धरती पर होने वाले सबसे बड़े धार्मिक समागमों में से एक, सिंहस्थ कुंभ मेला। इसके लिए बड़ी संख्या में साधु-संत और श्रद्धालु नासिक पहुंच गए है तो कुछ पहुंचने वाले हैं। कुंभ के दौरान श्रद्धालु गोदावरी नदी में पवित्र स्नान करते हैं। हर 12 वर्ष के अंतराल पर हिंदू कैलेंडर के अनुसार, माघ माह में जब सूर्य और बृहस्पति एक साथ सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तब नासिक-त्रयम्बकेश्वर मे कुंभ मेला आयोजित किया जाता है। शाही स्नान नासिक में 29 अगस्त, 13 सितंबर और 18 सितंबर को होगा, जबकि त्रयम्बकेश्वर में 29 अगस्त, 13 सितंबर और 25 सितंबर को होगा। सिंहस्थ 2015 का पहला शाही स्नान रक्षा बंधन यानी सावन की पूर्णिमा को होगा, तारीख होगी 29 अगस्त। दूसरा शाही स्नान 13 सितंबर अमावस्या को और तीसरा शाही स्नान 18 सितंबर को ऋषि पंचमी के पर्वकाल में वैष्णव बैरागी संत करेंगे। शैव संन्यासी वामन जयंती पर 25 सितंबर को त्र्यंबकेश्वर के कुशावर्त कुंड पर गोदावरी के पवित्र जल में तीसरे शाही स्नान की डुबकी लगाएंगे। तीनों शाही स्नानों के अलावा कई पर्व दिवसों के पुण्यकाल में 8 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु गोदावरी की पवित्र धारा में डुबकी लगाएंगे
बारह साल से जिस पल का इंतजार था वह आ गया। देव गुरु ग्रंथ वृहस्पति एक बार फिर सिंह राशि में पहुंच गए। इसी के साथ त्रयंबकेश्वर नासिक में झलकने लगी अमृत की बूंदे। शुरु हो गया दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान। जहां धरती के सबसे बड़े समागम में देश के हजारों-लाखों श्रद्धालु गोदावरी में डुबकी लगाकर श्रद्धा का अमृत चखने को बेकरार है। हजारों-लाखों श्रद्धालु डुबकी लगा चुके है तो हजारों-लाखों को अपनी बारी आने का इंतजार है। ऐसा माना जाता है कि देश में जिन चार जगहों पर महाकुंभ लगता है उसमें नासिक का कुंभ सबसे अलग है। ऐसा इसलिए कि नासिक के महाकुंभ को सिंहस्थ कुंभ यानी कुंभों का राजा माना जाता है। इसीलिए इसे सिंहस्थ कुंभ के नाम से जाना जाता है। भारतीय पंचांग के अनुसार सूर्य जब कुंभ राशि में होते है, तब इलाहाबाद में कुंभमेला लगता है और सूर्य जब सिंह राशि में होते है, तब नासिक में सिंहस्थ होता है। यह मेला बारह साल में एक बार लगता है। मेले में पहुंचे लाखों श्रद्धालु गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र नदी में स्नान करने से आत्मा की शुद्धि और पापों से मुक्ति मिलती है। यह कंुभ मेला 25 सितंबर तक चलेगा। इस ढाई महीने में 8 करोड़ लोगों के स्नान की संभावना है।
जीवन में आत्मज्ञान, एश्वर्य, आरोग्य, सुख एवं अमरत्व की कामना के लिए किया जाता है कुंभ स्नान। वेदों-पुराणों में शरीर को कुंभ का प्रतीक माना गया है। यानी शरीर रुपी कुंभ से आत्मारुपी कुंभ की प्राप्ति। और यही है कुंभ का आध्यात्मिक महत्व। समुद्र मंथन से निकला था अमुत और जब देवताओं और अशुरों में इसे लेकर छीनाझपटी हुई तो कुंभ से अमृत की कुछ बूंदे धरती पर भी छलकी थी। जहां-जहां अमृत की बूंदे गिरी वहां-वहां लगने लगा कुंभ का मेला। कुंभ में स्नान-दान और जप-तप का बड़ा महत्व है। नासिक कुंभ में पहला शाही स्नान स्रवण शुक्त तृतीया यानी 17 अगस्त को है। सूर्य के सिंह राशि में आने पर गोदावरी नदी में स्नान की विशेष महिमा है। इस दिन सुबह 4 बजकर 43 मिनट पर स्नान-दान का पहला पूण्यकाल होगा। दुसरा स्नान स्रावणी पूर्णिमा 29 अगस्त को है। इस दिन स्नानकाल सुबह 4 बजकर 50 मिनट पर है। इस दिन तमाम श्रद्धालुओं के साथ साधु-संत भी स्नान करेंगे। तीसरा स्नान शाही स्नान 13 सितंबर को होगा। इसी दिन साधु-संतो ंके अखाडों की शाही यात्रा निकलेगी। चैथा एवं अंतिम स्नान भाद्र पक्ष तृतीया यानी 16 सितंबर को होगा। हरितालिक तीज को होने वाले इस स्नान में वैष्णव एवं खालसा अखाड़ों का स्नान होगा। कुम्भ महोत्सव पौष मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होता है। कुम्भ महोत्सव प्रत्येक चैथे वर्ष नासिक, इलाहाबाद, उज्जैन, और हरिद्वार में बारी-बारी से मनाया जाता है। प्रयाग कुम्भ विशेष महत्व रखता है। प्रयाग कुम्भ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। हरिद्वार में कुम्भ गंगा के तट पर और नासिक में गोदावरी के तट पर आयोजित किया जाता है।
पहले कुम्भ को एक अवसर कहा जाता था लेकिन समय बीतने के साथ इसने एक महोत्सव का आकार ले लिया है। यह एक ऐसा धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, जो पूरी दुनिया पर एक छाप छोड़ देता है, इस तरह का पर्व जो एक धर्म और संस्कृति के बारे में सोचता है। इस तरह का एक पर्व जिसकी संस्कृति विष्णुपदी गंगा है। पहले, इस पर्व का आकार छोटा था, लेकिन अब 12वीं सदी से यह पर्व सबसे बड़े पर्व में विकसित हो गया है। कुम्भ या अर्धकुम्भ कोई साधारण पर्व नहीं है, यह ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का पर्व है। इस पर्व में धार्मिक माहौल बड़ा ही अनुपम होता है। आप जिस भी शिविर में जायेंगे यज्ञ (धार्मिक बलिदान) के धुएं के बीच में वेद मंत्रों की आवाज सुनाई देती है। व्याख्या, पौराणिक महाकाव्य, प्रार्थना, संतों और साधु के उपदेश पर आधारित नृत्य महमोहक होते हैं। अखाड़ों की पारंपरिक जुलूस, हाथी, घोड़े, संगीत वाद्ययंत्र के बीच नागासंतों के शाही स्नान में तलवार (शाहीस्नान), घुड़-दौड़ लाखों भक्तों को आकर्षित करती है। इस पर्व में विभिन्न धर्मों के धर्म-मुखिया हिस्सा लेते हैं। यह लाखों कलाकारों के अत्यंत भक्ति का पर्व है। गरीबों और असहायों के भरण-पोषण की व्यवस्था यहां उचित ढंग से लिए जाती है। गंगा इस पर्व में सभी की मां हैं और सभी उसके बेटे हैं। ‘गंगेतवदर्शनातमुक्ति’ इस भावना के वशीभूत होकर ही यहां इतनी भारी भीड़ एकत्रित होती है और इस पवित्र पर्व का आयोजन नासिक की पावन भूमि पर होता है। खासियत यह है कि यह पर्व ईंटों और पत्थरों के घरों में नहीं बल्कि रेत पर आयोजित किया जाता है। यह पर्व टैंटों के घरों के साथ मनाया जाता है। यह मानव भक्ति की एक कठिन परीक्षा है। लोग पवित्र मन और पुण्य की भावना के साथ आते हैं। पाप का स्वतः ही अंत हो जाता है। यहां गायदान, सोने का दान, गुप्तदान-भेंट, पितृ के लिए दान सहित सभी दान का प्रावधान है।
पौराणिक मान्यता
कहा जाता है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नासिक जाकर संतों को उज्जैन सिंहस्थ आने का न्योता देने की परंपरा है। यह परंपरा 273 साल पहले उस समय के शासक राणोजी शिंदे संतों को न्योता देने नासिक गए थे। तब से ये परंपरा जारी है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष आने वाले शिवरात्रि के त्योहार को भी यहां बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हजारों की संख्या में आए तीर्थयात्री इस पर्व को भी पूरे उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं। मेले का आयोजन मुंबई से लगभग 175 किलोमीटर उत्तर मंदिरों की नगरी नासिक व त्रयंबकेश्वर में होता है। श्री त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे है। यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहां केवल भगवान शिव नहीं बल्कि भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा भी विराजमान हैं। इसीलिए त्रयंबकेश्वर को तीन नेत्र वाले ईश्वर यानी त्रिदेव, ज्योतिर्लिंग मंदिर कहा जाता है। जहां से गोदावरी नदी का उद्गम माना जाता है।.यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला एवं समस्त कष्ट को हरने वाला है। प्राचीनकाल में त्रयंबक गौतम ऋषि की तपोभूमि थी। मान्यता है कि एक बार गौतम ऋषि पर षड्यंत्र कर अन्य ऋषियों ने उन्हें गोहत्या में फंसा दिया, तब ऋषि गौतम ने भगवान शिव का पार्थिव लिंग बना कर उपासन की। गौतम की तपस्या से शिव ज्योति रूप से प्रकट हुए तो उन्होंने भगवान शिव से गंगा को यहां अवतरित करने का वरदान मांगा। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ और उन्हें उनके सारे पाप दूर हो गए। त्रयम्बकेश्वर भारत के सबसे ज्यादा पवित्र माने गए स्थलों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि अगर व्यक्ति त्रयम्बकेश्वर जाएं तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर की भव्य इमारत सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के अंदर गर्भगृह में प्रवेश करने के बाद शिवलिंग की केवल आर्घा दिखाई देती है, लिंग नहीं। गौर से देखने पर आर्घा के अंदर एक-एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन लिंगों को त्रिदेव- ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। भोर के समय होने वाली पूजा के बाद इस आर्घा पर चांदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है।
महर्षि गौतम से जुड़ी है गोदावरी नदी की कथा
पौराणिक कथानुसार एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियां किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपकार करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान श्रीगणेशजी की आराधना की। उनकी आराधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहा। उन ब्राह्मणों ने कहा- प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें। उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर मांगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे। अंततः गणेशजी को विवश होकर उनकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हांकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। इससे वहां हाहाकार मच गया। सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भत्र्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दुःखी थे। अब उन सारे ब्राह्मणों ने कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहां से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। वे कहने लगे-गो-हत्या के कारण तुम्हें अब वेद-पाठ और यज्ञादि के कार्य करने का कोई अधिकार नहीं रह गया। अत्यंत अनुनय भाव से ऋषि गौतम ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय बताएं। तब उन्होंने कहा- गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहां एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद ब्रह्मगिरी की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहां गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगरी की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा। ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम वे सारे कार्य पूरे करके पत्नी के साथ पूर्णतः तल्लीन होकर भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा- भगवान मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें। भगवान शिव ने कहा- गौतम! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छलपूर्वक लगाया गया था। छलपूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ। इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु! उन्हीं के निमित्त से तो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अब उन्हें मेरा परमहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें। बहुत से ऋषियों, मुनियों और देवगणों ने वहां एकत्र हो गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान शिव से सदा वहां निवास करने की प्रार्थना की। वे उनकी बात मानकर वहां त्रयंब ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए। गौतमजी द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहां पास में गोदावरी नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।
कुशावर्त तीर्थ की महत्ता
कुशावर्त तीर्थ की जन्मकथा काफी रोचक है। कहते हैं ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बांध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़े इसी कुंड में शाही स्नान करते हैं। शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्रयंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। भक्त भोर के समय स्नान करके अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। यहां कालसर्प योग और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना भी होती है, जिसके कारण यहां सालभर लोग आते रहते हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मगिरि पर्वत के ऊपर जाने के लिये चैडी-चैड़ी सात सौ सीढियां बनी हुई हैं। इन सीढिंयों पर चढ़ने के बाद रामकुण्ड और लष्मणकुण्ड मिलते हैं और शिखर के ऊपर पहुंचने पर गोमुख से निकलती हुई भगवती गोदावरी के दर्शन होते हैं। इस सुंदर मंदिर की छटा दूर से ही देखते बनती है। इसे देखकर ऐसा लगता है कि मानों इसने कई सालों का इतिहास अपने अंदर दबाकर रखा हुआ है। त्रयंबकेश्वर मंदिर काले पत्थरों से बना है। मंदिर का स्थापत्य अद्भूत है। इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे, जो उस समय काफी बड़ी रकम मानी जाती थी। इस भव्य मंदिर में पूर्व की ओर सबसे बड़ा चैकोर मंडप है। इसके चारो ओर दरवाजे हैं। पश्चिमी द्वार को छोड़कर बाकी तीनों से इसमें प्रवेश कर सकते हैं। इसका पश्चिमी द्वार श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्व अवसरों पर खोला जाता है। सभी द्वारों पर द्वार-मंडप हैं। गर्भगृह अंदर से चैकोर और बाहर से बहुकोणीय तारे जैसा है। गर्भगृह के ऊपर शिखर है, जिसके अंत में स्वर्ण कलश लगा है। यहां गर्भगृह में, जो कि भूतल से नीचे है, जाकर दर्शन के लिए विशेष ड्रेस कोड है। इसलिए लोग बाहर से ही दर्शन के लिए कतार में लगते है। ज्योतिर्लिंग जमीन में धंसा हुआ है। नीचे बडे आकार का शीशा लगा है। लोग उसी शीशे में ज्योतिर्लिंग के प्रतिबिंब के दर्शन करते हैं। एक अन्य कथा है कि एक बार सृष्टि के मूल और उसमें अपनी श्रेष्ठता को लेकर ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच विवाद हो गया। समाधान न मिलने पर वे भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने एक ज्योति स्तंभ प्रकट किया और उसका स्रोत ढूंढने के लिए कहा। दोनों देव जहां तक जा सकते थे गए, लेकिन कोई ओर-छोर मिला नहीं। अंत में विष्णु जी ने हार स्वीकार ली, पर ब्रह्मा जी ने मूल तलाश लेने का झूठा दावा किया। इससे रुष्ट होकर शिवजी ने ब्रह्मा को शाप दिया कि अब उनकी पूजा नहीं होगी। दूसरी तरफ, शाप से रुष्ट ब्रह्मा ने भी शिवजी को शाप दे दिया, जिससे वह ब्रह्मगिरि पर्वत में समा गए। वही ज्योतिस्तंभ अब ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजित है। ज्योतिर्लिंग पर एक स्वर्णमुकुट भी है। मान्यता है कि यह मुकुट पांडवों के समय से ही है, जिसमें हीरे, पन्ने आदि कई बहुमूल्य रत्न जडे हैं। नागर शैली में बनाए गए मंदिर की बाहरी दीवारों पर कई तरह की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इनमें देवों, मनुष्यों, पशु-पक्षियों व यक्षों की आकृतियां शामिल हैं। मंदिर परिसर में खाली जगह भी खूब है। जहां लोग बैठकर कुछ क्षण बीताते है।
नासिक कुंभ क्यों है सबसे अलग
देश के चार शहरों में लगने वाले कुंभ और सिंहस्थ मेले में से त्रर्यंबकेश्वर-नासिक कुंभ कई मायनों में अलग, अनूठा और अद्भुत है। यहां दो शहरों में शाही स्नान होते हैं। यानी शैव संन्यासी ज्योतिर्लिंग त्रर्यंबकेश्वर शिव की नगरी में गोदावरी के प्रकट स्थल कुशावर्त कुंड में शाही स्नान करते हैं, वहीं वैष्णव बैरागी संत भगवान राम की वनवास स्थली पंचवटी के शहर नासिक के राम घाट पर गोदावरी की पवित्र धारा में शाही स्नान की डुबकी लगाते हैं। बताते है कि 18वीं सदी में महाराष्ट्र में पेशवाओं के राज में पहले शाही स्नान करने के सवाल पर शैव संन्यासियों और वैष्णव बैरागियों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ। पेशवाओं ने दशकों तक सिंहस्थ का शाही आयोजन ही बंद कर दिया था। फिर पेशवा शासकों ने साधु संतों के समझौते के बाद शिव की नगरी त्रर्यंबकेश्वर में शैव संन्यासियों के और भगवान राम की वनवास स्थली पंचवटी में वैष्णव वैरागियों के शाही स्नान का इंतजाम तय किया और सिंहस्थ फिर से अपनी गरिमा और महिमा के साथ शुरू हो गया। लेकिन सिंहस्थ के शहर दो हो गए यानी श्रद्धा और उत्सव का दायरा बढ़ गया। कुम्भ पर्व विश्व मे किसी भी धार्मिक प्रयोजन हेतु भक्तों का सबसे बड़ा संग्रहण है। हजारों-लाखों की संख्या में लोग इस पावन पर्व में उपस्थित होते हैं। कुम्भ का संस्कृत अर्थ है कलश, ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। हिन्दू धर्म में कुम्भ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है। हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं।
इलाहाबाद का कुम्भ पर्व
ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है।
हरिद्वार के कुम्भ पर्व
हरिद्वार हिमालय पर्वत श्रृंखला के शिवालिक पर्वत के नीचे स्थित है। प्राचीन ग्रंथों में हरिद्वार को तपोवन, मायापुरी, गंगाद्वार और मोक्षद्वार आदि नामों से भी जाना जाता है। हरिद्वार की धार्मिक महत्तान विशाल है। यह हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थान है। मेले की तिथि की गणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकता होती है। हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है।
नासिक का कुम्भ पर्व
भारत में 12 में से एक जोतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर नामक पवित्र शहर में स्थित है। यह स्थान नासिक से 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और गोदावरी नदी का उद्गम भी यहीं से हुआ। 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार नासिक उन चार स्थानों में से एक है, जहां अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थींफ। कुम्भ मेले में हजारों-लाखों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। यहां पर शिवरात्रि का त्यौहार भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।
उज्जैन का कुम्भ पर्व
उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी और यह मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। इंदौर से इसकी दूरी लगभग 55 किलोमीटर है। यह शिप्रा नदी के तट पर बसा है। उज्जैन भारत के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है। महाभारत के अरण्य पर्व के अनुसार उज्जैन 7 पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है। उज्जैन के अतिरिक्त शेष हैं अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम और द्वारका। कहते हैं की भगवन शिव नें त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था।
(सुरेश गांधी)






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