उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती से परिवारिक रिश्ता कायम कर लिया है। अब इस रिश्ते की ‘कद्र’ मायावती करने के लिए तैयार होती हैं या नहीं-यह देखने वाली बात होगी। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से मायावती के वोट बैंक में सेंघ लगाने के पुख्ता इंतज़ाम में जुटी है, उसे देखते हुए इस रिश्तेदारी के मजबूत बन कर उभरने की संभावना अपनी जगह दुरुस्त है।
अखिलेश यादव चाहे जितने भी राजनैतिक तौर पर परिपक्व होने का दावा करते हों, मगर वह अब भी पारिवारिक बेडि़यों से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं हैं। पिता नेताजी (मुलायम सिंह यादव) के अलावा उनके दो चाचाओं ने मोहपाश में उन्हंे बांध रखा है और इसके बीच उनकी छटपटाहट को साफ महसूस किया जा सकता है। पिछले दिनों जिस तरह से उन्होंने अपने मंत्रियों का कामकाज बिना पूर्व सूचना के ‘सीज’ कर लिया, उसकी वज़ह से उन्हें राजनैतिक तौर पर परिपक्व होने का प्रमाण पत्र जरूर दिया गया है। मगर, सच तो है कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ही नेताजी को इस बात का अहसास हो गया कि हवा हवाई तरीके से राजपाट चलाना, कितना महंगा साबित हो सकता है? राजा भैय्या जैसे नेताओं के कद को घटाने के पीछे, इसी तरह की मंशा है। यानी कुल मिला कर अखिलेश यादव आज भी अपने परिवार की नज़रों में ‘बच्चे’ ही हैं।
मुलायम सिंह यादव बुरी तरह से फंसे हुए हैं। बिहार में भाजपा को उन्होंने अपना परोक्ष समर्थन दे दिया। बिहार में महागठबंधन के हाथ को झटकने के उनके फैसले का असर उत्तर प्रदेश के आसन्न विधानसभा चुनाव में पड़ता दिख रहा है। माना जा रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से अल्पसंख्यकों पर कांग्रेस की जो पकड़ ढ़ीली पड़ गई थी, वह एक बार फिर से मजबूत हो गई है। कांग्रेस स्वाभाविक तौर पर इस बार उत्तर प्रदेश में राजनैतिक तौर परिवर्तनकारी भूमिका निभाने की मुद्रा में नज़र आ रही है और इसीलिए मुलायम सिंह यादव के ‘दूत’ कांग्रेसी नेताओं के साथ भी संपर्क साधने में जुटे हैं।
ल्ेकिन, बिहार की तरह महागठबंधन कांग्रेस के बिना संभव नहीं है। जीत को सुनिश्चित करने के लिए यादवों के साथ दलित और उनके साथ अल्पसंख्यकों का होना जरूरी है। कांग्रेस के साथ के बगैर इस वोट बैंक में विघटन की संभावना अपनी जगह बरकरार है। बिहार विधानसभा मंे जिस तरह से कांग्रेस को वहां के मतदाताओं ने 27 सीटें दी है, उससे इस बात मंे किसी तरह के संशय की कोई गुंजाईश नहीं है। मायावती को तो यह कह कर गठबंधन के लिए तैयार किया जा सकता है कि जब भाजपा की विजय रथ को रोकने के लिए नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव सारे मतभेदों को भुला कर एक हो सकते हैं तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में तो समाजवाद जैसी समानता पहले से ही मौजूद है। इस बात की संभावना अधिक है कि मायावती बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की दुर्दशा को देखते हुए, इस प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लें।
मायावती एक ही सूरत में इंकार कर सकती हैं। वह सूरत यह है कि अगर कांग्रेस का उन्हें साथ मिल जाता है। मुलायम सिंह यादव को कांग्रेस के साथ की उम्मीद ना के बराबर है। हालांकि, गठबंधन के लिए कोई नियम स्थायी नहीं होता, इसीलिए संभावनाओं को खंगालने में वे भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। भाजपा जीत की उम्मीद कर सकती है अगर मुलायम सिंह, मायावती और कांग्रेस या फिर बिहार का महागठबंधन मैदान में अलग-अलग भाग्य आजमाए। ऐसी स्थिति में भाजपा बिहार के नुकसान की क्षतिपूर्ति कर लेगी। कांग्रेस जब तक गठबंधन के पक्ष में अनिर्णय की स्थिति में रहती है तब तक मुलायम सिंह यादव और मायावती की स्थिति रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की तरह बनी रहेगी।
गिरिजा नंद झा
नई दिल्ली

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