चाहे पूंजीवाद और बाजारवाद हो या साम्यवाद चेतन अचेतन तौर पर यह धाराएं धार्मिक मुद्दों के प्रभाव को गौण करने वाली रहीं और लगा कि संसार नए दौर में यथार्थवादी हो चला है जिससे जज्बाती मुद्दों में अब कोई खास दम नहीं रह जाने वाला है लेकिन धर्म को लेकर मानव समाज में कोई ऐसी ग्रंथि जरूर है कि वह कुछ ही समय बाद फिर सर्वोपरि प्रासंगिक हो उठता है। इन दिनों मीडिया में धार्मिक मुद्दे छाए हुए हैं फिर बात चाहे अंतर्राष्ट्रीय पटल की हो या राष्ट्रीय पटल की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रमजान का महीना शुरू होने पर धार्मिक डिप्लोमेसी के तहत पाकिस्तान के अपने समकक्ष नवाज शरीफ को फोन करके बधाई क्या दे दी एक कुफ्र हो गया। घोषित तौर पर तो संघ परिवार के लोग इसे लेकर कुछ नहीं कह रहे लेकिन खबर यह है कि अंदर ही अंदर मोदी का यह कदम उन्हें बुरी तरह कचोट रहा है। कल तक जो मोदी रोजा अफ्तार में शिष्टाचार के तौर पर टोपी पहनने तक से इनकार कर देते थे और पिछली बार यह तक चर्चा फैल गई थी कि मोदी ने देश के मुसलमानों को ईद मुबारक नहीं कहा। वही मोदी भारत के दुश्मन राष्ट्र का इतना लिहाज क्यों कर बैठे कि उनके समर्थक छले जाने की अनुभूति करने को अपने को मजबूर पा रहे हैं। संघ परिवार को पहले से ही यह तो एहसास होने लगा था कि मोदी को ज्यादा पंख लग रहे हैं लेकिन अब उसका संयम टूटने लगा है।
अयोध्या मुद्दे पर मोदी ने संघ परिवार को मना लिया था कि फिलहाल वह कुछ वर्ष शांति से विकास के एजेंडे पर कार्य करने की मोहलत देने के लिए इस मुद्दे को लेकर मोदी सरकार को धर्मसंकट में डालने से बचेगा लेकिन वाराणसी में चल रही संघ की उच्च स्तरीय बैठक में सरसंघ चालक मोहन भागवत ने अल्टीमेटम दे दिया है कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के पहले अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर बनाने के लिए केेंद्र सरकार को कोई न कोई ठोस कदम जरूर उठाना पड़ेगा। संघ परिवार के रुख में अचानक आई इस तब्दीली के पीछे कहीं न कहीं मियां नवाज शरीफ को उनके द्वारा रमजान की मुबारकवाद देने की चिढ़ जरूर है। मुहम्मद अली जिन्ना की भारत के सबसे बड़े खलनायक की छवि को तथ्यों के आधार पर अतिरंजित साबित करने का प्रयास संघ परिवार को इतना नागवार गुजरा था कि उसके बाद संघ की वजह से उनका राजनीतिक कैरियर ही खत्म हो गया और उन्हें संघ परिवार ने जबरिया राजनीति से रिटायरमेंट जैसा दिला दिया है। साफ है कि कुछ मुद्दों पर संघ कोई समझौता न करने की आन ठाने रहता है। अयोध्या मुद्दा भी उनमें से एक है। इसी कारण संघ परिवार में मोदी की उलटी गिनती शुरू होने का आभास मिलने लगा है।
यह एक अलग बात है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनवाने के आग्रह के पीछे धर्म कितना और दूसरी चीजें कितनी। रामचरित मानस में लिखा गया है कि हरि अनंत हरि कथा अनंता। साथ साथ में यह भी लिखा गया है कि जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूरत देखी तिन तैसी। रामचंद्र जी को उनका हर भक्त अपनी वर्ग चेतना के हिसाब से देखता है। कुछ लोगों को रामचंद्र जी इसलिए पसंद हैं कि जनभावनाओं को ठेस न लगने देने के लिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सीता के परित्याग का फैसला उस समय लिया जब वे गर्भवती थीं। निजी तौर पर भी रामचंद्र जी के लिए यह बहुत कष्टप्रद फैसला था। लोग चाहते हैं कि शासन चलाने वालों में रामचंद्र जी जैसा ही त्याग होना चाहिए। वे जनभावनाओं को सर्वोपरि महत्व दें और उस पर आंच न आने देने के लिए जीवन में कितने भी बड़े फैसले को लेने को तैयार रहें। शायद रामराज को लेकर उनका जो विंब है वह राम द्वारा प्रतिपादित इसी परंपरा पर आधारित है। दूसरी ओर एक वर्ग उन्हें घर परिवार की मर्यादाओं का पालन करने का मानक मानता है। पिता के आदेश की अवज्ञा का पुत्र के जीवन में कोई स्थान नहीं है। इस आदर्श को स्थापित करने के लिए राम ने उनके कहने पर राजपाठ छोड़कर वनवास में जाने का फैसला एक क्षण में सहर्ष कर लिया। भाइयों से संबंध निर्वाह में भी उन्होंने उदाहरण स्थापित किया।
प्रजा के साथ उनकी वत्सल भावना ही कुछ लोगों को सबसे ज्यादा सुहाती है और इसलिए वे उनसे अगाध श्रद्धा करते हैं लेकिन दुुर्भाग्यवश एक वर्ग ऐसा भी है जो राम कथा के जिस प्रसंग से सबसे ज्यादा प्रेरित होता है वह शंबूक वध का प्रसंग है। सामाजिक रूप से हाशिए पर फेेंकी गई जातियों के लिए संघ परिवार में दया न हो यह बात नहीं है लेकिन संघ परिवार की मानसिकता का निर्धारण करने वाली संस्थाएं और व्यक्ति आज भी यह मानती हैं कि वर्णाश्रम धर्म का पालन इन जातियों को करना चाहिए। यह उनके लिए बाध्यकारी धर्म है। इसमें उनको छूट नहीं दी जा सकती। शंबूक के वध की नौबत आती है तो यह स्वयं उसी के द्वारा अपने लिए रचा गया दुर्भाग्य था। संघ परिवार द्वारा अघोषित तौर पर चारों धाम से भी ऊपर धार्मिक स्थल अयोध्या में राम मंदिर के रूप में बनवाने के पीछे कौन सी वर्ग चेतना काम कर रही है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आखिर सतयुग तो तभी आएगा जब सारे वर्ण अपने अपने धर्म का पालन करेंगे। संघ परिवार के केेंद्र में सत्ता में पहुंचने से सतयुग के अनावरण का मंच तो तैयार हो गया है लेकिन अब कुछ और ठोस महत्वपूर्ण अनुष्ठान होने हैं। अयोध्या में राम मंदिर अब नहीं तो कभी नहीं। यह संघ परिवार का अघोषित नारा है।
भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी भी किसी सिंहासन बत्तीसी से कम नहीं है। जब तक कोई नेता इस कुर्सी तक नहीं पहुंचता वह समझ सकता है कि यह एक धार्मिक राष्ट्र है लेकिन उक्त कुर्सी पर पहुंच जाने के बाद वह इस राष्ट्र की अत्यंत नैसर्गिक धर्म निरपेक्ष ग्रंथि के तहत काम करने को अपने को स्वत: स्फूर्त ढंग से प्रेरित पाता है। अकेला मियां नवाज शरीफ को रमजान मुबारक कहने का आचरण ही नहीं है मोदी का आचरण पिछले एक साल में भारतीय राज्य की धर्म निरपेक्ष प्रकृति के अनुरूप व्यवस्थित हुआ है। मोदी की संघ के साथ अब शुरू हुई असली मुश्किलों का अंजाम कहां पहुंचेगा अभी इस बारे में सिर्फ अटकलें ही लगाई जा सकती हैं।
दूसरी ओर पाकिस्तान जिसके जन्म में ही इस्लामिक नजरिए के मुताबिक कुफ्र जुड़ा हुआ है क्योंकि इस्लामिक मान्यता के अनुसार मक्का मदीना पवित्रता के मामले में अतुलनीय है और किसी अन्य क्षेत्र को सर्वोच्च पवित्र दर्शाने के लिए उसका नामकरण पाकिस्तान करना बहुत बड़ा धार्मिक गुनाह है। उसी पाकिस्तान ने फिर एक बार इस्लाम के प्रति अपने जेहादी कर्तव्य से उस समय समझौता कर लिया जब इस रमजान के महीने की शुरूआत में चीन ने यह घोषित किया कि उसके मुस्लिम बाहुल्य प्रांत में मुसलमान अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक और छात्र रोजा नहीं रख सकेेंगे। इस्लाम में मुसलमानों के लिए तय किए फर्ज से जब उन्हें रोका जाए तो कुरान कहता है कि मुसलमानों को ऐसे निजाम के खिलाफ जेहाद के लिए तैयार हो जाना चाहिए। अपने को इस्लाम का स्वयंभू रक्षक बताने वाले पाकिस्तान ने जो कि जेहाद का बहुत बड़ा सप्लायर भी है चीन के खिलाफ जेहाद क्यों नहीं बोला। क्या उसका जेहाद धार्मिक न होकर सियासी जेहाद है। शायद ऐसा ही है इसीलिए उसका जेहाद दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश भारत और मुस्लिम बाहुल्य देश अफगानिस्तान के लिए होता है। अतीत में उसका जेहाद अपने ही हिस्से में शामिल पूर्वी बंगाल के लिए था जो पाकिस्तान के विभाजन का कारण बना। न अयोध्या में धर्म है और न ही पाकिस्तान में।
कुछ पक्ष सियासी धर्म निभा रहे हैं अध्यात्मिक धर्म नहीं। आईएसआईएस को भी चीन का गुनाह नजर नहीं आया लेकिन सीरिया में दो मासूम किशोरों को रमजान में रोजे न रखने की वजह से सूली पर लटका कर उसने इस्लाम के सबसे बड़े सेनापति के बतौर अपनी पीठ खुद ही थपथपा ली है। आधुनिक संस्थाएं सियासी घालमेल के धर्म को खतरनाक समझकर शुरूआत से ही इनके प्रभाव को सीमित करने का प्रयास करती रहीं। हालांकि इसके साथ साथ तात्विक धर्म का प्रभाव भी कम हुआ जिससे सारे संसार में मर्यादा हीनता और नैतिक विहीनता को बढ़ावा मिला। आज इसीलिए जरूरत महसूस की जा रही है कि धर्म का तात्विक स्वरूप जो मौलिक रूप में सभी पंथों में एक जैसा है को फिर से बलवती किया जाए लेकिन धार्मिक चेहरा लगाकर की जाने वाली सियासत को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त न किया जाए। इस समझदारी के तहत धर्म के पुनरुत्थान के प्रयास से एक नई दुनिया उभरेगी जिसमें मुनाफे के लिए कुछ भी करने का उत्साह शांत होगा और सात्विक समाज की पुनस्र्थापना होगी। क्या इस दिशा में आगे बढऩे के लिए आम लोग तैयार हैं।
के पी सिंह
ओरई
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें