जी हां, जिस देश का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी घूम-घूमकर विदेशी सरकारों से आतंकवाद के खिलाफ एकजूट होने की अलख जा रहे है। कुछ विदेशी सरकारो को छोड़ दे ंतो अधिकांश देश भारत की इस मुहिम में शामिल है। लेकिन यह हैरान कर देने वाली बात नही ंतो और क्या है कि उसी के देश में जब एक आतंकी को फांसी की सजा हुई तो जाति-मजहब का हवाला देकर पूरी न्याय प्रणाली को ही कटघरे में खड़ करने की कोशिश की गयी। खासकर उस आतंकी के मामले में जिसने 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट मामले में न सिर्फ पैसों का इंतजाम बल्कि कहां, कौन बम रखेगा इसकी भी योजना बनाई थी और 257 लोगों की जान ले ली, 800 घायलों को अपाहिज की जिदंगी जीने को विवश कर दिया, 27 सौ करोउ़ से भी अधिक की संपत्ति तहस-नहस करा दी। खासकर गिरफतारी के बाद याकूब ने खुद बम धमाके में अपनी भूमिका स्वीकारी थी। खुद को बेकसूर साबित करने के लिए तमाम तर्क देकर कोर्ट और जांच अधिकारियों को गुमराह किया कि वह मामले में कोर्ट की मदद करेगा। जबकि जगजाहिर है कि वह अपनी करोड़ों की पापर्टी बचाने के चक्कर में सबकुछ कर रहा था
याकूब मेनन की फांसी हो जाने के बाद पीडि़तों को थोड़ी सकून जरुर पहुंचा सकती है। लेकिन असली सकून तो तक मिलेगा जब धमाके का मुख्य आरोपी दाउद इब्राहिम और टाइगर मेनन की फांसी हो। क्योंकि 1993 का वाकया देश में आतंक का पहला और उस समय तक का सबसे बड़ा हमला था, जिसमें न सिर्फ कई जाने गयी, बल्कि करोड़ों की संपत्ति नष्ट होने के साथ महीनों कामकाज बंद रहा। पूरी की पूरी मुंबई थम सी गयी थी। लेकिन दुख है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय से फासी की फाइनल की मुहर लग जाने व फांसी हो जाने के बाद भी याकूब के नाम पर राजनीति खत्म होने का नाम नहीं ले रही। आखिर इस देश में वह स्थिति कब आयेगी जब आतंकवाद जैसे संवदेनशील मुद्दे पर राजनीति बंद होगी। खासतौर से उस दौर में जब कतिपय नेता व पार्टिया याकूब के फांसी पर न सिर्फ मजहबी सियासत कर रहे है बल्कि धरना-प्रदर्शन के जरिए विरोध-प्रदर्शन। मतलब साफ है अगर आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी है तो मोदी को पहले इन देशद्रोहियों से निपटना होगा। फांसी का विरोध करने वालों के खिलाफ केस दर्ज इनकी खोजबीन करनी होगी कि इन्हें फंडिग कौन कर रहा है। किसके रहमोकरम पर ये भारत में पल रहे है। पड़ताल करनी होगी कि मानवता की दुहाई देकर किस आधार पर दहशतगर्दो की पैरवी कर रहे है। क्योंकि गुनहगार आतंकी याकूब तो मर गया लेकिन इस देश गंदी राजनीति, मजहबी राजनीति कब मरेगी। सियासत ऐसी की सर्वोच्च अदालत पर ही सवाल उठा दिया। ऐसे बड़ा सवाल तो यही हो चला है कि आतंकवाद से लड़ते देश में आतंकियों से इतनी सहानभूति क्यों है? याकूब मेमन की फांसी को लेकर बुद्धजीवी के नाम पर मुठ्ठीभर लोगों में आखिर क्यों इतना हायतौबा मचा है। फालतू दलीलें देकर इस फांसी को गलत बता रहे है। खास बात यह है कि राजनीतिक, न्यायिक और धार्मिक सब के सब में अपनी दकियानूसी दलीलें देकर समाज में दोफाड़ करने की नापाक कोशिश की। मामला यहां तक पहुंच गया गया कि आधी रात के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा तक खोलना पड़ गया। फिर भी हुआ वहीं जो इस देश का कानून कहता है यानी फासी।
यहां जिक्र करना जरुरी है कि जिस मुकदमें की सुनवाई 20 साल से चल रही थी। पक्ष-विपक्ष द्वारा सभी दलीलें व आरोप-प्रत्यारोप सुने व सुनाएं गए और उन्हीं दलीलों की सुनवाई के बाद स्थिति यहां तक पहुंची कि फासी की सजा मुकर्रर हो गयी। इस बीच एक भी हालिया बुद्धजीवी कहीं नहीं नजर आएं। सजा के बाबत एक भी तर्क न्यायालय में दाखिल नहीं कर सके। लेकिन नियत फांसी के तीन पहले ऐसा कौन सी देशभक्ति जागृत हो गयी पूरी की पूरी न्यायिक प्रक्रिया को ही चुनौती दे डाली। हालांकि दामन पर छींटा न आएं इसके लिए न्यायालय ने इनकी हर दलीलों को सुना चाहे इसके लिए आधी रात को ही क्यों न अदालत का दरवाजा खोलना पड़ा। फिरहाल जो भी हो वह एक न्यायिक प्रक्रिया के तहत किया गया, लेकिन बात जो खटक रही है वह मुठ्ठीभर लोगों का देशप्रेम, जिनमें एकबारगी इतनी तेजी आ गयी, जिनका कल तक अता-पता नहीं था। मतलब साफ है इसके लिए कोई बड़ी हस्ती इन पर मेहरबान रही जो याकूब को फासी के लिए पानी की दौलत को बहाया, वरना बुद्धजीवियों की अभी इतनी जेब भारी नहीं है कि इतने बड़े भारी-भरकम जेब खर्च को सहन कर सके। अगर कोई कह रहा है कि इसके लिए अंडरवल्र्ड डान ने किसी के जरिए इन सारी खर्च का बोझ उठा रखा है तो इससे कहीं न कहीं सच्चाई की बू तो आ ही रही है। वरना बात-बात में कानून का राग अलापने वाले लोग इस फांसी को मजहबी रंग कम से कम ना ही देते। 40 लोगों का जत्था सजा-ए-मौत को चुनौती देने के लिए हलफनामा दाखिल न करता। बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव (सुधार) याचिका खारिज कर दी है। न्यायाधीश ने इसे यह कर टाल दिया कि मेमन के निष्पक्ष मुकदमे के अधिकार को विपरीत ढंग से प्रभावित नहीं किया गया है। सारे तर्कों को खारिज कर न्यायधीश ने डेथ वारंट बहाल रखा। यह अलग बात है कि बुद्धजीवियों ने तर्क दिया कि रॉ के पूर्व शीर्ष अधिकारी बी रमन (दिवंगत) ने कहा था कि मेमन ने विस्फोट की गुत्थी सुलझाने में जांच एजेंसियों की महत्वपूर्ण मदद की थी। लेकिन यह कहीं से भी सच नहीं पाया गया।
यह जगजाहिर है कि सीरियल बम धमाके में याकूब ने अपने परिवार से रेकी करवाई थी कि बम वहां फटे, जहां स्कूल के बच्चों की बस गुजरती हो। सेंचुरी बाजार की अकेली साजिश को ही लें तो सुनते ही कांप जाएंगे कि वहां कई दिनों तक याकूब के आतंकियों ने यह पड़ताल की थी कि आरडीएक्स कहां भरें। ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। मैनहोल में भरे थे विस्फोटक। अकेले वहीं कुल 113 बच्चे, महिलाएं और बीमार मारे गए थे। मैनहोल के ऊपर से बस के गुजरते ही फटे थे बम। उन चीखों-चीत्कारों को अनसुना कर, हम आधी रात के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खोलवा रहे है जिसका सम्मान सर्वोच्च है। एक उस आतंकी के लिए, जिसने न सिर्फ 257 जिंदगिया ले ली बल्कि हजारों-हजार लोगों का भरापूरा परिवार तबाह कर दिया हैं? 22 साल में हमें कुछ नहीं बताया गया। अब अचानक प्रक्रिया की खामियां गिनाई जा रही हंै। कोई भी कानून अंततः न्याय के लिए बना है। न्याय पर पहला अधिकार पीडि़त का है। आतंकी के आंसू इस तरह इंसाफ के तराजू को कैसे दबा सकते हैं? ये तब जबकि सुप्रीम कोर्ट की ही विस्तारित बेंच याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने से तब इनकार कर चुकी थी जब- उनके दो वरिष्ठ जजों में से एक ने न्याय की प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया था। राष्ट्रपति से खारिज दया याचिका फिर राष्ट्रपति, फिर राज्यपाल पता नहीं कहां-कहां भेजी गई। काश, पीडि़तों के लिए कोई ऐसा कर पाता। इस बीच एक सनसनीखेज खुलासा किया गया कि याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि उसे लाया गया था। उससे पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत मिल रहे थे। इसलिए वह सजा का पात्र नहीं हो सकता। तो किसे ऐसा हक दिया गया? किसने दिया? कौन ऐसे तय करने लगेगा कि सबूत दो तो 257 हत्याएं भी माफ? माफ करने वाले कर सकते हैं, देश आतंकी के पक्ष में कतारबद्ध को कभी माफ नहीं करेगा। तब रक्तपात से दहल गया था देश। आज खून खौल रहा है। बता दें, इसी हमले के बाद अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की गोद में जा बैठा ओर उसके बाद तो एक-दो नहीं कई धमाके करवाएं, लोगों की हत्याएं कराई। उसे पकड़ने के तमाम कोशिशें भी हुई लेकिन सब हवा-हवाई साबित हुआ। थोड़ी बहुत उम्मीदें प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी से है जरुर लेकिन लगता नहीं कुछ हो पायेगा।
देखा जाय तो पंजाब के गुरदासपुर में मारे गए तीनों आतंकी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे। लश्कर आतंकियों की मंशा भारत में घुसकर फिर से मुंबई के 26-11 जैसे आतंकी हमले को दोहराने की थी। लेकिन, वे अपने नापाक मंसूबों में अधिक कामयाब नहीं हो पाए। खुफिया एजेंसियों को मिली जानकारी व फोन नंबरों की जांच से साफ हो गया है कि वे पाकिस्तानी मूल के ही थे। इंटेलीजेंस व स्पेशल सेल के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही पाकिस्तानी आतंकी संगठन देश में 26-11 जैसी आतंकी घटना को फिर से अंजाम देने की फिराक में हैं। गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शिरकत करने से पूर्व भी खुफिया एजेंसियों को पाकिस्तानी आतंकी संगठनों की योजना के बारे में अलर्ट मिला था। लेकिन, सुरक्षा एजेंसियों की चैकसी व अमेरिका के डर से आतंकी हिम्मत नहीं जुटा पाए थे। सेल के एक अधिकारी का कहना है कि लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन और जैश-ए-मोहम्मद का संचालन पिछले कई वर्षो से पाकिस्तानी इंटेलीजेंस एजेंसी आइएसआइ कर रही है। आतंकियों के प्रशिक्षण से लेकर पैसा, गोला बारूद सब आइएसआइ ही मुहैया करा रही है। सेल का दावा है कि अभी लश्कर व जैश-ए-मोहम्मद से कोई भी भारतीय युवक नहीं जुड़ा है। सेल को आशंका है कि गुरदासपुर में हुआ आतंकी हमला याकूब मेमन से भी जुड़ा हो सकता है। सेल का कहना है कि हिजबुल का इतिहास रहा है कि वह जम्मू व कश्मीर में ही कोई भी वारदात करता रहा है। इसलिए इस हमले में उसकी संभावना पहले ही नहीं थी।
(सुरेश गांधी)


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