- क्षमा और सम्मान
हिन्दी के विश्रुत साहित्यकार विष्णु प्रभाकर (1912-2009) को वर्ष 2004 में पùभूषण अलंकरण से सम्मानित किया गया था। 26 जनवरी 2005 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में वे भी आमंत्रित थे। प्रभाकरजी अपने पुत्र के साथ राष्ट्रपति भवन पहुँचे तो राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों ने उनके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार नहीं किया। राष्ट्रपति के द्वार से अपमानित लौटकर उन्होंने पùभूषण लौटाने की पेषकष कर डाली। उन्होंने यह भी कहा कि यह उनका नहीं, राष्ट्रभाषा हिन्दी का अपमान है।
उस समय भारतरत्न डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम राष्ट्रपति थे। घटना की जानकारी होते ही राष्ट्रपति ने वाहन भेजकर ससम्मान प्रभाकरजी को बुलाया। राष्ट्रपति के आग्रह को मान देकर प्रभाकरजी राष्ट्रपति भवन गये। राष्ट्रपति ने उनसे क्षमा मांगी। प्रभाकरजी के साहित्य से लगाव दिखाते हुए उनके साहित्य पर देर तक बातचीत की। पùभूषण नहीं लौटाने के लिए कहा। प्रभाकरजी सहमत हुए। एक अप्रिय प्रसंग का प्रीतिकर समापन हुआ।
प्रभाकर का लेखकीय आत्म-सम्मान और कलाम की राजकीय विनम्रता ने मिलकर साहित्य और सŸाा के अन्तःसम्बन्धों की नई आचार-संहिता रची। जबकि ऐसे मामलों में संवाद तो दूर, संज्ञान लेना भी आवष्यक नहीं समझा जाता है। इस प्रसंग में राष्ट्रपति ने आगे बढ़कर अपने ही विपक्ष में न्याय दिया और उस ‘गलती’ के लिए क्षमा मांगी, जो उन्होंने की ही नहीं थी। यह प्रसंग सŸााधारियों के लिए एक प्रेरणा है कि उनकी जवाबदेही कितनी दूर तक होनी चाहिये।
- डाॅ. दिलीप धींग (एडवोकेट)
(निदेशक: अंतरराष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन व शोध केन्द्र)

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