छठ विशेष : लोकआस्था का महापर्व है छठ पूजा - Live Aaryaavart

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सोमवार, 16 नवंबर 2015

छठ विशेष : लोकआस्था का महापर्व है छठ पूजा

तमाम पर्व-त्योहारों ने अपनी मूल जड़ें खो दी हैं। पर छठ अभी भी अपने मूल स्वरूप में है क्योंकि यह लोक पर्व है। इस पर्व में भगवान भास्कर की पूजा की जाती है। जो पूरी सृष्टि के जीवनदाता हैं। जैसे-जैसे बिहार और पूर्वाचल के लोग बाहर निकले वैसे-वैसे छठ ने विस्तृत फलक पर अपनी जगह बना ली और मुखर हो गया। मूलतः बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रचलित यह पर्व अब तो मॉरीशस और अमरीका में भी जीवंत नजर आता है। यह पर्व सबके बीच सद्भाव उत्पन्न करता है। सूर्य की दृष्टि में सब एक हैं। अमीर हो या गरीब या भूमि पर लेटकर उपासना करने वाले हो या एक सूप चढ़ाने वाले, सभी सूर्य परिवारी हो जाते हैं। सूर्य अपनी रश्मियों का विभाजन नहीं करता। जब कोटि-कोटि हाथ सूर्योपासना में उठते हैं तो पूरी मानवता नदी-तालाब किनारे इकट्ठा हो जाती है 

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सूर्य काल्पनिक देवता नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देवता हैं। अमीर हो या फिर गरीब, सबका आंचल सूर्य के सामने फैलता है। इसमें व्रती का धैर्य ही महत्वपूर्ण होता है। यानी अंतःकरण की शुद्धता का भी प्रतीक है छठ। इस दौरान सूर्य की सचेष्ट किरणों का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। कृषक समाज हो या कृषि पर आधारित समाज की संस्कृति में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करने वाले। छठ सभी समाज की संपूर्ण मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है। इसीलिए राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक जगत में अनेक तरह के परिवर्तन के वावजूद छठ पर्व मनाने का सिलसिला आज भी जारी है। देखा जाय तो कृषक समाज को जब न तो विज्ञान का इतना विकास हुआ था और न ही आधुनिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध थी। सूर्य की ऊष्मा और ऊर्जा ही कृषि में हर वह तत्व पहुंचाता था, जो पौध वृद्धि में सहायक होती थी। मतलब साफ है भारतीय समाज के एक वर्ग ने ऐसे प्रत्यक्ष देवता की पूजा का विधान करने में काफी सोच-समझकर नियम बनाए। सही अर्थों में पूजक कृषकों ने अपने पुरुषार्थ का प्रदर्शन किया। अपनी श्रमशक्ति से खेतों में वे जो कुछ उपजाते थे उन सबको पहले सूर्य देवता को भेंट के रूप में देते थे। इसी अर्थ में यह पर्व कृषक समाज के पुरुषार्थ के प्रदर्शन के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के मौके पर जो लोक गीत गाये जाते हैं उनमें से कई गीतों के अर्थ कुछ इस प्रकार होते हैं- ‘हे देवता! नेत्रहीनों को दृष्टि दो, कुष्ठ रोगियों को रोगमुक्त कर स्वस्थ बनाओ और उसी तरह से निर्धनों को धन प्रदान करो। यही तुम्हारे रथ को पूरब से पश्चिम की ओर ले जाएंगे।’ गौर करें तो इस गीत में अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के पीडि़त और उपेक्षित लोगों के लिए नया जीवन मांगा जा रहा है। एक लोकगीत में तो मांग की गई है, ‘हे देवता! हमें पांच विद्वान पुत्र और दस हल की खेती चाहिए।‘ इससे प्रमाणित होता है कि यह व्रत अत्यंत प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। 

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मन्नतों की छठ यानी मां षष्ठी और सूर्य की आराधना का दिन। सूर्य ही इकलौता ऐसे देवता है जो सम्पूर्ण जगत की आत्मा है। सृष्टि के प्रत्यक्ष देवता है भगवान सूर्य, जो प्रातःकाल उगते व सायंकाल अस्त होते हुए दिखते है। सूर्य उपासना से जातक को तत्काल फल की सिद्धि है। आज ही उपासना करिए और कल ही उसका फल मिल जाता है। तभी तो भगवान सूर्य की उपासना कभी व्यर्थ नहीं जाती। छठ पर उगते व अस्त होते सूर्य को अघ्र्य देने से अक्षय पूण्य की प्राप्ति होती है। जल सूर्य के अधीरक्षक देवता है इसलिए जल में ही खड़े होकर उपासना की जाती है। इस दिन सूरज की किरणों से घाट-घाट पर बिखरता है अमृत। हर अघ्र्य के साथ कटता जाता है दुख-दर्द। पूरी हो जाती है आस्थावानों की सभी कामनाएं। इस मौके पर व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हैं। व्रत समाप्त होने के बाद ही व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं। खरना पूजन से ही घर में देवी षष्ठी का आगमन हो जाता है। तभी तो भगवान सूर्य के इस पावन पर्व में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है। इसमें रौनक उसी तरह से रहती है मानो बेटी की शादी हो रही हो। काफी उत्साह का माहौल रहता है। गीत गाए जाते हैं। इसमें हर किसी की अपनी आस्था है। छठ के कई दिन पहले से ही देश के विभिन्न हिस्सों में छठ गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। 

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अघ्र्य मतलब विशेष सम्मान। जिससे बढ़कर जीवन में कोई दुसरा नहीं हो। जीवन में सिर्फ दो ही व्यक्तियों को अघ्र्य दिया जाता है पहला भगवान सूर्य और दूसरा विवाह के वक्त जवाई को। प्राचीन धार्मिक संदर्भ में यदि इस पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि छठ पूजा का आरंभ महाभारत काल के समय से है। छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं, उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना की जाती है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस सबसे बड़े पर्व की तैयारी भक्त दिवाली के बाद से ही करना शुरू कर देते हैं। ऐसा जरूरी भी है, कहते हैं इस पूजा में हुई एक छोटी सी चूक उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है। ऐसे में भक्त अपनी तरफ से देवी को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कार्तिक शुक्ल की छठी के दिन आने वाला ये पर्व चार दिन का होता है। पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि के लिए भक्त केवल अरवा खाते हैं यानी शुद्ध आहार लेते हैं। इसके बाद पंचमी को भक्त स्नान के बाद पूजा पाठ करते हैं। उसके बाद शाम को गुड़ और नए चावल की खील बनाकर फल और मिठाइयों से छठी माता की पूजा करते हैं। इसके बाद कुंवारी कन्याओं और ब्राह्मणों को खाना खिलाकर भक्त इस खील को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। इसके बाद आता है सबसे अहम दिन यानी षष्टी, जिस दिन सूर्य की आराधना होती है। इस दिन भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं। मां की पूजा के लिए हर तरह के पकवान बनाकर और सात तरह के फल बांस के डालों में भरकर नदी या तालाब के किनारे जाते हैं। यहां गन्ने का घर बनाकर दिया जलाते हैं और डूबते सूरज को अघ्र्य देते हैँ। ये अघ्र्य कमर तक पानी में खड़े होकर दिया जाता है। सूरज ढ़लने के बाद भक्त घर आते हैं और फिर जागरण होता है। सप्तमी के दिन ब्रह्म मूहूर्त में लोग फिर से नदी या तालाब के तट पर इकट्ठे होते हैं और फिर उगते हुए सूरज को अघ्र्य दिया जाता है। भक्त अंकुरित चने हाथ में लेकर षष्ठी व्रत की कथा कहते और सुनते हैं। कथा के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है और फिर सभी अपने-अपने घर लौट आते हैं। 

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व्रत करने वाले इस दिन परायण करते हैं। छठ को मन्नतों का पर्व भी कहा जाता है। इसके महत्व का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसमें किसी गलती के लिए कोई जगह नहीं होती। इसलिए शुद्धता और सफाई के साथ तन और मन से भी इस पर्व में जबरदस्त शुद्धता का ख्याल रखा जाता है। इस त्योहार को जितने मन से महिलाएं रखती हैं पुरुष भी पूरे जोशो-खरोश से इस त्योहार को मनाते हैं और व्रत रखते हैं। कहा जा सकता है छठ पर्व हमारी रीति-रिवाज ही नहीं हमारी सांस्कृतिक विविधता का बेजोड़ उदाहरण है। यूपी-बिहार में इस पर्व को लोग जिस निष्ठा, भक्ति व समर्पण के साथ करते रहे हैं वह और कहीं देखने को नहीं मिलता। लोग आज भी इसकी तैयारी में पूरी आस्था और समर्पण से जुटते हैं। अपने घर, गांव व समाज में आकर छठ करने पर कुछ अलग महसूस होता है। इस दिन कितनी ही व्यस्तता हो लोग छठ के मौके पर अपने घर जरूर पहुंचते है। खास बात यह है कि लोगों को अपनत्व के बंधन में भी यह पर्व बांधता है। बेटियां इस मौके पर अपने मायके आती है। इसी बहाने दामाद भी आते है। घर में आनंद, उत्साह व प्रेम का एक अलग माहौल दिखता है। लोगों की बढ़ती आस्था का ही उदाहरण है कि अब विदेशों में रहने वाले भारतवंशी भी छठ व्रत करने लगे हैं। 

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पौराणिक मान्यताएं 
सूर्य उपासना और छठी मैया की पूजा के लिए चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व का इतिहास भी बहुत पुराना है। पुराणों में ऐसी कई कथाएं हैं जिसमें मां षष्ठी संग सूर्यदेव की पूजा की बात रही गयी है, फिर चाहे वो त्रेतायुग में भगवान राम हों या फिर सूर्य के समान पुत्र कर्ण की माता कुंती. छठ पूजा को लेकर परंपरा में कई कहानियां प्रचलित हैं। 

राम की सूर्यपूजा 
कहते हैं सूर्य और षष्ठि मां की उपासना का ये पर्व त्रेता युग में शुरू हुआ था। भगवान राम जब लंका पर विजय प्राप्त कर रावण का वध करके अयोध्या लौटे तो उन्होंने कार्तिक शुक्ल की षष्ठि को सूर्यदेव की उपासना की और उनसे आशीर्वाद मांगा। जब खुद भगवान सूर्यदेव की उपासना करें तो भला उनकी प्रजा कैसे पीछे रह सकती थी। राम को देखकर सबने षष्ठी का व्रत रखना और पूजा करना शुरू कर दिया। कहते हैं उसी दिन से भक्त षष्टी यानी छठ का पर्व मनाते हैं। 

राजा प्रियव्रत की कथा 
छठ पूजा से जुड़ी एक कथानुसार, एक बार एक राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रयेष्टि यज्ञ कराया। लेकिन उनकी संतान पैदा होते ही इस दुनिया को छोड़कर चली गई। संतान की मौत से दुखी प्रियव्रत आत्महत्या करने चले गए तो षष्टी देवी ने प्रकट होकर उन्हें कहा कि अगर तुम मेरी पूजा करो तो तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। राजा ने षष्टी देवी की पूजा की जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं इसके बाद से ही छठ पूजा की जाती है। 

कुंती कर्ण कथा
कहते हैं कि कुंती जब कुंवारी थीं तब उन्होंने ऋषि दुर्वासा के वरदान का सत्य जानने के लिए सूर्य का आह्वान किया और पुत्र की इच्छा जताई। कुंवारी कुंती को सूर्य ने कर्ण जैसा पराक्रमी और दानवीर पुत्र दिया। एक मान्यता ये भी है कि कर्ण की तरह ही पराक्रमी पुत्र के लिए सूर्य की आराधना का नाम है छठ पर्व। भविष्य पुराण में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है- ‘कृत्यशिरोमणो, कार्तिक शुक्ल षष्ठी षष्ठीकाव्रतम’ यानी धौम्य ऋषि ने द्रोपदी को बतलाया कि सुकन्या ने इस व्रत को किया था। द्रोपदी ने भी इस व्रत को किया जिसके फलस्वरूप वह 88 सहस्र ऋषियों का स्वागत कर पति धर्मराज युधिष्ठर की मर्यादा रखती हुई शत्रुओं को समूल नष्ट करके विजय प्राप्त की। 

साफ-सफाई का विशेष ध्यान 
इस व्रत में एक-एक नियम-कानून का बहुत ही बारीकी से ध्यान देना पड़ता है। इतना ही नहीं अघ्र्य देने वाले कोनिया दौरा और प्रसाद में इस्तेमाल किए जाने वाली एक-एक चीज का पूरी तरह से शुद्ध होना बहुत जरुरी है। व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। पूजन सामग्री किसी कारण से जूठी न हो, इस कारण पूजन सामग्री को रखने के लिए घरों की सफाई की जाती है। अगर पूजन सामग्री जूठी या अपवित्र हो जाए तो पर्व खंडित हो जाता है और इसे अशुभ माना जाता है। नहाय-खाय के दिन से ही व्रतधारी जमीन पर सोते हैं। घर में सभी के लिए सात्विक भोजन बनता है। दूसरे दिन पूरे दिन व्रत कर चंद्रमा निकलने के बाद व्रतधारी गुड़ की खीर का प्रसाद खाते हैं। इसी दिन कद्दू की सब्जी विशेषतौर पर खायी जाती है। स्थानीय बोलचाल में इसे कद्दू-भात कहते हैं। कद्दू-भात के साथ ही व्रतधारियों का 36 घंटे का अखंड व्रत शुरू हो जाता है। इस दौरान व्रतधारी अन्न और जल ग्रहण नहीं करते हैं। तीसरे दिन व्रतधारी अस्त होते हुए सूर्य को नदी व तालाब में खड़े होकर अर्ध्य देते हैं। चैथे दिन सुबह उगते सूर्य को कंद-मूल व गाय के दूध से अघ्र्य देने के साथ ही यह व्रत सम्पन्न होता है। व्रतधारी व्रत समाप्त होने के बाद सबसे पहले प्रसाद के रूप ठेकुआ खाते हैं और उसके बाद अन्न ग्रहण करते हैं। 

मुहूर्त 
छठ पूजा व्रत आरंभ नहाय खाय 15 नवम्बर, खरना लोहंडा 16 नवम्बर, सांझा अघ्र्य 17 नवम्बर सूर्योदय अघ्र्य 18 नवम्बर को है। छठ पूजा का आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है। कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इसका समापन होता है। प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। नहाए-खाए के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को खरना किया जाता है। पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाले व्रती शाम के समय गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में करते हैं। 

पूजन विधि 
तीन दिनों के इस महापर्व की शुरुआत ‘नहाए खाए’ से होती है। उसके अगले दिन ‘खरना’ होता है और फिर उसके अगले दिन शाम को पहला अर्घ्य दिया जाता है। नहाए खाए के दिन बिना लहसुन-प्याज के शुद्ध घी में चना-घीया (इसे कहीं-कहीं लौकी या कद्दू भी कहा जाता है) डाल कर दाल बनाई जाती है और अरवा चावल के साथ खाया जाता है। खरना के दिन शाम को एक अलग कमरे में मिट्टी के नए चुल्हे पर खीर और पुरी बनती है। कई लोग गुड़ की खीर भी बनाते हैं, जिसे रसियाव कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि खरना के दिन भोजन करते समय व्रतियों की कान में कोई आवाज नहीं पड़नी चाहिए। 

गीत भी देते है संदेश 
इस अवसर पर जो भी गीत गाये जाते हैं। वे प्रायः सूर्य से संबंधित होते हैं। किसी में भास्कर भगवान की महिमा होती है तो कहीं पर आदित्य से शीघ्र उदय होने की प्रार्थना की गई है। इन गीतों में समस्त मानव को सूर्य देवता का सेवक माना गया है। ये सभी गीत पूर्णतः धर्म एवं समाज से जुड़े होते हैं। जब स्त्रियां गीत गाती हुईं किसी जलाशय के किनारे जाने के लिए घर से निकलतीं हैं तो उस समय वे निम्न गीत गाती हैं। 
“कांचहि बांस के दउरवा, दउरा नइ नइ जाइ।
केरवा से भरल दउरवा, दउरा नइ नइ जाइ।
होखना कवन राम कहरिया, दउरा घाटे पहुंचाई।
बाट जे पूछेला बटोहिया, इ दउरा केकरा के जाइ।
तें ते आन्हर बाड़े रे बटोहिया, इ दउरा छठी मइया के जाइ।“

इस गाने का भावार्थ है कि एक स्त्री कह रही है, मैं अपने स्वामी को गिरवी रखकर छठी माता को पांच प्रकार के फलों का अघ्र्य दूंगी। दो-दो बांस की सूपली से छठी माता को अघ्र्य दूंगी।
“कहेली कवन देइ हम छठि करवो,
अपना स्वामी जी के गिरवी रखबो।
पांच करहरिया मइया के अरघ देवो,
दोहरी कलसुपये मइया के अरघ देवो।“

दरअसल इस गीत पर गौर करें तो यहां पर भारतीय नारी के लिए यह सबसे बड़ा त्याग परिलक्षित होता है कि वह अपने पति को गिरवी रखकर छठी माता की पूजा करने के लिए तैयार है। वह दो-दो सुपली से भगवान भास्कर को अर्घ्य देने का प्रण करती है। इससे इस व्रत की महिमा और उसकी लोकप्रियता प्रकट होती है। ऐसे तमाम गीत जब इस मौके पर स्त्रियां गाती हैं तो भक्ति की एक असीम धारा प्रवाहित होती हैं। स्त्रियां जब ‘ए छठि मइया ए छठि मइया’ को बार-बार दुहराती हैं उस समय मानो ऐसा प्रतीत होता है कि उनके हृदय भक्ति भावना से ओत-प्रोत है और वे छठि मइया को गोहराने में ही लीन हैं।

पूजन सामाग्री 
जिस डाली में सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है उस डाली में पूजा सामग्री धूप, दीप के अतिरिक्त पांच प्रकार के सामयिक फल केला, नींबू, संतरा, नारियल और शरीफा आदि चढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त मूली, गन्ना, हल्दी, सूरन आदि भी डाली में रखा जाता है। सूर्य भगवान का सबसे प्रमुख व्यंजन पकवान को माना गया है जिसे में डाली में चढ़ाने के लिए बड़ी ही शुद्धता से गेहूं को धोकर सूर्य के प्रकाश में सुखाकर जांत में उसका आटा बनाया जाता है और फिर उसे दूध से गीला कर एक ऐसे सांच में डालकर आकार दिया जाता है जिसपर सूर्य देवता का चित्र बना होता है और फिर उसे शुद्ध घी में तलकर डाली में चढ़ाकर देवता को अघ्र्य दिया जाता है।

महत्व 
यहां व्रत करने वाले व्यक्ति की कल्पनाशक्ति देखिए कि षष्ठी तिथि उच्चारण विपर्यय के कारण छठी बन गई और स्त्रीलिंग होने के कारण उसे सूर्य की जननी के रूप में स्वीकार किया गया और षष्ठी तिथि ‘छठी मइया’ बन गई तथा षष्ठी का दिवस पुल्लिंग होने के कारण ‘छठ व्रत’ बन गया। इस सबके अलावा इस व्रत का जो सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है इसका सामाजिक पक्ष। पूरा गांव, शहर या मुहल्ला किसी नदी या तालाब के किनारे इकट्ठा होता है और वहीं सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। यह व्रत अलग-अलग घरों में नहीं मनाया जाता है। इस दिन व्यष्टि समष्टि में विलीन होकर सामाजिक एकता का उद्घोष करती है और संपूर्ण बिहार व उससे लगे उत्तर प्रदेश के सीमा के कुछ जिलों (पूर्वांचल) में यह व्रत इतना महत्वपूर्ण है कि इस व्रत के दौरान बड़े-छोटे, धनी-गरीब और छूत-अछूत तक का भेद मिट जाता है। व्रत का विधान इस ढंग से किया गया है कि आचार्य और पुरोहित से लेकर कपड़े सिलने वाले दरजी और टोकरी बनाने वाले डोम तक की मांग बढ़ जाती है। सभी को उनके काम के आधार पर उचित सम्मान भी प्राप्त होता है। इस दृष्टि से यह पर्व सामाजिक संश्लिष्टता का भी परिचायक है। 





(सुरेश गांधी)

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