यादों के झरोखे की एक परत : विश्वनाथ प्रताप सिंह - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 25 जून 2015

यादों के झरोखे की एक परत : विश्वनाथ प्रताप सिंह

वीपी सिंह दरअसल किसी आम भारतीय नेता की तरह नौटंकीबाज थे... सियासी मजबूरियों ने उनसे ऐसा ऐतिहासिक काम करा लिया, जिसे वर्षों पहले हो जाना चाहिए था....मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के उनके ऐलान ने देश के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण को हमेशा के लिए बदल दिया......उन बदले समीकरणों के कारण उभरे तमाम नेताओं में मुझे लालू प्रसाद सबसे ज्यादा पसंद हैं ( जो घोषित भ्रष्टाचारी हैं , परिवारवाद फैलाते हैं जबकि बाकी सब सदाचारी हैं और उनका परिवार ही नहीं है ) 

जिन्हें वीपी के दलितों और पिछड़ों के हितैषी होने का भ्रम हो, वे मुलायम सिंह यादव से बतिया लें या यूपी विधानसभा में चौधरी चरण सिंह के शिष्य मुलायम सिंह यादव के उन भाषणों पर नजर डाल लें, जो उन्होंने वीपी के सीएम रहते हुए दिए थे.....मुलायम ने कहा था कि वीपी सिंह पिछड़े वर्ग के लोगों को फर्जी एनकाउंटर में मरवा रहे हैं और गुंडई कर रहे कथित बड़ी जाति के लोगों का साथ दे रहे हैं.....इस मुद्दे पर तीखे विरोध को देखते हुए कांग्रेस को आखिरकार वीपी को सीएम पद से हटाना पड़ा था...

मंडल आयोग की सिफारिशों के ऐलान के वक्त मैं गोरखपुर के सेंट एंड्र्यूज कॉलेज में बीएससी के पहले साल में था....रहता था लेकिन गोरखनाथ मंदिर के दिग्विजय नाथ डिग्री कॉलेज वाले प्रताप आश्रम में ......... तो वीपी के गोरखपुर आने का कार्यक्रम बना .......... प्रताप आश्रम के संघियों के नेतृत्व में मैं और मेरे जैसे सैकड़ों छात्र गोलघर में पुलिस से उलझ पड़े....दौड़ादौड़ी, ढेलहाव, लाठीचार्ज..तेल टैंकर में आगजनी............कचहरी मैदान ( अब वहां का मैदान विकास की भेंट चढ़ चुका है ) में जनसभा स्थल से लेकर गोलघर तक युद्ध सा छिड़ा था...गोरखपुर विश्वविद्यालय के कई छात्र रात में ही पकड़े जा चुके थे.... ( आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो भरोसा नहीं होता कि मैं वीपी के काफिले को पायलट कर रही कार पर पत्थर फेंक रहा था )

बाद में घर पर पापा की डांट पड़ी और उन्होंने वह सब बताया, जो बाद में प्रोफेसर तुलसीराम की मुर्दहिया में मैंने लगभग जस का तस पढ़ा.....हालांकि मुर्दहिया के सामने आने तक मैं उसे महसूस करने की क्षमता पा चुका था...जहर हालांकि खत्म हो चुकने का दावा करने के लिए अभी कई इम्तिहान देने होंगे.....



akhilesh pratap singh

अखिलेश प्रताप सिंह 
पत्रकार, दिल्ली 

कोई टिप्पणी नहीं: