां तक अपनी स्वच्छ तस्वीर को कायम रख पाए हैं यह आज सर्वविदित है। बीज रूप में इतना ही कहना उचित होगा कि सरकारी बंदिश से मुक्त होने के बाद भी पाठकों और दर्शकों के हितों की कसौटी पर इलेक्ट्रानिक समाचार चैनल शायद ही कभी खरे उतरे हों लेकिन आज जबकि दर्शकों का स्थान ग्राहकों ने ले लिया है तो वे बाहरी कारकों की पूरी तरह कठपुतली बन चुके हैं।
इसी आपाधापी के बीच तकनीकी विकास के एक और चरण के परिणाम स्वरूप साइबर मीडिया अस्तित्व में आई। तहलका डाट काम और कोबरा डाट काम ने अपना आगाज सत्ता के शीर्ष केेंद्रों में भूचाल पैदा करने वाली ताकत के साथ किया लेकिन शुरूआत में यह कल्पना नहीं थी कि निकट भविष्य में यह प्रयोग जन माध्यम के नए विकल्प के रूप में देखा जा सकेगा। तब नेट की उपलब्धता बेहद सीमित थी जिसकी वजह से महानगरों की हाईफाई सोसायटी तक ही डाट काम पत्रकारिता की पहुंच थी लेकिन वनजी से टूजी और थी्रजी तक का सफर इतनी जल्दी तय हुआ कि लोगों को पता ही नहीं चला। एंड्राइड मोबाइल की लांचिंग के बाद तो जैसे नक्शा ही बदल गया है। पोर्टल की पत्रकारिता आने वाले दिनों में पत्रकारिता की मुख्य धारा का स्थान लेती प्रतीत हो रही है। अब डाट काम की पत्रकारिता केवल राजधानियों और महानगरों तक सीमित नहीं रह गई जिलों तक में इसके प्रयोग हो रहे हैं और उन्हें स्वीकृति मिल रही है। पोर्टल पत्रकारिता कम पंूजी में भी संभव है। इस कारण प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के कारपोरेटीकरण के बाद जन पक्षधरता की इनमें एक भी प्रतिशत गुंजाइश पर जिस तरह से प्रश्नचिह्नï लग चुके हैं उसे देखते हुए डाट काम की पत्रकारिता लोगों के लिए और लोगों की असली पत्रकारिता बनेगी ऐसा ख्याल पैदा होना लाजिमी है। डाट काम की पत्रकारिता पर बाजार, पूंजी और साम्राज्यवादी शक्तियों का कोई दबाव नहीं है। सोशल मीडिया भी इसी के साथ जुड़ी हुई है। इस कारण यह पत्रकारिता नई बहसों को जन्म दे पा रही है। गुम हो चुके असल सरोकार इस पत्रकारिता ने फिर सतह पर ला दिए हैं। फिर भी इस पत्रकारिता को लेकर बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें संजो लेना भी उचित नहीं होगा। अभी तो तेल देखना है और तेल की धार देखना है। वैसे भी बहुत ज्यादा उम्मीदें नजर लगाने का काम करती हैं और ऊपर वाला न करे कि जन सरोकारों से जुड़ी जो एक संभावना मीडिया के क्षेत्र में पैदा हुई है उससे बहुत जल्द मोहभंग की स्थिति का सामना करना पड़े।
के पी सिंह
ओरई
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