जब भी भारत की जांच एजेंसी किसी आतंकवाद के जुर्म में आतंकी वारदात के बाद या वारदात से पहले किसी मुजरिम को पकड़ती है , तो ऐसे मामलों में क़ानून में स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए की मुजरिमों का "नार्को टेक्स्ट" पूर्ण वैज्ञानिक माध्यम से अवश्य हो , तथा उस दौरान वह जो कुछ भी अपने मुखसे बोलता है , उसकी ब्रॉडकास्टिंग सरकारी न्यूजचैनल पर अवश्य करवाने का प्रावधान होने चाहिए , ताकि बाद में किसी तरह का भ्रम नहीं फैलाया जा सके । साथ ही आतंकवाद के मामले में "नार्कोटेस्ट" के समय ऑनेस्ट वैज्ञानिक का वहाँ होना इसलिए आवश्यक हो कि पैसे के लालच में नार्को टेस्ट का बिना डोज दिए ही नार्कोटेस्ट की नौटंकी जैसे नार्कोटेस्ट स्पेशलिस्ट मालिनीरमानी करती थी , वैसा न हो सके , और जरूरत पड़ने पर एक मुजरिम का तीन-तीन बार नार्कोटेस्ट करवाया जाय ।
मैं भी इस बात से सहमत हूँ की भारत की जांच एजेंसी फर्जी मामलों में भी निर्दोषों को फंसाती है , और दोषियों को बचाती है । ऐसे मामलों की कम से कम दस फाइल तो मेरे पास खुद है । दुःख की बात यह भी है की भारत की प्रोफेशनल मीडिया विशेष रूप से अंग्रेजी न्यूजपेपर तथा हिन्दी-अंग्रेजी न्यूजचैनल्स छद्मरूप से ऐसी व्यवस्था का परिपोषक है । जब आज से पंद्रह साल पहले मैंने ऐसी व्यवस्था के खिलाफ बिगुल बजाई तो मेरा अपना अनुभव रहा की "हो सकता है सरकारी एजेंसी में कोई ऑनेस्ट अधिकारी आपको सुनने, समझने को मिल भी जाय , लेकिन प्रोफेशनल मीडिया तो जब इस बात को दुनिया के सामने रखना चाहिए , तब सुनेगी ही नहीं" । मैं अकेला जूझते जूझते लगभग अब टूटने के हालात मैं आगया , लेकिन मेरा साथ किसी ने नहीं दिया । मैंने कई मामलों में यह भी पाया की आतंकवाद के रीयल मामलों में भी रीयल आतंकी पक्ष में भारत में अच्छे अच्छे लोग इसलिए आवाज उठाते हैं की इस काम के लिए उनको भारी धन मिलता है । जीवन में एक दो बार ऐसा लाभ कमाने हेतु आतंकी के पक्ष में बोलने के लिए मुझसे भी कहा गया , लेकिन उन महान आत्माओं से जब मैंने उन व्यक्तियों के दोषी या निर्दोष होने का एक मीटिंग के माध्यम से आपस में आर्ग्यू करने की बात कही , तो वे लोग मेरे साथ ऐसा करने को तैयार नहीं । अब वास्तविक स्थिति समझी जा सकती है । क्या धन के लालच में कोई हिन्दू, मुसलमान इत्यादि नाम से आपस में विभाजित मानव समुदाय को आतंक का शिकार होने दे, यह उचित है ? जब भी कहीं आतंकी गतिविधि होती है तो बम्ब यह नहीं जानता की इसमें कौन हिन्दू सम्प्रदाय का है ,कौन मुस्लिम सम्प्रदाय का या कौन अन्य सम्प्रदाय का ?
जहां तक 1993 मुम्बई सीरियल ब्लास्ट की बात है , तो पकड़े जाने पर दाऊद भी यही कहेगा की वो वारदात तो हमें फंसाने के लिए हुआ था , वारदात के पीछे असली हाथ तो स्वामी विवेकानंद , महर्षि दयानंद तथा माननीय स्वo एपीजे अब्दुल कलाम का था । क्योंकि कोई भी आतंकी खुद को मुजरिम साबित होने से जितना खुद को बचाने के लिए प्रयत्न करेगा, वो करेगा ही ।
इस सबसे अलग हटकर एक महत्वपूर्ण बात है कि जब आज विज्ञान के पास ऐसी व्यवस्था है की व्यक्ति किसी अपराध के बाद उसको अपने मुखसे बोल सकता है , तो खाशकर आतंकवाद के मामले में क़ानून में यह निश्चित व्यवस्था होने चाहिए की "दोषी बताया गया या बनाया गया व्यक्ति अपने मुखसे क्या बोलता है , इसके लिए नार्कोटेस्ट अवश्य हो" । इससे आतंकवाद जैसे गम्भीर मामलों में किसी निरपराध की फंसने की सम्भावना जहाँ न के बराबर होगी वहीं कोई दोषी बच नहीं पायेगा । साथ ही भारत जैसे देश में तो यह बहुत ही अधिक जरूरी है । दुःख की बात है की हायतौबा मचाकर मजा लेने वाले लोग या दोषी या पीड़ित लोग इस तरह की वैज्ञानिक सोच तथा वैज्ञानिक व्यवस्था अपने देश में चाहते ही नहीं , तो फिर ऐसे हालात में भगवान ही मालिक हैं ।
जहांतक याकूब मेनन का सबाल है तो यदि वह आतंकी था तो उसकी फांसी की सजा नितांत जायज है , और यदि मेरा अपना संतान भी यदि आतंकी होता तो उसके लिए भी मैं यही कहता ।
आमोद शास्त्री ,
दिल्ली ।
मोब = 9818974495 & 9312017281

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