विशेष : संसदीय लोकोपचार: मत से मनभेद तक - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

विशेष : संसदीय लोकोपचार: मत से मनभेद तक

भारतीय लोकतंत्र की विडंबना है की भारत के गरीब जनता के गाढ़ी कमाई को इस देश के नेता अपनी अहम की पूर्ति के लिए फूकते नही शर्माते है . न्याय की परिभाषा है की चाहे अनेको गुनाहगार छुट जाए किन्तु एक वेगुनाह को सज़ा नही मिलनी चाहिए. इतना ही नही गुनाहगार को भी भारत की न्याय प्रणाली इतनी मोहलत देती है की वह हर पहलु से अपनी वेगुन्हाई सिद्ध कर सकता है .किन्तु लोकतंत्र के मंदिर में बिगत तीन दिनों से जो हो रहा है वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंतनीय और निन्दनीय है.लोकतंत्रीय परम्परा का तकाजा रहा है की हर विषम से विषम मुद्दे पर भी बातचीत और सार्थक बहस एक ऐसा माध्यम है जो हल करने का जरिया रहा है.
लोकतंत्र में विपक्ष ही लोकतंत्र का रक्षक होता है जो सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगाने में सक्षम  है.किन्तु वर्तमान सत्र में विपक्ष का रवैया अत्यंत निराशाजनक है. आज भी कांग्रेस पार्टी अपनी तानाशाही और निरंकुश प्रवृति से अपने आपको नहीं निकाल पाई है.यह पार्टी सत्ता में रहते इस देश को आपातकाल की दलदल में धकेला और अब विपक्ष के रूप में भी यह अपने निरंकुश तरीको से लोकतंत्र को शर्मसार कर रही है.कांग्रेस पार्टी किस कदर भारतीय जनता पार्टी से अर्धविक्षिप्त की तरह व्यबहार कर रही है उसका वानगी संसद में उस दिन देखने को मिला जब संसद में देश के प्रधान मंत्री शिष्टाचार के तहत खुद काग्रेस की अध्यक्षा से उनके आसन के पास मिलने और उनका हालचाल पूछने पहुचे तो कांग्रेस अध्यक्षा की प्रतिक्रिया अत्यंत खेदजनक और भारत की महान परमपरा के विपरीत थी.

लोकतंत्र में स्वाभाविक है की मत एक दुसरे दलों के भिन्न होते हैं किन्तु मन एक होता है और ऐसा कहा भी जाता रहा है की “दिल मिले या ना मिले दोस्ती बनाये रखिये” . देश के सांसद सामान्यत: इसमें विश्वास भी रखते है और आज तक करते भी आये है किन्तु देश का दुर्भाग्य है की अपने आपको देश की सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी कहने वाली कांग्रस के अध्यक्ष आज तक भारत की महान परम्परा को आत्मसात नही कर सकी है ? राजनीति मतभेद को व्यक्तिगत मतभेद के रूप में देखना कांग्रेस की निरंकुश कार्यपद्यति का परिचायक है.क्या भारत का लोकतंत्र आज भी शैशवावस्था से गुजर रहा या विपक्ष अपने उत्तरदाइत्व से कन्नी काट व्यक्तिचारण में गोते लगा रहा है? 

दशकों तक सत्ता का स्वाद चखने बाली पार्टी कांग्रेस और विना प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए देश के सारे लोकतंत्रीय पद्यति को अपने जुती के नोक पर रखने तथा अपने परिवार और अपने लिए सारी सुख सुविधाए भोगती रही कांग्रेस की अध्यक्षा  का दर्द प्रधानमंत्री के प्रति उनका असंसदीय तेवर से पता चलता है .कांग्रेस अध्यक्षा की यह आचरण उनके उस भाव को प्रदर्शित करती है की कल तक ऐसे प्रधानमन्त्री को अपनी इशारों पर नचाया करती तो आज भी तो वैसा ही भारत का प्रधानमन्त्री होगा ? आखिर क्यों नही कांग्रेस अब भी समझ पा रही है की लोकतंत्र ने उसे सिरे से खारिज कर दिया है और उसे अभी और परिपक्व होना होगा. राज्य सभा में संख्या के बल पर जो अकड कांग्रेस दिखा रही है अगर अपने को तानाशाही दलदल से नही निकला तो राज्यों में भी और दुर्गति इसे झेलनी ही होगी.

संसद में जिस लोकोपचार की मिसाल पेश करते हुए देश के प्रधानमन्त्री कांग्रेस अध्यक्षा से मिले और उनसे मिले प्रतिक्रिया का ही वीभत्स रूप उनके अनुआइओ ने संसद के दोनों सदनों में अबतक देखने को मिल रहा है. जिस तरह से ललितगेट मुद्दा ,मध्यप्रदेश के व्यापम मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही को बाधित कर रहा है वह तानाशाही प्रवृति का सूचक है. सरकार विपक्ष के हर मुद्दे पर बहस को तैयार है किन्तु कांग्रेस विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफे के बाद चर्चा को तैयार होने की बात कह संसद में हंगामा खड़ा किये हुए है. लोकसभा काली पट्टी और प्ले  कार्ड का अड्डा बना हुआ है .आखिर न्याय की कौन सी परिभाषा है जो आरोपी को बगैर अपनी वेगुनाही साबित करने का समय दिए विना एकतरफा फैसला सुनाने का अधिकार देता है ?

जब सरकार हर मुद्दे पर बात करने को तैयार है तो फिर चर्चा से मुंह छिपाकर कांग्रेस क्यों भाग रही है ?चर्चा और तथ्यों के आधार पर ही निर्णय होते है.ये न्याय की प्राकृतिक अवधारणा है. किन्तु जो पार्टी दशकों तक तानाशाही और निरंकुशता में डूवी हो उसके लिए तो अपने आका का हुकुम ही सर आँखों पर होती है.जिसने परिवार से आगे आजतक नही सोचा उस कांग्रेस से लोकतंत्र के प्रति आस्था की बात करना हास्यास्पद है. कांग्रेस के दिग्गज महारथियो को कुचलते हुए अपने औसत बुद्धिमान पुत्र को राजतिलक करने बाली कांग्रेस अध्यक्षा से लोकतंत्र के प्रति विशवास की  चाहत रखना वालू से तेल निकालने के सामान है .

आज कांग्रेस अध्यक्षा जिस हताशा में है एक माँ के रूप में उचित भी है? एक तो बेटा हर मोर्चे पर असफल हो रहा तो दुसरे दामाद के कारनामे रातों की नींद उड़ा रखी हो ऐसे में उनका व्यबहार लोकतंत्र के लिए तो घातक हो सकती किन्तु माँ के लिए जायज है.हर माँ की तमन्ना होती है की उसका बेटा और दामाद दिन दुनी रात चौगनी आगे बढे किन्तु जिस तरीको का इस्तेमाल वह कर रही वह निंदनीय चिंतनीय और लोकतंत्र को शर्मसार कर रही है .भारत सदियों से भाट-चारणों की परम्परा से त्रस्त रहा और आज भी राजनितिक में इस दुष्प्रवृति को देखा और समझा जा सकता है, भारतीय लोकतंत्र का तकाजा है की ऐसे तानाशाही प्रवृति के पोषकों से देश का कितना भला हो सकता यह सोचने का समय अब आ गया है . 

भ्रष्टाचार और परिवार के दलदल में आकंठ डुबा कांग्रेस देश को जितना नुक्सान पहुचाया उतना मुगलों और अंग्रेजो ने भी नहीं किया किन्तु आज भी कांग्रेस जिस तरह से अकड दिखा रही है वह देश की नैतिकता को तारतार करती है है,अभी भी समय है की कांग्रेस अपनी गलतिओं की और झांके और अपने अस्तित्व को लोकतंत्र में मत भेद को स्वीकार कर मनभेद से अपने आपको निकाले अन्यथा कांग्रेस की भी दुर्गति अब डाइनासोर की तरह ही होने वाली है. संसद में वैचारिक चर्चा के द्वारा सरकार के हर नाकामिओ को जनता के सामने उजागर कर कांग्रेस अपनी विश्वसनीयता को बनाए.आज भी कांग्रेस में अच्छे और सुलझे राजनीतिक लोग है किन्तु कांग्रेसी जो परिवार के गिरोह में फंसा है. उसे उससे निकलना होगा. कांग्रेस का नेतृत्व नेहरु गान्धी परिवार से मुक्ति की छटपटाहट में है और समय रहते नही हुआ तो राज्य सभा में भी इसकी वही दुर्गति होगी जो आज लोकसभा में है. 




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संजय कुमार आजाद 
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