याकूब मेमन को फांसी लगने के साथ ही यह सिद्ध हो गया कि हमारे देश में कानून से ऊपर कोई नहीं है.पूरे विश्व में यह सन्देश भी चला गया कि मुजरिम के लिए हमारे उच्च न्यायलय के दरवाज़े रात के ढाई बजे भी खुल सकते हैं या खुलवाये जा सकते हैं. अपराधी याकूब कोअपनी बेगुनाही साबित करने का हर तरह का अवसर दिया गया और शायद इसी वजह से केस इनता लम्बा चला भी.मगर याकूब का गुनाह ही कुछ ऐसा था कि हर कोर्ट ने ठोस सबूतों के आधार पर उसे दोषी पाया और अंत में उसे अपने किये की सज़ा मिल गयी.ठीक है,जो जैसा करेगा वह वैसा भरेगा.
इस बीच याकूब के बचाव में हमारे देश की कुछ नामचीन हस्तियों और बुद्धिजीवियों के बयान सामने आये जिन में उन्होंने अपील की कि याकूब की मौत की सज़ा में कुछ नरमी बरती जाय या फिर उसकी सज़ा को उम्र-कैद में बदला जाय.शायद भावातिरेक में उन्होंने ऐसा बयान दिया था.अगर वे १२ मार्च १९९३ को हुए मुम्बई सीरियल ब्लास्ट के मंजर पर नजर डालते जिसमें लगभग २५७ लोगों ने अपनी जानें गंवाई थी और सात सौ के करीब बच्चे,बूढ़े,महिलाएं,पुरुष आदि क्षत-विक्षत हुए थे,तो शायद वे इस खूंख्वार आतंकी की हिमायत कदापि नहीं करते.
अब चूंकि पूरे प्रकरण पर पटाक्षेप हो चुका है,उचित यह होगा कि सरकार ऐसे ‘मानवतावादियों’ की एक फेरिस्त तैयार करे और एक-एक से पूछे कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय की अवमानना कर वे क्यों और किन परिस्थितियों में याकूब के पक्ष में उतरे.सुना है इन महानुभावों में ऐसे भी कुछ लोग शामिल हैं जिन्हों ने अजमल कसाब,अफज़ल गुरु आदि जैसे दुर्दांत आतंकवदियों के पक्ष में भी ऐसा ही बयान दिया था.अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह कदापि नहीं है कि देश की सब से बड़ी अदालत पर उंगली उठाई जाय और चर्चा में रहने के लिए उलटे-सीधे बयान जारी किये जाएँ.न्यायपालिका की गरिमा को बनाये रखने के लिए सरकार द्वारा यह कदम उठाना बहुत ज़रूरी है.
डॉ. शिबन कृष्ण रैणा
अलवर

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